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BLOG: माधुरी दीक्षित को फिल्मों में लाने वाले राज कुमार बड़जात्या का यूं चले जाना

अभी कुछ दिन पहले मुंबई में राजश्री के प्रभा देवी ऑफिस में जब राज कुमार बड़जात्या से मेरी मुलाकात हुई थी तो ऐसा बिलकुल नहीं लगा था कि यह उनके साथ आखिरी मुलाकात होगी. आज जब पता लगा कि राज कुमार बडजात्या नहीं रहे तो सुनकर दुःख हुआ. साथ ही उनके साथ पिछले करीब 35 बरसों में उनके साथ हुई कई मुलाकातों का लम्बा सिलसिला याद आने लगा. राज बाबू को कुछ बरसों से पुरानी बातों को भूलने की तो बीमारी थी. जिससे अब वह पुराने लोगों के साथ कई बार नयी बातें भी जल्द भूल जाते थे. इसके अलावा वह लगभग स्वस्थ थे. हमेशा की तरह वह गत 16 फरवरी तक अपने ऑफिस भी गए थे. लेकिन 18 फरवरी से वह अपनी कमर में दर्द के साथ खुद को असहज महसूस कर रहे थे. इसीलिए 19 फरवरी शाम को उन्हें हरकिशनदास रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में दाखिल कराया गया था. जहां आज 21 फरवरी सुबह साढ़े 10 बजे, दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया.

बरसों से देश की प्रतिष्ठित फिल्म संस्था राजश्री के संस्थापक सेठ तारा चंद बड़जात्या के सबसे बड़े पुत्र राज कुमार बड़जात्या को हम सभी राज बाबू कहकर पुकारते रहे हैं. राज बाबू का जन्म 14 मई 1941 को हुआ था. सेठ जी ने एक फिल्म वितरण कम्पनी के रूप में राजश्री की स्थापना तो सन 1947 में कर दी थी. लेकिन फिल्म निर्माण में राजश्री प्रोडक्शन तब आई जब सन 1962 में इन्होंने अपने बैनर की पहली फिल्म ‘आरती’ का निर्माण किया. सेठ जी ने फिल्मों के निर्माण की शुरुआत के साथ ही अपने बड़े बेटे राज बाबू के साथ दो और बेटों अजीत कुमार और कमलकुमार को भी अपने साथ ले लिया था. जिसमें राज बाबू की जिम्मेदारी फिल्म के निर्माण को लेकर थी. इस कारण राज बाबू राजश्री प्रोडक्शन की पहली फिल्म ‘आरती’ से गत 15 फरवरी को रिलीज़ हुयी फिल्म ‘हम चार’ तक सभी से जुड़े रहे.

इस दौरान राज बाबू फिल्म के विषय उसकी कहानी और उसके कलाकारों आदि के चयन में हमेशा अहम भूमिका निभातेथे. यूं राजश्री प्रोडक्शन में मेरा पहला परिचय सेठ तारा चंद बड़जात्या से था. जिनका प्यार और सत्कार मुझे बरसों मिला. सेठ जी से अच्छे और मधुर संबंधों के कारण ही मुझे राज बाबू भी बहुत प्रेम देते थे. मुझे याद है सन 1984 में सेठ जी की उपस्थिति में जब मैं राज बाबू से उनके प्रभा देवी ऑफिस में मिला तब वहां माधुरी दीक्षित भी बैठी थीं. माधुरी को तभी पहली बार राज बाबू ने फिल्म ‘अबोध’ के लिए अनुबंधित किया था. राज बाबू ने मुझे माधुरी से मिलवाते हुए कहा था- यह माधुरी हैं हमारी नयी फिल्म ‘अबोध’ की हीरोइन. मैंने जब माधुरी को देखा तो शर्माती, सकुचाती, पतली दुबली माधुरी ने हल्की सी मुस्कान के साथ मेरा अभिवादन किया. तब माधुरी को देख मैं सोच भी नहीं सकता था कि एक दिन यही माधुरी आगे चलकर एक शानदार अभिनेत्री और सुपर स्टार साबित होगी.

लेकिन सेठ जी और राज बाबू की जौहरी आंखें हमेशा हीरे को पहचानती रही हैं. सबसे ज्यादा नए चेहरों को मौके दिए यही कारण है कि फ़िल्मी दुनिया को जितने नए चेहरे राजश्री ने दिए हैं उतने और किसी फिल्मकार ने नहीं दिए. बहुत कम लोग जानते हैं कि फिल्म इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया, पुणे के छात्रों को भी फिल्मों में लेने का प्रचलन राजश्री ने ही चलाया. राज बाबू ने ही मुझे एक बार बताया था, जब जया भादुड़ी पुणे से अभिनय का प्रशिक्षण लेकर मुंबई आई तब उन्होंने ही सबसे पहले जया को अपनी फिल्म ‘उपहार’ के लिए 5 हज़ार रूपये में अनुबंधित किया था. यहां तक सलमान खान को भी सबसे पहले नायक प्रेम के रूप में राज बाबू ने ही अपनी फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ के लिए लिया था. उसके बाद तो सलमान राजश्री की फिल्मों के स्थायी प्रेम बन गए.

