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Blog: जब फैज़ ने अपनी महबूबा को लिखा, 'तुम मियां (पति) से महीने भर की छुट्टी लेकर हमारे पास आ जाओ...'

दो तरफी मुहब्बत में फैज ने सरफराज इकबाल से जमकर आशिकी की है, लेकिन जिस शिद्दत से सरफराज इकबाल ने फैज पर अपना प्यार लुटाया, उन्हें चाहा है, उसका अंदाज़ा फैज को लेकर सरफराज इकबाल के तसव्वुरात (कल्पनाओं), खयालात, लिखने के अंदाज़ और बयान से लगाया जा सकता है.

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया... फैज अहमद फैज की गज़ल का ये मिसरा (पंक्ति) कई लोगों की असली जिंदगी का सच हो सकता है, लेकिन कम से कम ये पंक्ति खुद फैज की असली जिंदगी की रचनात्मक आपबीती है. फैज़ को याद करने वाले उन्हें उनकी बेहतरीन नज़्मों और गज़लों के अलावा उनके क्रांतिकारी विचारों के लिए जानते हैं. उनके चाहने वाले उन्हें गालिब और इकबाल के बाद उर्दू का तीसरा सबसे बड़ा शायर मानते हैं. हर महफिल में उनके अदबी कारनामे का ज़िक्र होता है, लेकिन फैज़ की ज़िंदगी का एक सच इसके अलावा भी है. वो दुनिया इश्क की दुनिया है. अदबी (साहित्यिक) शौक और ज़ौक रखने वाली एक महिला उनकी जबरदस्त दीवानी थी, जिनका नाम था सरफराज इकबाल.

जब हम फैज को सरफराज इकबाल की नज़र से देखते हैं तो एक अलग ही दुनिया उभरकर आती है. सरफराज इकबाल ने फैज़ से अपनी मुहब्बत को ज़माने से नहीं छुपाया, बल्कि समाज के समाने पेश किया. फैज और सरफराज इकबाल में लंबा इश्क चला और इस दौरान फैज ने अपनी महबूबा को 56 चिट्ठियां लिखीं. सरफराज इकबाल फैज की इन चिट्ठियों को राज़ ही रखना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने इसे किताबी शक्ल में पेश करने का फैसला किया और उस किताब का नाम रखा 'दामन-ए-यूसुफ'. ये मुहब्बत के राज़, राज़ नहीं रहे इसकी वजह बताती हुईं सरफराज इकबाल लिखती हैं- 'फैज कौम की अमानत हैं. ... और चांद की रोशनी सिर्फ मेरे आंगन की असीर (कैदी) नहीं रह सकती.

इस दो तरफी मुहब्बत में फैज ने सरफराज इकबाल से जमकर आशिकी की है, लेकिन जिस शिद्दत से सरफराज इकबाल ने फैज पर अपना प्यार लुटाया, उन्हें चाहा है, उसका अंदाज़ा फैज को लेकर सरफराज इकबाल के तसव्वुरात (कल्पनाओं), खयालात, लिखने के अंदाज़ और बयान से लगाया जा सकता है.

सरफराज इकबाल अपनी किताब 'दामन-ए-यूसुफ' में टेलीफोन पर फैज से हुई पहली बातचीत का जिक्र कुछ इस अंदाज़ में करती हैं. ''फैज साहिब का फोन रीसीव करने के बाद मेरी उस रोज की हालत कोई नहीं जानता. अपनी बातों और अपने अंदाज से फैज साहिब मुझे कितने मासूम लगे थे और मेरा जी चाहा था कि मैं बाहर सेहन में बैठकर शगुफ्ता फूलों और मासूम चिड़ियों को देखते हुए सारी उम्र गुजार दूं या फिर उड़ते बादलों की नरमाहट से अपने मकान की दीवार पर इतनी बार फैज साहब का नाम लिखूं कि दीवारें और बादल दोनों खत्म हो जाएं...''

टेलीफोन पर पहली बातचीत के बाद सरफराज इकबाल को फैज साहब से मुलाकात का मौका मिला. ये मुलाकात कराची में हुई. फैज से अपनी पहली मुलाकात पर सरफराज इकबाल अपना हाल कुछ इस तरह बयान करती हैं, ''अगले रोज मैं रावलपिंडी वापस पहुंची तो फैज साहब मेरे लिए उस रोशन सितारे की मानिंद (जैसे) थे, अंधेरी रात के मुसाफिर जिससे रहनुमाई (नेतृत्व) हासिल करके मंजिलों के करीब तर होते हैं. मैंने फैसला कर लिया कि जब भी मुझे मुश्किल होगी मैं उनसे जरूर मशविरा (राय) करूंगी क्योंकि ये वो शख्स है जो मुझे यूं महसूस कर सकता है जैसे मैं खुद को महसूस करती हूं.'' लेकिन ये प्यार इकतरफा नहीं था. फैज़ भी सरफराज इकबाल को खूब चाहते थे. हालांकि, उनके प्यार में भरपूर शोखी थी.

faiz

सरफराज इकबाल को लिखे अपने खत में फैज अपनी मुहब्बत का इजहार कुछ इस तरह करते हैं, ''जो तुमने लिखा है, कैफियत (हालत) अपनी भी कुछ वैसी ही है. जहां तक बद (बुरी) आदतों का ताल्लुक है, तुम्हारी आदत हमें भी कुछ इतनी अजीज (प्यारी) पड़ चुकी है कि आंख खुलते ही, सबा (सुबह की हवा) के हाथ में नरमी है उनके हाथों की, का मजमून (विषय) जेहन में आता है.''

एक दूसरे खत में फैज अपनी महबूबा से कुछ इस तरह से मुखातिब हैं. जिसमें शोखी भी है और शरारत भी. ''... तु्म्हारे लिए अच्छी बात यही है कि हम तुम्हें टिकट भेजवा देते हैं, तुम मियां (पति) से महीने भर की छुट्टी लेकर हमारे पास आ जाओ और हम ज़मानत देते हैं कि तुम्हें सही सलामत वापस कर देंगे.''

एक दूसरी चिट्ठी में फैज़ अपनी महबूबा के दीदार को बेताब दिखते हैं. यहां भी वो जरा बिगड़े से दिख रहे हैं, ''तुमने हमने टीवी पर देख लिया, लेकिन हम कैसे देखें. शायर लोग कहते हैं कि दिल में तस्वीर रखनी चाहिए और, जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली. उससे ज्यादा आरामदह सूरत तो ही है कि बार बार गर्दन झुकाने के बजाए तस्वीर कहीं सामने ही रख ली जाए, लेकिन वो तो तस्वीर हुई, उससे बात कैसे की जाए या उसकी आवाज़ कैसे सुनी जाए.''

ये इश्क की कहानी, काफी लंबी है. लेकिन जिस अंदाज़ में फैज ने अपनी महबूबा पर इश्क निछावर किया है. मुमकिन है कि इसी वजह से गोपीचंद नारंग कहते हैं कि उनकी शायरी ऐसी है जैसे कोई बहुत प्यार से दिल के रुखसार पर हाथ रख दिए हों. गोपीचंद नारंग के मुताबिक उनकी शायरी दर्द-ए-मुहब्बत से भी चूर है. उनके हर नज़्म में, ग़ज़ल के एक-एक लफ्ज में यानि यूं मालूम होता कि खयाल की फूलझड़ी रोशन हो गई हो.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व्यक्तिगत हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार हैं.)

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