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इलेक्टोरल बॉन्ड पर नागरिक अधिकारों की नज़र से हो मंथन, सरकारी तंत्र पर देशवासियों का टूटा है भरोसा

राजनीतिक चंदा के नाम पर इलेक्टोरल बॉन्ड के गोरखधंधे का सच हर दिन नये-नये रूप में देशवासियों के सामने आ रहा है. दूसरी तरफ़ लगातार तीसरा कार्यकाल हासिल करने की जिद्द-ओ-जहद में जुटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों के भरोसे को अपनी सबसे बड़ी पूँजी बता रहे हैं. आज़ाद भारत के इतिहास में संविधान लागू होने के बाद शुरू हुई भारतीय संसदीय व्यवस्था का यह सबसे बड़ा विरोधाभास है.

18वीं लोक सभा के लिए चुनाव कार्यक्रमों का एलान कर दिया गया है. पूरे देश में 19 अप्रैल से एक जून के बीच सात चरण में चुनाव होगा. मतगणना चार जून को होगी. इसके साथ देश में आदर्श आचार संहिता लागू हो गया है. आम चुनाव के दौरान ही अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में विधान सभा के लिए 19 अप्रैल को मतदान होगा. वहीं आंध्र प्रदेश विधान सभा के लिए  में 13 मई को वोटिंग होगी. ओडिशा विधान सभा के लिए 13 मई, 20 मई, 25 मई और एक जून को चार चरणों में मतदान होगा.

लोक सभा चुनाव और इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण

इस बार के चुनाव में इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण बड़ा मुद्दा साबित होने वाला है. नागरिक अधिकारों के लिहाज़ से ऐसा होना भी चाहिए. इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण देश के आम नागरिकों के अधिकारों और सरकारी तंत्र पर भरोसे के नज़रिये से काफ़ी अहमियत रखता है. हालाँकि इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण के इस पहलू को लेकर आम लोगों में समझ कम है. इसके बावजूद आम चुनाव में इस मसले के छाए रहने की पूरी संभावना है.

लोकतांत्रिक ढाँचे के तहत संवैधानिक संरक्षण मे संसदीय व्यवस्था की सफलता के लिए सहमति के साथ असहमति का भी उतना ही महत्व है. इसके साथ ही इस संदर्भ में सरकारी और राजनीतिक तंत्र पर आम लोगों का भरोसा काफ़ी मायने रखता है. जब तक देश के नागरिकों का सरकारी-राजनीतिक तंत्र पर भरोसा क़ायम है, संसदीय व्यवस्था की प्रासंगिकता बनी रहती है.

नागरिकों अधिकारों से खिलवाड़ का मसला

जैसे ही यह भरोसा टूटने लगता है, लोकतंत्र के तहत संसदीय व्यवस्था की नींव दरकने लगती है. इस भरोसे पर सबसे अधिक आघात तब होता है, जब सरकार ही नागरिकों के अधिकारों से खिलवाड़ करने लगती है. ऐसा संसद से पारित क़ानून को हथियार बनाकर किया जाने लगे, तो, फिर उस सरकारी व्यवस्था पर यक़ीन करना आम लोगों के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है. इलेक्टोरल बॉन्ड से पैदा हुए हालात ने देशवासियों को इस स्थिति में पहुँचा दिया है.

सरकारी तंत्र पर नागरिकों के भरोसे से जुड़ा है मुद्दा

इलेक्टोरल बॉन्ड के गोरखधंधे ने सरकारी तंत्र पर आम लोगों के भरोसे को झकझोर कर रख दिया है.  सवाल है कि इस भरोसे पर आँच आने के लिए कौन ज़िम्मेदार है. इसका जवाब सरल है. जो सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आयी, उसी की ज़िम्मेदारी भी बनती है. इस रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ज़िम्मेदारी और जवाबदेही सबसे अधिक है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार दोहराते रहते हैं कि देशवासियों का भरोसा उनके लिए बेहद मायने रखता है. ऐसे में सरकारी तंत्र पर आम लोगों के भरोसे को वापस पटरी पर लाने की ज़िम्मेदारी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही है.

इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से इतर विचार किए जाने की ज़रूरत है. देश के आम लोगों, ग़रीबों और वंचित वर्गों के लिहाज़ से पूरे प्रकरण पर मंथन की ज़रूरत है. भारत की जनसंख्या 140 करोड़ से अधिक हो गयी है. इनमें से बहुसंख्यक लोगों की संवैधानिक और राजनीतिक अधिकारों को लेकर सामान्य समझ काफ़ी सीमित है.

