केजरीवाल की हार से बदला राजनीति का व्याकरण, भाजपा को बिहार में होगा फायदा

एक दशक पूर्व दिल्ली की जनता ने बहुत ही अधिक आशाओं-अपेक्षाओं के साथ अरविंद केजरीवाल को भारी बहुमत प्रदान किया था, लेकिन "राजनीतिक स्थायित्व व कार्यकुशल शासन" का दावा दु:स्वप्न साबित हुआ. जनसरोकारों की चर्चा करते हुए आम आदमी पार्टी केजरीवाल के व्यक्तित्व पर केंद्रित हो गयी. अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लोगों को एक उम्मीद जगी थी. उन दिनों मुल्क के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हुआ करते थे और भाजपा विपक्षी दल का चोला त्यागकर सत्तारूढ़ होने के लिए बेचैन थी. कुमार विश्वास की शायरी और केजरीवाल के आदर्शवादी भाषण लोगों को लुभा रहे थे. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की जनता बिजली की महंगी दरों और स्वच्छ पेयजल की अनापूर्ति के संकट से जूझ रही थी.
दिल्ली ने दिल से दिया केजरीवाल का साथ
व्यवस्था परिवर्तन के वादे दिल्लीवासियों को ही नहीं बल्कि देशवासियों को भी लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की याद दिला रहे थे. लेकिन सत्ता के लिए लालायित केजरीवाल की पैंतरेबाज़ी को तब लोग नहीं समझ सके. अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर उन्होंने योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और कुमार विश्वास जैसे सहयोगियों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. जन-लोकपाल, भ्रष्टाचार और सूचना के अधिकार की अहमियत पर विमर्श करने वाले नेता को जब दिल्लीवासियों ने सत्ता के सौदागर के रूप में बदलते हुए देखा तो विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की सीटों की संख्या घटकर 22 हो गयी.
दिल्ली विधानसभा चुनाव में 48 सीटें जीतने के बाद भाजपा के हौसले बुलंद हैं और इस सफ़लता ने उसे इसी साल होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव के लिए नई ताकत दी है. भाजपा दिल्ली में 27 वर्षों के बाद सत्ता में वापस हुई है. अब तक पार्टी के कार्यकर्ता मदनलाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और सुषमा स्वराज के मुख्यमंत्रित्वकाल की चर्चा करके ही संतुष्ट हो जाते थे, लेकिन इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाना फायदेमंद साबित हुआ. रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री बना कर भाजपा ने एक तीर से कई शिकार किए हैं. पंजाबियों, बनियों, महिलाओं को एक साथ साधने के इस दांव से विपक्षी दलों के पास अब तरकश में तीरों की कमी हो गयी है. इससे केजरीवाल के साथ गए बनियों को भी एक बड़ा संदेश दिया गया है कि वे घरवापसी करें और भाजपा के ही बनकर रहें.
केजरीवाल की कहानी कमाल की
केजरीवाल के उत्थान और पतन की कहानियां किसी "फंतासी" से कम नहीं हैं. सादगी का स्वांग रचकर केजरीवाल लोगों को "वैकल्पिक राजनीति" के सपने देखने के लिए प्रेरित कर रहे थे. जंतर-मंतर पर हो रहे प्रदर्शनों में देश के सभी नेताओं को भ्रष्ट बताया जा रहा था. वीआईपी तामझाम का विरोध करने वाले केजरीवाल जब मुख्यमंत्री बने तो उनका आवास "शीशमहल" के रूप में मीडिया की सुर्खियां बटोरने लगा. यमुना नदी को प्रदूषण-मुक्त करने का उनका वादा वक्त की कसौटी पर खरा नहीं उतरा. अपने कार्यालय में शहीदे आजम भगत सिंह की फोटो लगा कर केजरीवाल देशवासियों की भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे थे. शराब घोटाले में खुद को निर्दोष बताने की उनकी दलीलों को लोगों ने सही नहीं माना क्योंकि उनकी कथनी और करनी में फर्क है. जेल से सरकार चलाने की शर्मनाक हरकत ने "मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल" की राजनीतिक विश्वनीयता खत्म कर दी. आतिशी मर्लेना को डमी मुख्यमंत्री बनाने की कवायद ने उन्हें उन सत्तालोलुप नेताओं की कतार में लाकर खड़ा कर दिया, जिनके विरुद्ध आवाज उठा कर वे ख्याति अर्जित किए थे.
