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सनातन धर्म में होली का बड़ा महत्व, भाईचारे-प्रेम को बढ़ाते रंगों के त्योहार की जानें पौराणिक कथा

सनातन धर्म एक ऐसा धर्म है, जो प्रकृति प्रदत्त धर्म है. यानी परमात्मा को किसी ने देखा नहीं लेकिन उनकी बनाई हुई सृष्टि को देखा है. इसी से उद्घोषणा होती है पंच महाभूत की, पंच तत्वों की और जो सत्य है वहीं शाश्वत है और शाश्वत है वहीं सनातन है. इस बात को हमें समझना पड़ेगा. अब सवाल उठता है कि सनातन धर्म के अंदर कोई भी पर्व या त्योहार चाहे वो सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग या कलयुग से संबंधित हो क्योंकि कालचक्र की दृष्टिकोण से युग को चार भागों में विभाजित किया गया है तो इसमें भगवान के दो स्वरूपों का प्रमाण है सनातन धर्म में जिसमें पहला निर्गुण और दूसरा सगुण है. निर्गुण निराकार का मतलब है जिसका कि कोई स्वरूप नहीं है. दूसरा सगुण का अर्थ है साकार जिसमें हमने माना की परमात्मा का भी कोई स्वरूप है. जब हम निर्गुण की बात करते हैं तो उसमें एक ओंकार का विचार आता है.

यानी कि महाशून्य, परम शक्ति एक है, कोई सुपर पावर है लेकिन जब हम सगुण की बात करते हैं तो उसमें भगवान के परमात्मा के अवतारवाद की अवधारणा प्रकट होती है तब यह विचार आता है कि भगवान धरती पर जब-जब आता है क्यों आता है, किस लिए आता है, कब आता है, कब-कब आएगा और कब आया तो वहां से हमको भगवान श्रीकृष्ण के गीता में  जो उद्घोष है वो कहा गया है यदा-यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मनं सृजाम्यहम्, परित्राणाय साधुनाम् विनाशाय च दुष्कृताम् धर्मसंस्था पनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे..यानी की जब जब धर्म को हानि पहुंचती है और असत्य और अधर्म बढ़ता है, अत्याचार बढ़ता है तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में आता है धरती पर उस अधर्म का नाश करने के लिए तो यह बात स्पष्ट होती है. ऐसे ही सतयुग में भगवान के अवतार का उल्लेख है, त्रेतायुग में है द्वापर युग में है और कलयुग में भी भगवान का उल्लेख है कि इस युग में भगवान का दसवां अवतार कल्कि के रूप में धरती पर आएगा. जिसे हमने भगवान विष्णु का अंतिम अवतार कहा है.

 खंभे को फाड़ कर नृसिंह अवतार के रूप में समाने आए भगवान 

अब आते हैं होली पर कि होली का सनातन धर्म से क्या संबंध है. तो जब हिरण्यकश्यप का अत्याचार धरती पर बढ़ रहा था और उसने भगवान की परम सत्ता को चुनौती दी. उस वक्त उसके घर में पुत्र पैदा हुआ जो भगवान का परम भक्त था जिसको प्रह्लाद के रूप में जाना जाता है. भारत में भक्त प्रहलाद की कथाएं सभी ने सुनी हैं और ये काफी चर्चित भी है...तो भक्त प्रह्लाद को समाप्त करने के लिए उनके खुद महाराज हिरण्यकश्यप ने कई प्रयास किए और जब उसमें वो सफल नहीं हो पाए तो अंत में उन्होंने अपनी बहन होलिका को उसको अपनी गोद में बैठा करके अग्नि में प्रवेश करने को कहा और सोचा कि भक्त प्रह्लाद समाप्त हो जाएगा. चूंकि वह हमेशा भगवान विष्णु का जाप करते थे नारायण, नारायण...तो हिरण्यकश्यप की जो लड़ाई थी वह भगवान विष्णु से थी और वह चाहता था कि मुझे भगवान के रूप में मानो तो उनका पुत्र कहता था कि आप में पिता हैं, राजा हैं लेकिन भगवान नहीं है. तो इसे आप चाहे वैचारिक दृष्टिकोण से देखिये या किसी और तरह से समझिये लेकिन यह हमारे पौराणिक कथाओं में आता है. जब होलिका प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश करती है तब प्रह्लाद भगवान का नाम लेते हैं उनका सुमिरन करते हैं तब तब होलिका उसमें भस्म हो जाती है. इसके बाद हिरण्यकश्यप फिर से प्रह्लाद को मारने का प्रयास करता है जिसमें खंभे को फाड़ कर नृसिंह अवतार के रूप में भगवान सामने आते हैं.