मूल अधिकारों की रक्षा सरकार की ज़िम्मेदारी

इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि ऐसे बहुसंख्यक लोगों की समझ इतनी ज़रूर है कि देश की सरकार उनके अधिकारों की रक्षा करेगी और उनके कल्याण के लिए काम करेगी. यह आम लोगों का भरोसा है. यह संवैधानिक और राजनीतिक जानकारी और समझ से भी परे और ऊपर की चीज़ है. किसी भी सत्ता, सरकार या राजनीतिक दल के पास आम लोगों के इस भरोसे को तोड़ने का अधिकार या शक्ति नहीं है. इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले में इस नज़रिये से विचार-विमर्श होना चाहिए.

प्रधानमंत्री मोदी बार-बार भरोसे की बात करते हैं

पूरे प्रकरण में संविधान से हासिल नागरिक अधिकारों के लिहाज़ से विचार किए जाने की ज़रूरत है. केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में मई 2014 से लगातार एनडीए की सरकार है. इस सरकार का लगातार दो कार्यकाल या'नी दस साल पूरा होने जा रहा है. लोक सभा चुनाव की तारीख़ों के एलान से एक दिन पहले 15 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'मेरे प्रिय परिवारजन' के साथ एक चिट्ठी जारी करते हैं. इसमें प्रधानमंत्री देश के 140 करोड़ लोगों को अपने परिवार का हिस्सा बताते हैं. इस रूप में देश के हर नागरिक के प्रति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर करते हैं.

इस चिट्ठी में इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण से आम लोगों के भरोसे को जो क्षति पहुँची है, उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ामोश रहते हैं. इसके बावजूद इस चिट्ठी में प्रधानमंत्री 5 बार 'विश्वास' शब्द और एक बार 'भरोसा' शब्द का इस्तेमाल करते हैं. आदर्श आचार संहिता लागू होने से पहले बतौर प्रधानमंत्री यह देशवासियों के नाम से आख़िरी चिट्ठी थी. इस चिट्ठी में प्रधानमंत्री का फोकस पूरी तरह से 'विश्वास' शब्द पर रहता है. हालाँकि जवाबदेही होने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इलेक्टोरल बॉन्ड से टूटे भरोसे की ज़िम्मेदारी इस चिट्ठी में स्वीकार नहीं करते हैं. यह चिंतनीय विषय है.

इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण से लोगों का भरोसा टूटा

इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण में शुरू से मोदी सरकार का रवैया जिस तरह से रहा है, उसे आम लोगों के नज़रिये से लोकतांत्रिक और संवैधानिक नहीं कहा जा सकता है. इसलिए ही आज ऐसी स्थिति बन गयी है कि पूरा का पूरा सरकारी सिस्टम ही संदेह के घेरे में आ गया है. इतना ही नहीं हमारे देश के राजनीतिक तंत्र में नागरिकों को कितना महत्व दिया जाता है, इसकी भी कलई इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण से खुलती है.

चाहे सरकारी तंत्र हो या राजनीतिक तंत्र, संवैधानिक संसदीय ढाँचे में देश के नागरिकों से ऊपर कोई नहीं है. इस ढाँचे में देश का आम नागरिक विधायिका या'नी संसद, कार्यपालिका या'नी सरकार और न्यायपालिका तीनों से ही ऊपर है. यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल मंत्र है. किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो या फिर संसद से पारित कोई भी क़ानून हो, इस मूल मंत्र से छेड़-छाड़ या छेड़-ख़ानी करने का अधिकार किसी के पास नहीं है. इलेक्टोरल बॉन्ड प्रकरण में मोदी सरकार ने इस मूल मंत्र को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया था. इसमें राजनीतिक दलों को सर्वोपरि बना दिया गया.

