कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए.के. एंटनी के बेटे अनिल एंटनी और संयुक्त आंध्र प्रदेश के आखिरी मुख्यमंत्री और चार बार से विधायक रहे एन. किरण रेड्डी का कांग्रेस छोड़ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना मेरे लिए कोई अद्भूत न्यूज़ नहीं है. जहां तक अनिल एंटनी की बात है तो उन्हें मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं. पिछले करीब 7-8 वर्षों से अनिल एंटनी को देखता रहा हूं. मैंने ये भी देखा है कि अनिल एंटनी के बीजेपी में शामिल होने पर पूर्व रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने दुख व्यक्त किया है.


केरल में एंटनी के बेटे का बीजेपी से जुड़ना एक इंडिपेंडेंट थॉट प्रोसेस हैं. अनिल एंटनी बहुत ही सुलझे हुए और पढ़े-लिखे शख्स हैं. मैं कांस्टीट्यूशन क्लब में उस वक्त अनिल एंटनी से मिलता था या फिर देखा करता था, जब उनके पिता सत्ता में थे. ये जमीन से जुड़ा हुआ और बहुत साधारण है. कभी अपने पिता के चोला को पहनकर बाहर नहीं दिखते थे.


कांग्रेस में बगावत की झड़ी


ऐसे लोग जब पार्टी में आते हैं तो बीजेपी को लेकर कहीं न कहीं देश के लोगों के बीच एक प्रतीकात्मक पहचान बन रही है. एके एंटनी के बेटे का बीजेपी में आना, ये हिन्दुत्व के आधार पर नहीं बल्कि राष्ट्रीयता, सोच, देश की दिशा और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के आस्था के आधार पर मुमकिन हुआ है. आज कांग्रेस में वैसे भी बगावत की झड़ी है. जो नई पीढ़ी की कांग्रेस है वो कांग्रेस नेतृत्व से उब चुका है. ये तो एक पहलू है ही, लेकिन दूसरा पहलू भारतीय जनता पार्टी है.



जहां तक आंध्र प्रदेश की बात है तो वहां पर भी एक बड़ा वैक्यूम है. कांग्रेस वहां पर विकल्प में है ही नहीं. इससे स्वभाविक है कि बीजेपी की तरफ लोग देख रहे हैं. आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद बड़ी पार्टी के तौर पर बीजेपी वहां पर उभर कर सामने आ रही है.  एन. किरण रेड्डी का आना अपने आप में इस बात को प्रमाणित करता है. इसलिए देश में, खासतौर पर दक्षिण भारत में बीजेपी का विस्तार प्रत्यक्ष रूप से दिख रहा है. आने वाले समय में हमारी बड़ी भूमिका दक्षिण में होगी.


दक्षिण भारत में बढ़ रहा बीजेपी का कद


बीजेपी का विस्तार एक लक्ष्य के साथ हो रहा है. इसमें बड़े-बड़े नेताओं का पार्टी में जुड़ना, सांकेतिक तौर पर एंटनी परिवार का केरल में जुड़ना, ये सब अपने आप में प्रमाण है कि पार्टी का कद बड़ा हो रहा है. जहां तक लेफ्ट की बात है, तो पश्चिम बंगाल से बाहर, केरल से बाहर अब तो उनका एक प्रतीकात्मक संदर्भ ही रह गया है. मैं समझता हूं कि अब लेफ्ट का देश में कोई संदर्भ बचा हो, ऐसा नहीं लगता है. इस पर हम बात करके अपना समय व्यर्थ न करें जब तक कि वो कुछ सैद्धांतिक रुप से  घोषणा न करते हों. वामपंथी दलों का जनाधार देश से बिल्कुल विलुप्त हो चुका है.


जहां तक वंशवाद को बढ़ावा देने वाली बात है तो बीजेपी में न कभी ऐसी कोई परंपरा रही है और न ऐसा है. ये तो पार्टी का विस्तार हो रहा है और ये अगली पीढ़ी है. वंशवाद तो ये होता है कि जब एक घर के परिवार को बुलाकर जिम्मेदारी दी जाए. भारतीय जनता पार्टी में ऐसी कोई परंपरा नहीं है. न रहेगी और न ऐसा कुछ होने वाला है और न देश के प्रधानमंत्री इस पर कोई सहमति दिखाएंगे. सैद्धांतिक रुप से हम लोगों का एक साधारण कार्यकर्ता भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है. यही पीएम मोदी  ने प्रमाणित किया है. इसलिए, वंशवाद वगैरह तो वहीं लागू होता है, जहां से होता रहा है.


बीजेपी स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने करीब 50 मिनट तक भावनात्मक स्पीच दी. इस दौरान उन्होंने बताया कि किस तरह से भारतीय जनता पार्टी वंशवाद के खिलाफ और जातीय समीकरण के खिलाफ लड़ कर एक सैद्धांतिक तौर से एक पहचान के साथ आगे आयी है. 50वें वर्षगांठ की तैयारी भी बीजेपी जोर-शोर से करेगी. हमारे पास सिद्धांत था, देश की एक सहमति थी और आज हमलोगों ने देश के लोगों के  उस महत्वाकांक्षा को पूरा किया है.


बिहार में कोई शासन नहीं


रामनवमी के दौरान भारी हिंसा भड़की. यहां पर कोई शासन नहीं है. मुझे लगता है कि बिहार में जो दंगा हुआ वो पूरी तरह से सुनियोजित था और ये दुर्भाग्यपूर्ण था. 15 साल लालू यादव और 20 साल नीतीश कुमार. बिहार एक परिवर्तन की तरफ बढ़ रहा है. यहां पर परिवर्तन इस बार निश्चित है. 35 साल के कार्यकाल के बाद बिहार विधानसभा में एक बड़ी बहुमत भारतीय जनता पार्टी को आएगी. मैं आपको लिखकर देता हूं कि बिहार विधानसभा में अगली बार इन दो भाइयों के बीच से सरकार बाहर निकल जाएगी और ऐसा प्रोग्रेसिव सरकार जो भारतीय जनता पार्टी ने देश में स्थापित किया है. बिहार में बड़ा परिवर्तन के आसार धरती पर दिख रहे हैं. मैं तो बिहार में एक बहुत बड़ा अभियान चला रहा हूं कि बैकवर्ड और फॉरवर्ड के नाम पर ये राजनीति नहीं चल सकती है. जाति के नाम पर राजनीति नहीं चल सकती है.


मैंने तो यहां तक कहा कि राजीव प्रताप रुडी फॉरवर्ड जाति का है, लेकिन अगर राज्य बैकवर्ड है तो मैं फॉरवर्ड कैसे हो सकता हूं. जिस राज्य को 4 करोड़ लोग 35 वर्ष के सिर्फ दो व्यक्तियों के कार्यकाल में छोड़कर चले गए, ऐसे में सवालों में घिरा है बिहार की सरकार. बिहार की सरकार अपनी अंतिम सांस ले रही है.  


[ये निजी विचारों पर आधारित आर्टिकल है]