वृंदावन और बरसाने से होली का प्रसार जन-जन तक पहुंचा

नृसिंह अवतार के बारे में एक बड़ी ही रोचक कथा है कि जब हिरण्यकश्यप ने घोर तपस्या की और वरदान मांगने का समय आया तब उसने कहा कि मैं अमर हो जाऊं लेकिन अमर होने का वरदान मिलना संभव नहीं था तो फिर उसे कोई और वरदान मांगने को कहा गया मृत्यु को रोकने के लिए तो उसने बड़ी चतुराई से ब्रह्म जी से वर मांगा कि मेरी मृत्यु न दिन में हो न रात में हो, न अस्त्र से हो न शस्त्र से हो, न धरती पर हो न आकाश में हो, न सुबह हो न शाम हो तो इस तरह से उसने अपने आप को कवर किया. तो जब  प्रहलाद को मारने के लिए उसने अंतिम बार स्वयं हमला किया तो खंभ को फाड़ करके भगवान ने नरसिंह अवतार लिया. नृसिंह अवतार जो आधा नर के रूप में और आधे सिंह के रूप में अवतरित हुए क्योंकि हिरण्यकश्यप ने यह भी वरदान मांग रखा था कि उसकी मृत्यु न तो पशु से हो और न ही मानव से हो और उसका वध भी भगवान ने अपने नाखूनों से किया है और न धरती पर हो न आसमान में हो तो भगवान ने ब्रह्मा जी के वरदान की लाज रखते हुए अपने घुटनों पर उसका वध किया है और उस वक्त न तो दिन था न ही रात थी. उसके वध के लिए संध्या का समय चुना गया था. तो जहां तक सनातन धर्म और पौराणिक कथाओं से जहां तक होली का संबंध है तो इस तरह के प्रसंग आते हैं.

इसके बाद वहां होली मनाई गई. होली का पूजन हुआ लेकिन होली का दहन भी करते हैं और पूजन भी करते हैं क्योंकि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका थी वह भी एक शक्ति थी, माया का रूप थी और उसका दहन इसलिये किया जाता है कि क्योंकि उसने प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर बैठी और वहां अग्नि प्रज्वलित की गई. लेकिन उसका पूजन भी होती है क्योंकि वह अपनी मर्जी से प्रह्लाद का वध करना नहीं चाहती थी. इसलिए उसकी पूजा भी होती है. इसका जो प्रचलन फिर समाज में फैला उसके प्रसंग जो हैं वो त्रेता में भगवान राम की होली से लिया जाता है और द्वापर में इसको जन-जन तक पहुंचाने का काम श्रीकृष्ण के द्वारा हुआ जब बरसाने में गोपियों के साथ उनकी होली की प्रसंग शुरू हुई. उसको लोग ज्यादातर प्रचलन में लाए. आज भी आप देखेंगे कि इस प्राचीन परंपरा को जीवंत किया है वो वृंदावन और बरसाने ने किया है.