नागरिकों के मूल अधिकार से जुड़ा है पूरा मसला

इलेक्टोरल बॉन्ड के माध्यम से राजनीतिक दलों की स्वार्थसिद्धी के लिए नागरिक अधिकारों को विधायिका या'नी संसद का इस्तेमाल कर रौंद दिया गया. राजनीतिक दल की गतिविधियों को जानने का हक़ देश के हर नागरिक को है. ख़ासकर जिन गतिविधियों से राजनीतिक दलों के संचालन की शुचिता पर कोई आँच नहीं आए. राजनीतिक चंदा कैसे और किससे प्राप्त हो रहा है, इसकी जानकारी होना देश के नागरिकों का मूल अधिकार है. इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले में मोदी सरकार ने देश के नागरिकों से इस अधिकार को छीन लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी, 2024 को इसी तथ्य के आधार पर इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को असंवैधानिक क़रार देते हुए भविष्य के लिए इससे रद्द कर दिया था.

नागरिकों से ऊपर राजनीतिक दल भी नहीं

मोदी सरकार 2017 में इलेक्टोरल बॉन्ड लाने का फ़ैसला करती है. तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली आम बजट 2017-18 में इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़ी योजना को लाने का एलान करते हैं. इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के लिए मोदी सरकार राजनीतिक चंदा में पारदर्शिता को मुख्य आधार बनाती है. इस स्कीम को अरुण जेटली राजनीतिक पार्टियों के वित्त पोषण प्रणाली में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम बताते हैं. हालाँकि पूरी योजना को इस तरीक़े से लागू किया जाता है कि आम नागरिकों के लिए पारदर्शिता से जुड़ी हर खिड़की बंद हो जाती है. राजनीतिक चंदे के मोर्चे पर आम नागरिकों के लिए पारदर्शिता की गुंजाइश से जुड़ा छोटा-से-छोटा सूराख़ भी इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम से हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो जाता है.

गोपनीयता के नाम पर सरकारी मनमानी

इलेक्टोरल बॉन्ड की पूरी प्रक्रिया को समझने पर स्पष्ट हो जाता है कि राजनीतिक चंदे के इस खेल में मोदी सरकार महत्व के लिहाज़ से देश के आम लोगों को कहाँ पर रखी थी. 21वीं सदी और डिजिटल युग में मोदी सरकार गोपनीयता को स्कीम का आधार बनाती है. नागरिकों को किसी तरह से भी भनक नहीं लगे, इसके लिए गुमनाम राजनीतिक फंडिंग को क़ानूनी आवरण से ढक दिया जाता है. आम नागरिक के लिए डोनर का नाम जानना असंभव था. किस डोनर से किस राजनीतिक दल को लाभ मिला, आम नागरिक यह भी नहीं जान सकता था.

मोदी सरकार ने पूरी व्यवस्था की, जिससे इलेक्टोरल बॉन्ड तक नागरिकों की नज़र नहीं पहुँचे. इसके लिए चुनाव आयोग से लेकर आरबीआई की आपत्तियों तक को नज़र-अंदाज़ कर दिया. गोपनीयता को पुख़्ता करना था. इसके लिए मोदी सरकार की ओर से  फाइनेंस एक्ट, 2017 के माध्यम से तमाम क़ानूनों में बदलाव किए गए. इनमें आरबीआई अधिनियम, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, कंपनी अधिनियम से लेकर आयकर अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण क़ानून तक शामिल हैं. कंपनियों के लिए राजनीतिक चंदा देने की ऊपरी सीमा तक को इस तरह से हटा दिया गया कि घाटे में रहने वाली कंपनियाँ भी अब बॉन्ड से असीमित चंदा देने में सक्षम हो गयी. पहले कोई भी कंपनी पिछले तीन वर्षों में अपने शुद्ध लाभ का 7.5% ही राजनीतिक चंदा दे सकती थी.

इतना ही नहीं विदेशी कंपनियों से राजनीतिक दलों को चंदा हासिल करने में कोई परेशानी नहीं हो, इसके लिए मोदी सरकार ने विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम, 2010 (FCRA) के सेक्शन 2(1) में भी संशोधन कर दिया था. इससे विदेशी कंपनियों को भारत में रजिस्टर्ड सहायक कंपनियों के माध्यम से राजनीतिक दलों को चंदा देने की अनुमति मिल गयी थी.

गोपनीयता ज़रूरी है या नागरिक अधिकार

मोदी सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड की ख़रीद-बिक्री के लिए एकमात्र बैंक एसबीआई को अधिकृत करती है. व्यक्ति या कंपनी, जो भी डोनर हो, वो सिर्फ़ एसबीआई की चुनिंदा शाखाओं से ही बॉन्ड ख़रीद सकते थे. राजनीतिक दल डोनर से हासिल बॉन्ड को एसबीआई की चुनिंदा शाखाओं से ही भुना सकते थे. सिर्फ़ एक बैंक को इस काम के लिए चुनना अपने आप में बताने के काफ़ी है कि मोदी सरकार डोनर की गोपनीयता को लेकर बेहद चिंतित थी. इसके एवज़ में नागरिक अधिकारों की बलि चढ़ाने के लिए मोदी सरकार तैयार हो गयी.

