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क्या आपका बच्चा भी दिनभर देखता है Reels? हो सकता है ये बड़ा खतरा, रिपोर्ट में हो गया खुलासा

Instagram Reels: वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया भर में आज युवा अपना ज्यादा से ज्यादा समय शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म पर बिता रहे हैं.

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  • ज्यादा रील्स बच्चों में तनाव बढ़ाता है, फोकस भी घटाता है।
  • अनंत स्क्रॉलिंग, नया कंटेंट और एल्गोरिथम उन्हें बांधे रखता है।
  • माता-पिता डिजिटल समय तय करें, बाहरी खेल प्रोत्साहित करें।

Instagram Reels: इंस्टाग्राम एक ऐसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बन चुका है जहां लोग कई घंटों तक एक्टिव रहते हैं. कोई रील्स देखने में तो कोई स्टोरी पोस्ट करने और बातें करने में इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करता है. लेकिन इंस्टाग्राम रील्स आज सबसे ज्यादा ट्रेंडिंग में है जहां बच्चों से लेकर बूढ़े तक एक्टिव रहते हैं. आज कल के बच्चों में स्मार्टफोन का इतना ज्यादा क्रेज है कि वे कई घंटों तक इंस्टाग्राम रील्स स्क्रॉल करते रहते हैं. अब एक रिपोर्ट सामने आई है जहां बताया है कि ऐसा करना बच्चों के दिमाग पर काफी गहरा असर डाल रहा है.

ज्यादा रील्स देखने से बढ़ रहा तनाव

जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ बायरॉथ के शोधकर्ताओं द्वारा की गई एक नई स्टडी में सामने आया है कि लगातार शॉर्ट वीडियो देखने की आदत बच्चों और युवाओं में तनाव बढ़ाने का काम कर रहा है. इतना ही नहीं, ऐसा करने से उनका फोकस भी कम हो रहा है. यह रिसर्च जून में European Child & Adolescent Psychiatry जर्नल में प्रकाशित हुई है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया भर में आज युवा अपना ज्यादा से ज्यादा समय शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म पर बिता रहे हैं. ऐसा करने से उनके दिमाग और व्यवहार पर गलत असर पड़ रहा है जिस पर अब ध्यान देने की जरुरत है.

ये हैं तीन कारण

इस रिसर्च में तीन बड़े कारण सामने आए हैं जिससे बच्चे और युवा रील्स देखने से अपने आप को रोक नहीं पाते हैं. पहला है फटाफट नया कंटेंट आने से यूजर उसी में बंधा रहता है और प्लेटफॉर्म छोड़ नहीं पाता है. दूसरा है Infinite Scrolling जो कभी खत्म नहीं होती है. इसीलिए लोग लगातार स्क्रॉल करते रहते हैं और अपने कई घंटे इसी में बर्बाद कर देते हैं. वहीं, तीसरा है यूजर की पसंद के अनुसार कंटेंट दिखाने वाला पर्सनलाइज्ड एल्गोरिदम. ये लोगों को वही कंटेंट दिखाता है जो वो देखना चाहते हैं या फिर उन्हें पसंद है. ये सबसे बड़ा कारण हैं जिससे लोग अपने आप को इस प्लेटफॉर्स से दूर नहीं कर पाते हैं.

इतने लोगों पर हुआ रिसर्च

इस रिसर्च में 42 अलग-अलग रिसर्च ग्रुप का एनॉलिसिस किया गया. इस रिसर्च में करीब 47 हजार लोगों को शामिल किया गया था जिनकी औसत उम्र करीब 16 है. बता दें कि इस रिसर्च में घर, स्कूल और अन्य पब्लिक प्लेस पर डिजिटल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर स्टडी की गई जिसके बाद ये पता चला कि शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म को इस तरह तैयार किया गया है कि लोग उससे दूर जा ही नहीं सकते हैं. हर सेकेंड नए वीडियो आने से लोग प्लेटफॉर्म से चिपके रहते हैं और जल्दी दूर नहीं हो पाते हैं.

कैसे बच्चों को करें इससे दूर

शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर पैरेंट्स और फैमली बच्चों के लिए स्वस्थ डिजिटल माहौल तैयार करें और मोबाइल के इस्तेमाल करने का एक तय समय निर्धारित करें इन खतरों से काफी हद तक बचा जा सकता है. इसके अलावा बच्चों को ज्यादातर स्मार्टफोन के बजाय बाहरी दुनिया में ले जाना और ग्राउंड में फिजिकल एक्टिविटी या खेल-कूद में भाग लेने से वह ज्यादा तेजी से रिकवर करते हैं. इतना ही नहीं, बच्चों के साथ पैरेंट्स और फैमली को ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहिए जिससे उसकी सोशल मीडिया और स्मार्टफोन पर निर्भरता कम हो सके.

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स्मार्टफोन, गैजेट्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और इंटरनेट टेक्नोलॉजी की दुनिया में मेरा इंटरेस्ट काफी ज्यादा है. मैं यानी हिमांशु तिवारी, ABP LIVE में टेक और डिजिटल सेक्शन का हिस्सा हूं. मैं नई टेक्नोलॉजी को आसान और दिलचस्प अंदाज में पाठकों तक पहुंचाने का काम करता हूं. स्मार्टफोन लॉन्च, वायरल टेक ट्रेंड्स, AI अपडेट्स, सोशल मीडिया फीचर्स और साइबर फ्रॉड जैसे विषयों पर मेरी पकड़ मजबूत है.

टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरों को सिर्फ जानकारी तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें आम लोगों की जरूरत और रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़कर पेश करता हूं. खासतौर पर ऐसी खबरों पर काम करना पसंद करता हूं, जो लोगों के डिजिटल एक्सपीरियंस को सीधे प्रभावित करती हैं.

इसके अलावा मुझे नई टेक्नोलॉजी एक्सप्लोर करना, स्मार्टफोन फीचर्स को समझना और डिजिटल ट्रेंड्स पर रिसर्च करना पसंद है. मैं आसान भाषा और आकर्षक अंदाज में लिखने के लिए जाना जाता हूं, जिससे कठिन टेक्निकल बातें भी पाठकों के लिए समझना आसान हो जाती हैं. मैंने परास्नातक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की है.

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