साथ ही अनुपम खेर, रामेश्वरी, मोहनीश बहल, भाग्यश्री, अरुण गोविल, ज़रीना वहाब, रंजीता, सचिन, सारिका, किरण वैराले, रीमा लागू, ज्ञान शिवपुरी, आलोक नाथ, हिमानी शिवपुरी जैसे और भी बहुत से कलाकारों को राजश्री ने ही पहली बार अपनी फिल्मों में लिया. साथ ही रविन्द्र जैन, राज कमल जैसे कई संगीतकारों के साथ कई निर्देशकों को भी पहले मौके इन्होने ही दिए. जिनके साथ राजश्री ने गीत गाता चल, सावन के आने दो, चितचोर, दुल्हन वही जो पिया मन भाये, अंखियों के झरोखों से, एक बार कहो, सारांश और हम आपके हैं कौन जैसी कई फ़िल्में कीं.

असल में देखा जाए तो राजश्री ने जहां अपनी पहली फिल्म ‘आरती’ तो बड़े कलाकारों मीना कुमारी प्रदीप कुमार और अशोक कुमार के साथ बनायीं थी. लेकिन अपनी दूसरी फिल्म ‘दोस्ती’ से उन्होंने फिल्म स्टार न लेकर नए कलाकारों को ही ज्यादा लिया जो आगे चलकर स्टार बने. अमिताभ, धर्मेन्द्र और राखी के साथ भी की फ़िल्में राज बाबू ने कुछ ऐसे कलाकारों को लेकर भी फ़िल्में बनायीं जो पहले कुछ फिल्मों में आ चुके थे लेकिन उन्हें ख़ास लोकप्रियता नहीं मिली थी. कुछ ऐसे कलाकार जो अपने शुरूआती करियर में राजश्री की फिल्मों में आए उनमें अमिताभ बच्चन के साथ सौदागर, धर्मेन्द्र, राखी के साथ जीवन मृत्यु और अनिल धवन के साथ पिया का घर और हनीमून जैसी फ़िल्में सेठ जी और राज बाबू ने कीं.

पुत्र सूरज बड़जात्या ने दी राजश्री को नयी पहचान राज कुमार बड़जात्या के एक ही बेटे हैं सूरज बड़जात्या. सूरज से पहले राजश्री की सभी फिल्मों का निर्देशन बाहर के निर्देशक करते थे. खुद राज बाबू या उनके भाई अजीत बाबू या कमल बाबू ने कभी खुद निर्देशक बनने का नहीं सोचा. लेकिन जब राजश्री ने ‘सारांश’ फिल्म बनायीं तब महेश भट्ट को इन्होने निर्देशक लिया. तब महेश भट्ट और इस फिल्म में पहली बार आए अनुपम खेर को तो लोकप्रियता और पुरस्कार मिले ही साथ ही महेश भट्ट की प्रतिभा से राज बाबू भी कायल हो गए. उन्होंने अपने बेटे सूरज की निर्देशन में दिलचस्पी देख उन्हें महेश भट्ट का सहायक बना दिया. इसके बाद सूरज के निर्देशन में सन 1989 में पहली फिल्म आई ‘मैंने प्यार किया’, जिसने सफलता लोकप्रियता का ऐसा नया इतिहास लिखा कि उसकी चमक अभी तक कायम है.

राजश्री इससे पहले कम बजट की फिल्म बनाते थे और उनकी हर फिल्म में कोई न कोई शिक्षा कोई न कोई सन्देश भी अवश्य होता था. साथ ही इस परिवार की यह विशेषता भी रही है कि अपनी फिल्मों में अश्लीलता को इन्होने कभी जगह नहीं दी. लेकिन ‘मैंने प्यार किया’ से पहले राजश्री की कुछ फ़िल्में लगातार फ्लॉप होने से लग रहा था कि राजश्री का जादू बदलते दौर में नहीं चलेगा. लेकिन सूरज ने राजश्री की परंपरा को बरकरार रखते हुए, राजश्री को एक नया शिखर दे दिया. हालांकि ’मैंने प्यार किया’ की अपार सफलता के बाद सेठ तारा चंद जी का निधन हो गया. ऐसे में उनके बड़े पुत्र राज बाबू पर बड़ी जिम्मेदारी आ गयी. वैसे राजश्री की सेठ जी के सामने से ही परंपरा रही है कि उनके यहां सभी फैसले सामूहिक रूप से लिए जाते हैं. लेकिन फिल्म के प्रोडक्शन, उसके निर्माण का ज़िम्मा मुख्यतः राज बाबू के पास पहले भी था और सेठ जी के बाद तो यह ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गयी.

