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किताब में जिन्ना की तारीफ का वो विवाद जिसने कभी नहीं छोड़ा जसवंत सिंह का साथ

अपनी किताब Jinnah: India, Partition, Independence में उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ की थी. इसके बाद जो विवाद हुआ उसने जसवंत सिंह का साथ नहीं छोड़ा.

बीजेपी के संस्थापक और केंद्र में रक्षा, वित्त और विदेश जैसे मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी सम्भाल चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह जसोल नहीं रहे. राजस्थान के थार इलाके के ‘शेर’ कहे जाने वाले जसवंत सिंह बाड़मेर के जसोल गांव के रहने वाले थे. एक सैनिक से राजनेता बने जसवंत सिंह को पूरे मारवाड़ इलाक़े में जनता ‘दाता’  के नाम से जानती थी.

अपने क़रीब चार दशक के राजनीतिक सफर में जसवंत सिंह ने यूं तो अनेक उतार चढ़ाव देखे लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना की जो तारीफ़ उन्होंने अपनी किताब ‘Jinnah: India, Partition, Independence’ में की थी उसकी वजह से जो विवाद खड़ा हुआ उसने जसवंत सिंह का साथ अंतिम समय तक नहीं छोड़ा.

जसवंत सिंह के जीवन में साल 2009 में ये मोड़ आया और इसकी उन्होंने क़ीमत भी चुकाई. उन्हें बीजेपी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. हालांकि इसके बाद साल 2010 में उनकी घर वापसी भी हुई लेकिन ‘जिन्ना के जिन्न’ ने थार के ‘शेर’ की धार को काफ़ी हद तक कुंद कर दिया.

इसी विवाद का नतीजा था कि जसवंत सिंह की बीजेपी में वापसी के बावजूद उन्हें साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बाड़मेर जैसलमेर सीट से पार्टी का उम्मीदवार नहीं बनाया गया. जसवंत सिंह इस चुनाव को लड़ने के लिए इस क़दर आतुर थे कि बीजेपी का टिकट कट जाने के बाद भी वो निर्दलीय चुनाव मैदान में कूद गए.

साल 2014 का ये चुनाव जसवंत सिंह के जीवन का अंतिम चुनाव साबित हुआ और इसके नतीजे में जसवंत सिंह के हिस्से क़रीब नब्बे हज़ार वोटों के अंतर से बड़ी हार आयी. बस यहीं से क़द्दावर नेता और जांबाज़ सेना अफ़सर रहे जसवंत सिंह के जीवन में अंधकार भी शुरू हो गया. किताब की वजह से हुई ज़िल्लत और रुसवाई के बाद चुनावी हार ने जसवंत सिंह को पूरी तरह तोड़कर रख दिया.

अगस्त 2014 में जसवंत सिंह अपने घर के बाथरूम में फिसलकर गिर गए. ये एक ऐसा हादसा था जिससे वे कभी भी उबर नहीं पाए. क़रीब छह साल तक वे कोमा में रहे और फिर 27 सितंबर 2020 को जिंदगी से बाज़ी हार गए.

जसवंत सिंह का राजनीति का अपना एक अलग अन्दाज़ था. खुद फ़ौजी थे जो जीवन भर उनके व्यक्तित्व में दिखाई भी दिया. हमेशा सार्वजनिक जीवन में फ़ौजी स्टाइल की कमीज उनका पहनावा और पहचान बनी रही.

मुझे याद पड़ता है वो दिन जो जसवंत सिंह के जीवन में शायद ही पहले कभी आया होगा. एक ऐसा पल और उसमें मिली शिकस्त जिसकी शायद जसवंत सिंह ने कभी कल्पना सपने में भी नहीं की होगी. अपनी किताब में जिन्ना की तारीफ़ कर विवादों में फंसे जसवंत सिंह समर्थन तलाश रहे थे. इसी दौरान वो एक बड़ी भूल कर गए. जातिवाद के दम पर उन्होंने एक ऐसा कार्ड खेल लिया जो उन्हें काफ़ी भारी पड़ा.

जसवंत सिंह राजस्थान के राजपूत जाति से थे. किताब के विवाद के बीच उनके जाति से जुड़े हज़ारों राजपूत भी उनके साथ जुड़ गए और बीजेपी से उनको निकालने का जगह जगह विरोध भी शुरू हो गया. अपने ‘दाता’ के समर्थन ने युवा राजपूत जगह जगह प्रदर्शन करने लगे थे. इसी दौरान मुझे ये खबर मिली कि जसवंत सिंह जयपुर आ रहे है और देश के पूर्व उप राष्ट्रपति और क़द्दावर राजपूत नेता भैरोंसिंह शेखावत से मिलने उनके घर जा रहे हैं.

