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वो बीस साल, यादों के गलियारों में

2002 में वो दिसंबर के शुरुआती दिन थे और ऐसी ही किसी खुशनुमा दोपहर को फोन आता है. मैं सौरभ बोल रहा हूं. बोलो सौरभ क्या बात है. अरे भाई मैं सौरभ सिन्हा बोल रहा हूं, स्टार न्यूज से. सॉरी सर, बोलिए मैं आपको पहचान नहीं पाया. कोई बात नहीं, भोपाल में हूं और शाम को मिलने आओ.

इस तरह एक छोटी सी मुलाकात में पूछे गए कुछ औपचारिक और कुछ अनौपचारिक सवालों के बाद स्टार न्यूज में नौकरी मिल गई. प्राइवेट नौकरी में क्या चाहिए? एक बडा ब्रांड. और उन दिनों टीवी न्यूज में स्टार न्यूज से बड़ा कोई ब्रांड नहीं था. बस फिर क्या था. लगा अब तो लग गई नैया पार. मगर नए कलेवर में लॉन्च के पहले स्टार न्यूज के साथियों की दो महीने ट्रेनिंग और ग्रूमिंग हुई, जिसमें एंकर और रिपोर्टर को सेलेब्रिटी बनाने की बात तो उन दिनों स्टार इंडिया के सीईओ पीटर मुखर्जिया ही कर गए थे.  

उस समय स्टार न्यूज की प्रमुख रवीना राज कोहली की जिद थी कि टीवी घरेलू मीडियम है, ड्रॉइंग रूम में टीवी रहता है, इसलिए रिपोर्टर और एंकर बहुत प्रेजेंटेबल यानी कि सलीके वाले हों. उनकी जिद में हम सब रिपोर्टरों की दाढ़ी- मूंछ कुर्बान हुई और हमने सलीके से कपड़े पहनना सीखा.

नतीजा ये रहा कि जब स्टार न्यूज लॉन्च हुआ तो ताजी हवा का झोंके सा था. खबरों में पैनापन और उनको पेश करने में नएपन के साथ स्टार न्यूज चल पड़ा. संजय पुगलिया, शाजी जमां, उदय शंकर, मिलिंद खांडेकर, विनोद कापड़ी, रजनीश आहूजा जैसे टीवी के दिग्गजों की अगुआई में स्टार न्यूज टीआरपी की दौड़ में नंबर वन भी बना और समाचार चैनलों की भीड़ में खबरों को लेकर विश्वसनीय नाम बन उभरा.

टीवी समाचार चैनलों में हर वक्त कुछ नए पन की तलाश होती है. ऐसी खबर जिसे देख दर्शक चैनल से दूर ना हट सके. खबरों से लेकर उनको पेश करने के स्तर तक गहन मंथन लगातार चलता है. कुछ-कुछ फिल्मों जैसा हाल होता है. जैसी फिल्म हिट हो जाए फिर वैसी ही फिल्में बनने लगती हैं. टीवी समाचार में भी जिस प्रकार की खबरों या कार्यक्रमों की दर्शक संख्या बढ़ती है. वैसे ही समाचारों की भीड़ आ जाती है. ऐसे में कभी नाग नागिन की कहानियां तो कभी भूत पिशाच तो कभी पारिवारिक झगडे़ तो कभी प्रिंस जैसे हादसे तो कभी दूर देश में चल रहा युद्ध दिखाया जाने लगता है.

ऐसे में हम रिपोर्टर अपने आपको जो स्क्रीन पर चल रहा है उस हिसाब से फिट बनाने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं. यानी कि वैसी ही कहानियां तलाशते हैं जैसी चल रही होती हैं. कभी मिलती हैं कभी नहीं भी मिलतीं. इन सालों में शायद ही ऐसा कोई विषय छूटा होगा जिन पर खबरें ना की हों. भूत पिशाच, नाग नागिन, फैमिली ड्रामा से लेकर आम चुनाव, रैली, कुंभ, सिंहस्थ, बाढ़, आपदा, तूफान, घोटाले, अवैध उत्खनन स्टिंग ऑपरेशन, आंदोलन, दुर्घटनाएं और कोविड महामारी तक सब कुछ की कहानियां कीं. कभी मारपीट देखी तो कभी अपने ऊपर भी अचानक होते हमले भी झेले.

इन बीस सालों में टीवी न्यूज में बहुत उतार चढ़ाव आए. एक वक्त आया जब स्टार न्यूज ने दुनिया भर में न्यूज के काम से हाथ खींच लिया, तो 2012 में स्टार न्यूज एबीपी न्यूज में बदला और बदलते दौर में खबरों से कदम ताल करते हुए 'आपको रखे आगे' की टैगलाइन के साथ चल रहा है.

जब नाम बदला जा रहा था तो हम सबको घबराहट थी. लग रहा था कि शरीर से प्राण निकल जाएंगे, तो बेजान हो जाएंगे. मगर अच्छे मीडिया कैंपेन का फायदा मिला और स्टार न्यूज स्टार के पांच कोण जब एक कोण के साथ एबीपी के रूप में आया तो दर्शकों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा. तब हम सबको समझ आया कि लोग समाचार चाहते हैं, नाम से ज्यादा ताल्लुक उनको नहीं है.

पहले समाचार के एक दो ही नेशनल चैनल होते थे, मगर अब दस से बारह न्यूज चैनल के संवाददाता तो भोपाल में ही हो गए हैं. चैनलों के रिपोर्टरों की इस भीड़ में काम निकालना आसान नहीं रहा. मगर इन सालों में ये भी सीखा कि कैसे भाई बनाकर बिना लड़े झगड़े काम करना चाहिए.

टीवी फील्ड रिपोर्टिंग का काम है. यदि आपने अपना अहं बड़ा रखा तो बड़ा काम नहीं कर पाएंगे. इसलिए अहं को घर के कोने में घर पर रखकर माइक लेकर जब निकले तो कई अच्छी कहानियां मिलीं. जिन पर रेड इंक अवॉर्ड, रामनाथ गोयनका अवॉर्ड और ईएनबीए जैसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड मिले तो लगा कि सही रास्ते पर जा रहे हैं.

इन बीस सालों में ब्यूरो में रहने के कारण पद और पैसा ज्यादा नहीं बढ़ा मगर यदि ऑर्गनाइजेशन में रहकर बेहतर पत्रकारिता करने और नाम कमाने के सपने पूरे हो रहे हैं इससे बडा संतोष दूसरा नहीं. पीछे पलट कर देखने पर लगता है कि ये बीस साल कब गुजर गए पता ही नहीं लगा. क्योंकि रोज सुबह खबरों के साथ जागो. दोपहर भर नई- नई खबरों में उलझो और शाम होते- होते अगले दिन क्या खबर करेंगे, इस चिंता में सो जाओ.

अब ऐसे में लोग पूछते हैं कि भला कब तक टीवी करोगे. पीएचडी क्या अचार डालने के लिए की है. आ जाओ यूनिवर्सिटी में पढ़ाने. तो यही जवाब देता हूं, यार जब तक टीवी रिपोर्टिंग में मजा आता रहेगा, अपन माइक नहीं छोडेंगे. माना कि स्लॉग ओवर्स चल रहे हैं, मगर धोनी तो उन आखिरी के ओवरों में ही धूमधाम करता था, तो हम क्यूं नहीं कर सकते. इन बीस सालों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर अनेक लोगों ने मदद की. आज उन सबका एक बार फिर शुक्रिया.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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