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Gram Farming: चने की रिकॉर्ड पैदावार के लिए ये 2 काम जरूर करें किसान, कम खर्च में ही मिल जायेगा बंपर मुनाफा

Agriculture Advisory: चना एक दलहनी फसल है, जिसकी रोगमुक्त और स्वस्थ पैदावार के लिये कुछ वैज्ञानिक उपाय करने की सलाह दी जाती है. इन उपायों में भूमि शोधन से लेकर बीजों का उपचार करने का प्रॉसेस शामिल है.

Gram Cultivation: चना एक प्रमुख दलहनी फसल है, जिसे दालों का राजा भी कहते हैं. भारत में चने की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. यह रबी सीजन (Rabi Season 2022) की फसल है, जिसकी खेती सर्द जलवायु में की जाती है. फसल के बेहतर विकास के लिये मिट्टी का नमीदार होना भी जरूरी है, इसलिये जल निकासी वाली हल्की या भारी मिट्टी सबसे अच्छी रहती है. हालांकि लवणीय और क्षारीय मिट्टी में भी चने का अच्छा उत्पादन (Gram Production) ले सकते हैं. चना की खेती के लिये अच्छी जल धारण क्षमता वाली मिट्टी को सबसे उपयुक्त मानते हैं. इसमें कम लागत में ही काफी अच्छा उत्पादन मिल जाता है.

चने की उन्नत किस्में 
आमतौर पर चना दो प्रकार का होता है, एक काबुली चना और एक देसी चना. भारत में चना की दोनों ही किस्मों की काफी डिमांड रहती है. साथ ही विदेशों में भी निर्यात किया जाता है. किसान चाहें तो चने की उन्नत किस्में जीएनजी 2171 (मीरा), जीएनजी 1958 (मरुधर), जीएनजी 1581 (गणगौर), आरवीजी 202, जीएनजी 2144 (तीज), जीएनजी 148 (संगम). वहीं चने के देसी किस्मों में आरएसजी 888, जीएनजी 1969 (त्रिवेणी), जीएनजी 1499 (गौरी) और जीएनजी 1292 आदि से भी बंपर पैदावार ले सकते हैं.

भूमि उपचार 
जाहिर है कि किसी भी फसल की बुवाई से पहले खेत की साफ-सफाई और जुताई की जाती है. इससे मिट्टी की संरचना बेहतर बनती है. इसके बाद मिट्टी की जांच के आधार पर खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता है. इतना ही नहीं, फसल से स्वस्थ और निरोगी उत्पादन के लिये बुवाई से पहले ही मिट्टी में कीट और रोग नियंत्रण करना चाहिये. इसके लिए मिट्टी की उपचार करने की सलाह दी जाती है. 

  • फसल में दीमक औक कटवर्म जैसे जोखिमों की रोकथाम के लिये आखिरी जुताई से पहले क्युनालफॉस (1.5 प्रतिशत) चूर्ण को 6 किलो प्रति बीघा के हिसाब से प्रयोग करने की हिदायत दी जाती है.
  • वहीं दीमक के नियंत्रण के लिये चने की बुवाई से पहले  400 मिली क्लोरोपाइरिफॉस (20 EC) या 200 मिली इमिडाक्लोप्रीड (17.8 एसएल) को 5 लीटर पानी में घोलकर 100 किलो बीजों का उपचार करना चाहिये.
  • फसल में जड़ गलन और उखटा रोग की रोकथाम के लिये 5 किग्रा. ट्राइकोडर्मा हरजेनियम और 5 किग्रा. स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस को 100 किलो गोबर में मिलाकर 10-15 दिन तक छाया में सुखायें और बुवाई से पहले खेतों की मिट्टी में मिला दें.  
  • इसके अलावा मिट्टी के उपचार के लिये गोबर की खाद, नीम की खली और खरपतवारनाशी दवा का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. इन सभी उपायों के बाद कीटनाशकों पर अलग से खर्च नहीं करना पड़ता और खेती की लागत भी कम हो जाती है.

बीज उपचार
अकसर मिट्टी के रोग फसल पर हावी हो जाती है. इसका असर शुरुआत में ही नजर आने लगता है, इसलिये बीजों के बेहतर जमाव, अंकुरण, पौधों के विकास और फसल से अच्छी पैदावार के लिये चने का बीज उपचार करने की सलाह दी जाती है.

  • जड़गलन और उकटा की रोकथाम के लिये 1 किलोग्राम बीजों को 10 किलो ट्राइकोडर्मा हरजेनियम या 1.5 ग्राम कार्बेन्डेजिम (50 WP)या 2.5 ग्राम कार्बेन्डेजिम (25 एस.डी.) से उपचारित कर सकते हैं.
  • चने के बीजों के उपचार के लिये एजोटोबैक्टर और पीएसबी कल्चर पाउडर के तीन पैकेट या 600 ग्राम कल्चर से प्रति हेक्टेयर बीजों का बुवाई से पहले उपचार कर सकते हैं.
  • वहीं सिंचित इलाकों में बीज उपचार के लिये 4 मिली. क्लोरोपाइरिफॉस (20 ई.सी.) या 2 मिली इमिडाक्लोप्रीड (17.8 एसएल.) को 50 मिली पानी मे घोलकर 1 किग्रा. बीजों का उपचार कर सकते हैं.

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. किसान भाई, किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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