मनुष्य को हमेशा ये स्मरण रहना चाहिए कि वो इंसान है, भगवान नहीं

मुझे लगता है कि होली का जो संदेश है वो दो है. एक तो यह कि मनुष्य को हमेशा ये स्मरण रहना चाहिए कि वो इंसान है भगवान नहीं और उसको सत्ता का, धन-वैभव का, ऐश्वर्य का शक्ति का, बल का, जन समर्थन का या किसी भी चीज के द्वारा अर्जित की गई शक्ति का अहंकार नहीं होना चाहिए. एक तो यह संदेश है कि हिरण्यकश्यप जैसे महान शक्तिशाली राजा जिसको की तमाम तरह के कवच उपलब्ध हो गये थे वरदान के कारण वो भी नहीं बच पाया. इसलिये मनुष्य को कभी भी परमात्मा की सत्ता से अपने आप को ऊपर नहीं समझना चाहिए. दूसरा संदेश यह है कि होली जो है इंसान से इंसान के जो मत यानी दूरियां हैं उसको मिटा देती है.

यानी की हम एक परमात्मा की संतान हैं. हम सब एक हैं. एक ही भगवान है और हम सब उसके संतान हैं और वह सबका भगवान है. तो हम इंसानों के अंदर जो दूरियां हैं उसको कैसे मिटाया जाए. वो दूरियां चाहे जाति के नाम पर, धर्म के नाम पर या किसी सामाजिक विकृति के नाम पर, आयु के नाम पर वो दूरी धन के दृष्टिकोण से हो या अमीर-गरीब के नाम पर हो, देश की सीमाओं और भाषा के नाम पर हो यानी कि संपूर्ण मानवता एक है. ये होली का मैसेज है जो हमारे शास्त्रों से भी संबंधित है. हमारा शास्त्र भी यह कहता है और विश्व बंधुत्व का उद्घोष भी करता है हमारा भारत. वसुधैव कुटुम्बकम का उद्घोष करता है भारत जिसका अर्थ है पूरा संसार एक परिवार है. विश्व बंधुत्व मतलब बंधुत्व प्रेम और प्रेम मतलब सद्भावना के जो रंग हैं और जीवन को जियो उसे रंगीला रखें, ये संदेश स्पष्ट है.

होली प्रेम व सद्भावना का त्योहार है

देखो बाहर आप रंगों से होली खेलो तो अच्छी बात है. अभी हमने श्री कल्की धाम के अंदर हम रंग नहीं खेलते हैं फूलों की होली मनाई जाती है. अभी 5 मार्च को वहां फूलों की होली थी. हर वर्ष मनाई जाती है...तो आप फूलों से खेलें, चंदन टीका लगाएं या रंग गुलाल उड़ाएं. कहीं- कहीं गांव में लठमार होली होती है तो कहीं कीचड़ और गोबर से होली होती है. मेरा निवेदन है और अपनी समझ है कि ये होली खेलने के बाहरी तरीके हैं लेकिन होली तो भीतर है तो सबसे अच्छा होली मनाने का जो तरीका है वो प्रेम का रास्ता है. जब तुम किसी से प्रेम करोगे तो प्रतिदिन होली होगी. मेरी एक अपील है कि ऐसे रंगों का उपयोग न करें जिससे दूसरे की त्वचा को नुकसान पहुंचे. ऐसे गंदगी से होली न खेलें कि कोई बीमारी पैदा हो जाए.

मैं मानता हूं कि सभी लोग पढ़े-लिखे हैं वो इस बात को मानेंगे और होली किस लिए है प्रेम के लिए और जिससे तुम प्रेम करते हो उससे होली खेल लिए. लेकिन अगर आप होली खेलने के बहाने उसके चेहरे पर कीचड़ या केमिकल रंगों को लगा दो जिससे की उसकी त्वचा खराब हो जाए तो यह कैसी होली है. मुझे लगता है कि सभी लोगों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए. होली प्रेम का त्योहार है, सद्भावना का त्योहार है और मैं एबीपी लाइव के माध्यम से सभी को होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. ये आर्टिकल प्रमोद कृष्णम से बातचीत पर आधारित है.]

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