AAP की दिशाहीनता शुभ संकेत नहीं
आंदोलन की कोख से जन्म लेने वाली पाॅलिटिकल पार्टी का दिशाहीन हो जाना, लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है. केजरीवाल के शासनकाल में दिल्ली में जनसुविधाओं का कितना विस्तार हुआ, इसके बारे में अगर सार्थक बहस होती है तो इस कदम का स्वागत होना चाहिए. 1980 के दशक में असमिया हितों की रक्षा हेतु प्रफुल्ल कुमार महंत के नेतृत्व में छात्रों ने लम्बे समय तक आंदोलन किया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ हुए समझौते के पश्चात् राज्य की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरूआत हुई. नवगठित असम गण परिषद को विधानसभा चुनाव में शानदार सफलता मिली और महंत राज्य के मुख्यमंत्री बने. बाद के वर्षों में असम गण परिषद और महंत दोनों ही असम की राजनीति में अप्रासंगिक हो गए. वैचारिक दृढ़ता के अभाव में महंत दीर्घकालिक कार्यक्रमों को वरीयता नहीं दे सके. कांग्रेस खुद को असम में सत्ता की दावेदार समझ रही थी. लेकिन राज्य की बुनियादी समस्याओं की उपेक्षा करने के कारण असमिया समाज के लोग उम्मीदभरी निगाहों से भाजपा की ओर देखने लगे जिसके फलस्वरूप यहां सत्ता परिवर्तन ही नहीं बल्कि "व्यवस्था परिवर्तन" भी हो गया. शरणार्थियों की बढ़ती जनसंख्या असम की राजनीति में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दा बना तो पूर्वोत्तर भारत की हवाओं में भाजपा के पक्ष में नारे गूंजने लगे.
गैरभाजपा दल राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति उदासीन हैं, इसलिए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी वे रोहिंग्या मुसलमानों को वोट बैंक के रूप में देखते हैं. एनआरसी-सीएए के खिलाफ हुए धरना-प्रदर्शनों का केंद्र बना शाहीनबाग राष्ट्रीय राजनीति का आदर्श स्वरूप नहीं पेश कर सका. केजरीवाल और कथित इंडिया गठबंधन के घटक दलों की धर्मनिरपेक्षता छद्म है जिसके कारण भाजपा का "हिंदुत्व और आर्थिक विकास" मध्यवर्ग को भा रहा है.
भाजपा का विरोध हो, देश के हितों का नहीं
दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार पराजित होने के बावजूद फिलहाल कांग्रेसी कार्यकर्ता अपनी पार्टी की जड़ों को मजबूती प्रदान करने के लिए चिंतित नहीं दिखाई देते हैं, बल्कि केजरीवाल की हार से वे खुश हैं. गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी पांच सीटें जीत कर और तेरह फीसदी वोट पाकर न केवल राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज हासिल की, बल्कि कांग्रेस के आधार को भी कमजोर कर दी. पंजाब विधानसभा चुनाव में अकाली दल व कांग्रेस के मंजे हुए नेता पीछे छूट गए और आप ने आश्चर्यजनक जीत दर्ज की. एक नवोदित राजनीतिक दल की इन उपलब्धियों से भाजपा ही नहीं बल्कि कांग्रेस भी परेशान थी, इसलिए लोकसभा चुनाव के दौरान कायम हुई विपक्षी एकता का दिल्ली विधानसभा चुनाव में इंतकाल हो गया.
झारखंड और बिहार ही नहीं बल्कि अन्य कई राज्यों में भी कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की जूनियर पार्टनर बन कर संतुष्ट है, जबकि भाजपा दिल्ली में जीत हासिल करने के बाद बिहार विधानसभा के चुनाव की तैयारियों में व्यस्त हो गयी है. राज्य के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का मानना है कि मोदी सरकार की बढ़ती लोकप्रियता के बलबूते भाजपा ने हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में जो शानदार सफलता पाई है, इसका अनुकूल प्रभाव बिहार पर भी पड़ेगा. हालांकि राजद नेता लालू यादव अपने चिरपरिचित अंदाज में बिहार विधानसभा के चुनाव में भाजपा की जीत के दावों को खारिज करते हैं. मुल्क के सियासी दंगल में सबको अपने-अपने दांव पर भरोसा है, लेकिन भाजपा ने अपने सांगठनिक कौशल के सहारे अन्य राजनीतिक दलों को पीछे छोड़ दिया है.
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]
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