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राजनीति का कौन-सा 'डिस्को डांसर' बनना चाहते हैं अब मिथुन चक्रवर्ती?

साल 1982 में एक फ़िल्म आई थी 'डिस्को डांसर' जिसके मुख्य किरदार मिथुन चक्रवर्ती ने अपने डांस के जरिये उस जमाने की युवा पीढ़ी के दिमाग में दिवानगी का ऐसा खुमार पैदा कर दिया था कि तब पहली बार आरएसएस इतना चिंतित हुआ था कि, उसने कहा था - इस फिल्म के जरिये भारतीय सभ्यता-संस्कृति को कुचलने की ये ऐसी कोशिश है, जिसे रोका जाना चाहिए. उस जमाने में न तो न्यूज़ चैनल थे और न ही संघ प्रमुख अखबारों को इंटरव्यू देने में विश्वास रखते थे.

मिथुन चक्रवर्ती की वो फ़िल्म जब पर्दे पर रिलीज हुई थी, तब मधुकर दत्तात्रेय देवरस यानी बालासाहेब देवरस संघ प्रमुख थे. तब उन्होंने नागपुर से सिर्फ एक संदेश दिया था कि "पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा देने वाली इस फ़िल्म को देखने से हमें अपने बच्चों को रोकना होगा, अन्यथा आने वाले वर्षों में हमें इसके ऐसे दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे, जिसकी हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते." उनका ये संदेश देश के तमाम स्वयंसेवकों तक पहुंचने में चौबीस घंटे से ज्यादा का वक़्त नहीं लगा था. ये अलग बात है कि उस जमाने में भी 32 बरस की उम्र में डांस फ्लोर पर थिरकने वाले मिथुन की वह फ़िल्म हिट हो गई थी.

मिथुन चक्रवर्ती अब 72 बरस के हैं और फिल्मों की पारी खत्म करने के बाद राजनीति में कूदते ही उन्होंने सबसे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का ही दामन थामा था. ममता ने ही उन्हें अप्रैल 2014 में राज्यसभा भी भेजा था. लेकिन उसके बाद उन्होंने देखा कि केंद्र में बीजेपी का ही बोलबाला है, तो उन्होंने पुरानी सारी वफ़ादारी को दरकिनार करते हुए बीजेपी के झंडे तले आने में ही अपनी भलाई समझी. कहते भी हैं कि हमारे देश में राजनीति का चोला पहना तो 'सेवा' के लिए ही जाता है लेकिन उसमें पहला मकसद अपना स्वार्थ पूरा करना ही होता है.

बांग्लादेश के बारीसाल में एक बंगाली परिवार में जन्में गौरांग चक्रवर्ती यानी मिथुन दा फिल्मों में आने से पहले 70 के शुरुआती दशक में एक नक्सली रहे हैं, जो उस वक़्त के लोकप्रिय नक्सली नेता रवि रंजन के खास दोस्त हुआ करते थे, लेकिन वहीं मिथुन दा अब इतना बड़ा और ऐसा दावा कर रहे हैं, जिसे सुनकर कोलकाता से लेकर दिल्ली के सियासी गलियारों के नेता भी हैरान हैं. मिथुन चक्रवर्ती ने बुधवार को कोलकाता में ऐसा चौंकाने वाला दावा किया, जिसे सुनकर दिल्ली में बैठे बीजेपी के दिग्गज़ नेता भी चकित हो गए.

मिथुन चक्रवर्ती ने दावा किया है कि टीएमसी के 38 विधायक बीजेपी के संपर्क में हैं. उनके मुताबिक 21 विधायकों से वह खुद बातचीत कर रहे हैं. अगर हम उनके दावों पर पूरा यकीन भी कर लें, तब भी ममता सरकार पर तो कोई खतरा दिखता नहीं है, लिहाजा लोग पूछ रहे हैं कि ऐसा दावा करने का आखिर क्या मतलब है. वह इसलिये कि पिछले चुनाव में ममता बनर्जी को 294 में से 213 और बीजेपी को 77 सीटों पर जीत मिली थी, लेकिन अब बीजेपी के वहां 69 विधायक रह गए हैं और अगर मिथुन का दावा हकीकत में बदल भी जाये, तो 38 और विधायक मिलने के बाद यह आंकड़ा बढ़कर 107 हो जाएगा, लेकिन तब भी बंगाल में  बीजेपी की सरकार बनने से तो रही. बंगाल की सत्ता में आने का जादुई आंकड़ा 148 का है. लिहाजा अगर टीएमसी के ये विधायक टूट भी जाएं, तो बीजेपी को सरकार बनाने के लिए 41 और विधायकों की जरुरत होगी.

हालांकि दुनिया के बहुत सारे दार्शनिकों ने सियासत की तुलना उस वेश्या से की है, जिसके चरित्र व भविष्य के बारे में कोई नहीं जान सकता. इसलिये राजनीति की दुनिया में अगली सुबह क्या होने वाला है, ये ब्रेकिंग न्यूज़ भी मीडिया में बैठा कोई धुरंधर भी नहीं दे सकता.

बंगाल की राजनीति को देखते हुए मिथुन चक्रवर्ती का दावा थोड़ा अजीबोगरीब भी लगता है, इसलिये ममता बनर्जी की पार्टी के नेताओं ने भी बेहद संयत तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दी है. टीएमसी सांसद शांतनु सेन ने कहा कि "मैंने सुना है कि मिथुन चक्रवर्ती को कुछ दिन पहले एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था. मुझे लगता है कि वह मानसिक रूप से बीमार थे, शारीरिक रूप से नहीं. समस्या यह है कि वह राजनीति नहीं जानते हैं. इस तरह के बयान से जनता को बेवकूफ बनाने की कोशिश की जा रही है. इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है.”

लेकिन बड़ा सवाल है कि मिथुन चक्रवर्ती ने ऐसा दावा ही क्यों किया? इससे बीजेपी को फायदा तो शायद ही मिलेगा लेकिन ममता बनर्जी को उन्होंने केंद्र के खिलाफ हमलावर होने औऱ अपनी सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाने का एक मौका औऱ दे दिया.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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