राजनीतिक दल और नागरिकों के बीच खाई

मोदी सरकार के इस पूरे क़वा'इद में विपक्षी दलों को नुक़सान से जुड़ी राजनीतिक मंशा जो भी रही हो, वो अलग चर्चा का विषय है. लेकिन देश के आम नागरिकों के लिहाज़ से ग़ौर करें, तो इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम के माध्यम से मोदी सरकार ने आम नागरिकों और राजनीतिक दलों के बीच एक खाई पैदा कर दी. इस योजना के मुताबिक़ देश के आम नागरिकों से ऊपर राजनीतिक दलों को रख दिया गया. देश के क़ानून के लिहाज़ से राजनीतिक दलों को नागरिकों से सर्वोपरि मान लिया गया. देश के आम नागरिकों का एक-एक पैसा का हिसाब सरकार के पास होता है या सरकार ऐसी व्यवस्था बनाती है कि उसके पास नागरिकों के पाई-पाई का हिसाब हो. इसके विपरीत इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम में मोदी सरकार राजनीतिक दलों को नागरिकों के स्कैनिंग से बाहर कर देती है. राजनीतिक दलों को अपनी कमाई का कच्चा-चिट्ठा नागरिकों को बताने से छूट मिल जाती है.

अतीत में ग़लत हुआ है, तो, क्या आगे भी होगा?

इलेक्टोरल बॉन्ड का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है. आप राजनीतिक चंदे की व्यवस्था को बेहतर बनाने के नाम पर इस स्कीम को लेकर आए थे. पहले ग़लत हो रहा था, इसका यह मतलब नहीं है कि वर्तमान में या भविष्य में भी ग़लत होगा और आपको इस आधार पर छूट नही मिल जाती है कि पूर्ववर्ती सरकार में भी राजनीतिक चंदे को लेकर आम नागरिक अनभिज्ञ ही रहते थे. व्यवस्था को बेहतर करने का यह मतलब नहीं होता है कि सरकारी व्यवस्था में नागरिकों को ही गौण बना दिया जाए.

लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति होती है जवाबदेह

इलेक्टोरल बॉन्ड पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पर बात करें, तो, संसदीय व्यवस्था में सरकार की ज़िम्मेदारी और जवाबदेही पूरी तरह से देश की जनता के प्रति है, न कि विपक्षी दलों के प्रति.  सरकारी तंत्र को लेकर देश के नागरिकों का भरोसा डगमगाया है. ऐसे में मोदी सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है कि इस भरोसे को बरक़रार रखा जाए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जवाबदेही सबसे अधिक मायने रखती है. जनता का भरोसा बनाए रखने का एक ही तरीक़ा है कि मोदी सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़े हर सवाल, आरोप और आशंकाओं का जवाब जनता को दे. देश के एक-एक नागरिक को अपनी सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है.

पारदर्शिता नदारद, लेकिन काला धन का खेल!

मोदी सरकार उस वक़्त संसद से लेकर सड़क तक देशवासियों से कहती थी कि इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों की वित्‍त पोषण प्रणाली में पारदर्शिता के लिए लाया जा रहा है. अब इलेक्टोरल बॉन्ड असंवैधानिक घोषित हो गया है. देश के शीर्ष अदालत की सख़्ती से बॉन्ड से जुड़ी जानकारियाँ सार्वजनिक हो गयी हैं. पारदर्शिता की कसौटी पर पूरी तरह से नाकाम होने के बाद अब मोदी सरकार का कहना है कि राजनीति में से काला धन के वर्चस्व को समाप्त करने के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड को लाया गया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मसले पर कुछ नहीं बोल रहे हैं, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यही दलील दी है.

हालाँकि नागरिकों अधिकारों के लिहाज़ गृह मंत्री अमित शाह की इस दलील में दमख़म नहीं है. जब इलेक्टोरल बॉन्ड लाने के लिए मोदी सरकार एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही थी, उस वक़्त सबसे बड़ी आशंका यही थी कि इलेक्टोरल बॉन्ड का दुरुपयोग तो नहीं होगा. इस आशंका में कई पहलू जुड़ा हुआ था.