यू तब फिल्म इंडस्ट्री में कुछ लोग सोचते थे कि सेठ जी के बाद राज बाबू और उनके भाई राजश्री की प्रतिष्ठा और सफलता शायद बरक़रार न रख पायें. लेकिन राज बाबू ने अपने भाइयों और पुत्र सूरज के साथ इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया. उसी का नतीजा था कि सेठ जी के बाद आई फिल्मों में राज बाबू ने जो भी फ़िल्में बनायीं वे भी अधिकतर सफल रहीं. चाहे हम आपके हैं कौन जैसी ब्लॉक बस्टर हो या हम साथ साथ हैं, विवाह, एक विवाह ऐसा भी और प्रेम रत्न धन पायो. इस दौरान उनकी एक ही बड़ी फिल्म ‘मैं प्रेम की दीवानी हूं’ नहीं चली.

फिल्मों के संस्कार घर परिवार में भी हैं बहुत से लोग जब आज राजश्री की फ़िल्में देखते हैं तो वे कहते हैं उनकी फिल्मों में परिवारों के जैसे संस्कार और परस्पर प्रेम मिलते हैं वैसे आज असल जिंदगी में कहां मिलते हैं. लेकिन यहां यह दिलचस्प है कि राजश्री परिवार के सभी सदस्यों के बीच आज भी वैसे ही संस्कार और प्रेम को देखा जा सकता है जैसा उनकी फिल्मों में मिलता है. राज बाबू, कमल बाबू और अजीत बाबू का पूरा परिवार आज भी संयुक्त परिवार के रूप में एक ही छत के नीचे एक साथ रहता है. मुंबई के वर्ली सी फेस पर राजश्री के शानदार बंगले में मेरा जब भी जाना हुआ मैंने देखा सभी सदस्य प्रेम और संस्कारों के साथ रहते हैं. इनके ऑफिस में भी ऐसे ही नज़ारे मिलते हैं. मुझे याद है जब तारा चंद बडजात्या ऑफिस नहीं जाते थे तो उनके कमरे में कोई और झांकने का साहस भी नहीं करता था.

सेठ जी के बाद काफी समय तक कोई उनके कमरे में नहीं बैठा. बाद में सूरज उस कमरे में बैठने लगे. लेकिन आज भी उस कमरे में कोई जूते चप्पल पहनकर नहीं जा सकता. कुछ समय पहले जब मैं राज बाबू से मिलने उनके ऑफिस गया तो उस दिन मेरी राज बाबू से छोटी सी ही मुलाकात हो पायी. क्योंकि वह कहीं निकल रहे थे. इसबात का दुःख मुझे हमेशा रहेगा. सूरज भी तब म्यूजिक की सिटिंग में बैठे थे लेकिन जैसे ही उन्हें बताया गया कि मैं आया हुआ हूं और राज बाबू को जल्दी में जाना पड़ा तो सूरज अपनी उस सिटिंग को छोड़कर तुरंत मेरे से मिलने आ गए. जबकि सूरज अक्सर मीडिया से बहुत कम उन्हीं दिनों में ही मिलते हैं जब इनकी कोई फिल्म रिलीज़ पर होती है. लेकिन वह जानते हैं कि मेरे उनके दादा जी और पिता जी से भी पुराने सम्बन्ध रहे हैं तो उसी का मान रखने के लिए वह अपना काम छोड़ मिलने के लिए आ गए.

काम ही सबसे बड़ा शौक था राज बाबू का यह भी एक संयोग है कि जहां सेठ जी का निधन 78 बरस की आयु में हुआ था वहीं राज बाबू का निधन भी 78 बरस की आयु में हुआ है. हालांकि सेठ जी ने अपने निधन से कुछ समय पहले ही ऑफिस के कार्यों में दिलचस्पी लेना कुछ कम कर दिया था. लेकिन ‘मैंने प्यार किया’ की सफलता से उनमें फिर से नया जोश आ गया था. लेकिन राज बाबू अभी भी बराबर नियमित ऑफिस जाते थे. उन्हे कुछ पढने का शौक तो रहता था लेकिन उनका सबसे बड़ा शौक सिर्फ काम और काम ही था. हमेशा नयी योजनाओं पर कुछ न कुछ काम करते रहते थे. फिल्म की शूटिंग के दौरान भी वह हर बात का ध्यान रखते थे.

मुझे सन 198की वह बात याद आती है जब उन्होंने अपनी फिल्म ‘बाबुल’ की शूटिंग के लिए मुझे इलाहबाद बुलाया था. वहीं पर पहली बार मेरी मुलाकात राज बाबू की पत्नी सुधा बड़जात्या से हुई थी. वह जितनी सुंदर थीं उतनी ही सुशील, संस्कारी और मधुर व्यवहार की थीं. लेकिन अफ़सोस वह कई बरस पहले ही दुनिया से कूच कर गयीं. सूरज को भी पहली बार मैंने वहीं देखा था. लेकिन राज बाबू वहां तपती गर्मी में भी लोकेशन पर शूटिंग की हर बात पर नज़र रखते हुए अपने सुझाव दे रहे थे. उससे साफ़ था कि वह एक फिल्म व्यवसायी ही नहीं रचनात्मक बातों का और फिल्म की हर विधा की पूरी जानकारी रखते हैं. राज बाबू की सफलता का भी शायद यही राज था.

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(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)
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