पूर्वांचल की रार: मोदी-माया का एक दूसरे पर वार
लोकसभा चुनाव अंतिम चरण में हैं। उत्तर प्रदेश में आखिरी दौर की जंग पूर्वांचल पहुंच चुकी है। इस दौर की लड़ाई बेहद दिलचस्प होती जा रही है। नेताओं की सियासी रार में में जाति की एंट्री हो चुकी है।

19 मई को सातवें और आखिरी चरण का लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, लेकिन आखिरी चरण आते-आते चुनाव ने 2019 की जंग ने एक बार फिर नया मोड़ ले लिया है, और इस बार चर्चा में हैं जाति का मुद्दा दरअसल आखिरी चरण में यूपी में सिर्फ पूर्वांचल की सीटों पर चुनाव होने हैं। यूं तो पूरे उत्तर प्रदेश में जातीय राजनीति का बोलबाला रहता है। लेकिन यूपी के इस इलाके में जाति का जोर इतना है जो विकास के मुद्दों को पीछे धकेल देता है। इसीलिये आखिरी दौर में एक बार फिर जाति का मुद्दा सबसे आगे आ गया है, और पूर्वांचल में इसी मुद्दे को लेकर पीएम मोदी और बसपा प्रमुख मायावती एक दूसरे पर हमलावर हैं और दोनों लगातार एक दूसरे पर जाति की राजनीति कर सियासी फायदा लेने का आरोप लगा रहे हैं।
दौर आखिरी है, दांव भी आखिरी है, इसलिए 2019 के महाभारत के सबसे बड़े रणक्षेत्र पूर्वांचल में अब महागठबंधन और भाजपा आमने-सामने हैं। कांग्रेस ने प्रियंका गांधी के तौर पर ट्रंप कार्ड चला जरूर है, लेकिन असली जंग तो पीएम मोदी और बसपा अध्यक्ष मायावती के बीच ही नजर आ रही है। पीएम मोदी ने कांग्रेस की सत्ता वाले राजस्थान में हुए एक गैंगरेप का हवाला देकर मायावती पर हल्ला बोला था।
पीएम मोदी ने एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की। पहला तो मायावती के कोर वोट बैंक में सेंध और दूसरा कांग्रेस को आरोपी बनाते हुए मायावती को कांग्रेस से दूर करने का, लेकिन चुनावी माहौल में विरोधी की चाल को काटते हुए मायावती ने पीएम मोदी पर तगड़ा पलटवार किया। पीएम मोदी की बातों को नौटंकी करार देते हुए मायावती ने अनुसूचित जातियों पर हुए अगले पिछले तमाम अत्याचारों का हवाला दिया। मायावती ने सहारनपुर में अनुसूचित जाति के खिलाफ हुई हिंसा के अलावा हैदराबाद यूनिवर्सिटी में अनुसूचित जाति के छात्र रोहित वेमुला के खुदकुशी मामले और गुजरात के ऊना में अनुसूचित जाति के लोगों के साथ बर्बरता के अलावा गुजरात में अनुसूचित जाति के युवक के घोड़ी पर चढ़ने पर हुए बवाल का भी जिक्र किया।सहारनपुर कांड को बुनियाद बनाकर मायावती पहले भी राजनीतिक गोटी चल चुकी हैं। जब उन्होंने सदस्यता खत्म होने से चंद महीने पहले ही अपनी राज्यसभा सीट से इस्तीफा दे दिया था ऐसे में चुनावी माहौल में भला विरोधी का दांव मायावती कैसे कामयाब होने दे सकती हैं।
मायावती ने पीएम मोदी पर पलटवार करते वक्त कांग्रेस को भी अल्टीमेटम दिया। उनका कहना है कि पीड़ित परिवार को इंसाफ नहीं मिला तो वो राजस्थान सरकार से समर्थन वापस ले सकती हैं यानी हर कोई दोतरफा वार करने में लगा है ताकि 2019 की महाभारत का विजेता बन सके लेकिन इसके लिए जिस वोटबैंक को बिसात बनाया जा रहा है उसे लेकर सवाल उठता है कि
क्या चुनावी सियासत से दलितों का कितना भला होगा? आखिरी दौर में दलितों पर जंग में कौन मारेगा बाज़ी? क्या पीएम मोदी के मायावती पर हमले इस बात का इशारा हैं कि पूर्वांचल की जंग में महागठबंधन के मुकाबले भाजपा कमज़ोर है?
जातिवादी राजनीति हमेशा से विकास के मुद्दों से ज्यादा बड़ा मुद्दा बन जाती है जाति की राजनीति तो सभी दल कर रहे हैं, लेकिन कोई भी दल इस बात को मानने को तैयार नहीं है। क्योंकि जातियों के जाल में जकड़े हमारे समाज में ऐसी राजनीति हमेशा से सभी पार्टियों के लिए फायदेमंद ही साबित हुई है। फिर चाहे वो क्षेत्रीय दल हों या राष्ट्रीय पार्टियां। ऐसे में जरूरत है कि जनता खुद ऐसे लोगों को नकारे जो उन्हें जातियों के खांचे में बांटकर सत्ता पाने की कोशिश कर रहे हैं।
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