पहली आशंका  - राजनीतिक दल ग़लत तरीक़े से तो चंदा हासिल नहीं करेंगे.
दूसरी आशंका  - कारोबारी या कंपनी सरकारी परियोजनाओं में फ़ाइदा प्राप्त करने के लिए बॉन्ड को ज़रिया तो नहीं बना लेंगे.
तीसरी आशंका - राजनीतिक चंदा के मोर्चे पर सत्ताधारी दलों के लिए एकाधिकार की स्थित तो नहीं बन जाएगी.
चौथी आशंका   - कंपनियों या लोगों से राजनीतिक चंदा हासिल करने के लिए जाँच एजेंसियों का दुरुपयोग तो नहीं होने लगेगा. 
पाँचवीं आशंका - चुनावी बॉन्ड जाँच एजेंसियों के रडार से बाहर आने का माध्यम तो नहीं बन जाएगा. 
छठी आशंका   - सरकार या राजनीतिक दलों से किसी तरह का पक्ष या फेवर लेने के लिए इसका इस्तेमाल तो नहीं होगा. 
सातवीं आशंका - बॉन्ड के जऱिये राजनीतिक चंदा देने के लिए कंपनी या लोग काला धन का इस्तेमाल तो नहीं करेंगे.

काला धन का इस्तेमाल नहीं हुआ, गारंटी कौन लेगा?

अब इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी सार्वजनिक होने के बाद जैसे-जैसे रहस्यों से पर्दा उठ रहा है, तमाम आशंकाओं के सच होने की भरपूर गुंजाइश नज़र आ रही है. गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि काला धन का इस्तेमाल राजनीतिक चंदा में नहीं हो, इसलिए इलेक्टोरल बॉन्ड लाया गया. लेकिन इस स्कीम को अमल में लाने के लिए अपनायी जाने वाली पूरी प्रक्रिया में ऐसा कोई मैकेनिज्म या तंत्र नहीं दिखता है, जिससे यह गारंटी मिल जाए कि बॉन्ड ख़रीदने में काले धन का इस्तेमाल कंपनियों या लोगों ने नहीं किया होगा.

अगर इस तरह का कोई मैकेनिज्म था, जो पब्लिक डोमेन में नहीं है, तो, अब मोदी सरकार को जनता के सामने उसके बारे में बताना चाहिए. अब तक की जो प्रक्रिया पब्लिक डोमेन में है, उसके मुताबिक़ काला धन का इस्तेमाल होने की भी भरपूर गुंजाइश दिख रही है. योजना का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग या काले धन को सफ़ेद करने के लिए किया जा रहा है, इसके पक्ष में कई तरह के तथ्य और सुबूत सामने आ रहे हैं.

तमाम आशंकाएं आपराधिक पहलू के शामिल होने की ओर इशारा करती हैं, जिसकी पड़ताल सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जाँच के ज़रिये होनी चाहिए. ऐसा होने पर ही भ्रष्टाचार और सरकार या राजनीतिक दल और कॉर्पोरेट के बीच साँठ-गाँठ की आशंकाओं से जुड़ी सच्चाई सामने आ पाएगी. इससे सरकारी और राजनीतिक तंत्र पर आम लोगों के भरोसे को बनाए रखने में काफ़ी मदद मिलेगी.

नागरिक अधिकारों की कसौटी पर हो मंथन

पूरे प्रकरण में आपराधिक पहलू से इतर नागरिक अधिकारों के पैमाने पर भी आम लोगों की बीच व्यापक चर्चा की ज़रूरत है. ऐसा होने पर ही सरकार के साथ ही तमाम राजनीतिक दलों पर दबाव बनेगा. इससे भविष्य में सुनिश्चित हो पाएगा कि कोई भी सरकार या दल संविधान से हासिल नागरिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ नहीं कर पाए.