ये अपने आप में बड़ी खबर थी क्योंकि भैरोंसिंह शेखावत भी क़द्दावर नेता थे और उनकी कही हर बात काफ़ी मायने रखती थी. खबर इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि जसवंत सिंह का राजनीतिक वर्चस्व दांव पर लगा था और ऐसे में उनकी यानि एक राजपूत नेता की दूसरे क़द्दावर राजपूत नेता शेखावत से मुलाक़ात कई मायने में सियासी भूचाल की वजह बन सकती थी.

शेखावत उन दिनों जयपुर के सिविल लाइन इलाक़े के एक बड़े सरकारी बंगले में रहते थे. जसवंत सिंह को वहां क़रीब दोपहर तीन बजे पहुंचना था. लेकिन पूरा मीडिया तो दो बजे से ही शेखावत के बंगले के बड़े लॉन में जम चुका था. मैं भी अपने वहां पहुंच चुका था अब बस इंतज़ार था जसवंत सिंह और एक बड़ी खबर का.

तीन बजे का वक़्त बीत गया मगर जसवंत सिंह वहां नहीं आए. इंतज़ार जारी था और एक बड़ी टेबल पर रखे मीडिया के दर्जनों माइक इस बात इशारा कर रहे थे कि कुछ तो बड़ा होगा. लेकिन जसवंत सिंह आ नहीं रहे थे. क़रीब साढ़े तीन बजे एकाएक नारों का शोर सुनाई दी, ‘जय भवानी और जसवंत तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं.’

एक के बाद एक कई वाहन शेखावत के घर के भीतर दाखिल हुए. इनमें कुछ खुली जीप भी शामिल थी जिनमें सवार थे दर्जनों युवा राजपूत. ‘दाता तुम संघर्ष करो’ के नारों के बीच जसवंत सिंह मीडिया के बीच आए. जसवंत बैठे और तभी भैरोंसिंह शेखावत भी अपने कमरे से निकलकर लॉन में आ गए. दोनों राजपूत नेता अग़ल बग़ल की कुर्सी पर बैठ गए. तब तक नारों का शोर भी थम चुका था और पूरा माहौल बिल्कुल शांत. सारे माइक जसवंत सिंह के सामने रखे थे और उन्होंने बोलना शुरु किया. उन्होंने जो बोला वो सब वही था जो वो अपनी सफ़ाई में लगातार बोल रहे थे. मीडिया की दिलचस्पी शेखावत में थी कि आख़िर वो क्या बोलते हैं?

जसवंत की बात पूरी हुई और उन्होंने आख़िर में कहा कि अब ठाकुर साहब यानी शेखावत जी इस पूरे मामले में अपनी बात कहेंगे. ये कहकर खुद जसवंत सिंह ने सारे मीडिया माइक अपने हाथ से शेखावत के सामने कर दिए. अब सबको बस ठाकुर साहब की प्रतिक्रिया का इंतज़ार था. शेखावत ने बिना किसी भूमिका के अपनी बात कुछ ऐसे शुरु की.

शेखावत ने कहा, “जसवंत सिंह जी मैंने अभी आपकी पूरी बात सुनी. आपने बीजेपी से लेकर अपनी किताब तक पर खूब बोला लेकिन मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूं कि राजनीति में पार्टी से बड़ा कोई नहीं होता. न आप और न मैं और न कोई और.”

शेखावत की इन आख़री लाइन ने मानों बम फोड़ दिए हों. अचानक नारे लगाने वाले मायूस दिखने लगे और खुद जसवंत सिंह भी बड़ी विचित्र हालत में घिरे दिखने लगे. वो जिस समर्थन की उम्मीद लेकर आए थे वो उन्हें नहीं मिला. उल्टे शेखावत ने उन्हें सीधे सीधे नसीहत दे डाली. कुछ मिनट के भीतर पूरा लॉन ख़ाली दिख रहा था और शेखावत अपने कमरे में सोफ़े पर बैठे थे लेकिन अकेले, क्योंकि जसवंत सिंह और उनके समर्थकों का क़ाफ़िला बाहर लॉन से रुखसत हो चुका था.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)

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