पारदर्शिता के नाम पर जिस स्कीम को लाया गया था, उसके ज़रिये संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (a) के साथ ही अनुच्छेद 14 का उल्लंघन किया गया है. सुप्रीम कोर्ट के 15 फरवरी के जजमेंट में भी इस बात को स्वीकार किया गया है. ये दोनों मूल अधिकार हैं. अनुच्छेद 19 (1) (a) में शामिल वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की आधारशिला है. इस अधिकार की ग़ैरमौजूदगी में देश के आम लोगों की तार्किक और आलोचनात्मक शक्ति का विकास करना मुमकिन नहीं है. उसी तरह से अनुच्छेद 14 में शामिल मूल अधिकार 'विधि के समक्ष समता' किसी भी प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था में 'रूल ऑफ लॉ' या'नी 'विधि का शासन' को स्थापित करता है. नागरिकों के महत्व को बनाए रखने के मद्द-ए-नज़र इन दोनों मूल अधिकारों की अहमियत बहुत अधिक है.

सम्मानपूर्ण और गरिमामय जीवन का मुद्दा

इसके साथ ही इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम से संविधान की उद्देशिका या'नी प्रीऐम्बल में निहित संवैधानिक सार का भी हनन किया गया है. संविधान की उद्देशिका की शुरूआत ही "हम, भारत के लोग" (WE, THE PEOPLE OF INDIA) से होती है और इन शब्दों से स्थापित होता है कि भारत में नागरिकों से ऊपर कोई नही है. इलेक्टोरल बॉन्ड में नागरिकों से ऊपर राजनीतिक दलों के स्वार्थ को रखकर संविधान की इस भावना को सरकार के स्तर पर नीस्त-नाबूद करने की कोशिश की गयी.

बतौर नागरिक सम्मानपूर्ण और गरिमामय जीवन जीने के लिए इन अधिकारों की काफ़ी अहमियत है. देश का हर नागरिक सम्मान पूर्वक और गरिमा के साथ जीवन बिताए, यह देश की सरकार की ज़िम्मेदारी और जवाबदेही दोनों है. यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हासिल मूल अधिकार "प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण" या'नी "प्रोटेक्शन ऑफ लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी" में अंतर्निहित है.

नागरिकों के ख़ौफ़ से क्यों बेपरवाह है सरकार?

इन संवैधानिक अधिकारों के प्रति देश के आम लोगों में अनभिज्ञता और लापरवाही का ही नतीजा है कि नागरिकों के ख़ौफ़ से बेपरवाह होकर सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड जैसा स्कीम ले आती है. यह भारतीय संसदीय व्यवस्था के तहत विकसित सरकारी और राजनीतिक तंत्र की विडम्बना है कि देश की शीर्ष अदालत से नागरिक अधिकारों की कसौटी पर इलेक्टोरल बॉन्ड के असंवैधानिक हो जाने के बावजूद भी मोदी सरकार अपनी ग़लती स्वीकार नहीं कर रही है. यह सरासर देश के आम नागरिकों के साथ छलावा है.

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे का है मुद्दा

भारतीय राजनीतिक तंत्र में अजीब प्रवृत्ति का विकास हो गया. सरकार जनता के प्रति जवाबदेह है, लेकिन जनता को जवाब देने में सरकार की कोई रुचि नहीं रह गयी है. इसके विपरीत सरकार विपक्षी दलों को जवाब देती नज़र आती है. विपक्षी दलों के आरोपों का जवाब देने के क़वा'इद में  नये-नये 'अजीब-ओ-ग़रीब तर्क गढ़कर अपनी ज़िम्मेदारियों से छुटकारा पा लेना चाहती है. इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले में भी ऐसा ही होता दिख रहा है.

मोदी सरकार की ओर से कोशिश की जा रही है कि विपक्षी दलों पर हमलावर होकर चुनावी बॉन्ड प्रकरण के पूरे विमर्श से नागरिक अधिकारों के महत्वपूर्ण और प्रासंगिक मुद्दे को ही नज़र-अंदाज़ कर दिया जाए. राजनीतिक दलों की इस नूरा-कुश्ती में नागरिकों के प्रति जवाबदेही से मोदी सरकार नहीं बच सकती है.

अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगता है कि देशवासियों का विश्वास ही उनकी पूँजी है, तो इलेक्टोरल बॉन्ड से आम लोगों का जो भरोसा टूटा है, उसे दुरुस्त करने के लिए उन्हें ख़ुद आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए. इस मसले से जुड़ी हर बारीकी पर प्रधानमंत्री को खुलकर बोलना चाहिए. इसके साथ ही उन्हें कोई ऐसी पहल करनी चाहिए, जिससे सरकारी-राजनीतिक तंत्र पर आम लोगों का भरोसा मज़बूत हो.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]

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