राष्ट्रीय बालिका दिवस : बाल विवाह को समाप्त करने के लिए अब कार्रवाई का समय

24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस है. ये दिन पूरे देश में लाखों लड़कियों के बारे में शिद्दत से सोचने, कार्रवाई करने और सबसे बढ़कर उन लड़कियों के जीवन को बदलने की प्रतिबद्धता का दिन है, जो लंबे समय से भेदभाव और असमानता के चक्र में फंसी हुई हैं. इसलिए अब इस दिन को एकदिवसीय आयोजन की मानसिकता से बाहर निकालकर सच स्वीकारने और सामूहिक भागीदारी से तमाम संकल्पों पर कार्रवाई का दिन बनाना होगा.
बाल विवाह
भारत समेत दुनियाभर में बाल विवाह आज भी लड़कियों के बचपन, स्वास्थ्य, शिक्षा और करियर पर सबसे बड़ा ग्रहण है. 21 सदी में भी परंपराओं की बेड़ियां इतनी मजबूत हैं कि पसंद के बजाय केवल स्वीकार की मांग करती हैं. लाखों लड़कियों के लिए यह दु:स्वप्न एक वास्तविकता है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के एक तिहाई बाल विवाह पीड़ित भारत में हैं. ये केवल आंकड़े नहीं हैं, ये छीने गए अवसरों और रौंदे गए जीवन की कहानियां हैं.
बदलाव की शुरुआत
लेकिन अब बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता के साथ बदलाव की लहरें पिछले साल की शुरुआत से ही उठ चुकी हैं. जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन (जेआरसी) ने अपने 250 से ज्यादा सहयोगी संगठनों के साथ भारत के गांवों में बाल विवाह को खत्म करने के लिए एक अनूठा आंदोलन शुरू किया. एक तरफ शपथ और जनसंचार के जरिए जागरूकता के प्रसार पर फोकस किया गया जबकि दूसरी तरफ कानूनी हस्तक्षेपों पर भी जोर दिया गया. देश से इस अपराध के खत्मे और बदलाव के लिए जेआरसी ने न्यायपालिका की ओर रुख किया.
जेआरसी की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान उच्च न्यायालय ने अक्षय तृतीया ( क्योंकि इस दिन बाल विवाह सबसे ज्यादा होता है) से पहले एक फैसला सुनाया कि राजस्थान के गांवों में अक्षय तृतीया के मौके पर बाल विवाह के लिए पंचायतों को जवाबदेह ठहराया जाएगा. इसके बाद बाल विवाह को खत्म करने के लिए दिशानिर्देश जारी करने वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया. इसी क्रम में गत वर्ष 27 नवंबर को भारत सरकार ने सदियों पुराने इस अपराध को खत्म करने और सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में कदम उठाते हुए 2030 तक 'बाल विवाह मुक्त भारत' के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया.
भारत से प्रेरित हुए देश
नीतिगत स्तर पर इन कदमों ने परिवर्तनकारी बदलावों की नींव रखी है. इससे लड़कियों के लिए एक पूरा इकोसिस्टम बदल रहा है ताकि वे इस सामाजिक अपराध को नकार कर अपने सपनों को साकार कर सकें. इस कदम का ऐसा असर हुआ है कि 2024 के आखिरी दिन पड़ोसी देश नेपाल ने भी जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन और ‘बेस’ नेपाल के समर्थन से ‘बाल विवाह मुक्त नेपाल’ अभियान शुरू किया. बदलाव की यह शुरुआत जनांदोलन बने, इसलिए राष्ट्रीय बालिका दिवस पर बेटियों को सभी मानदंडों पर सशक्त बनाना है ताकि वो खुद को बचाने में सक्षम हो पाएं और कुप्रथाओं व सामाजिक अपराधों को चुनौती देकर बदलाव का वाहक बनें. शिक्षा, कौशल और परामर्श वे उपकरण हैं जो उन्हें इस लड़ाई के लिए तैयार करते हैं. शिक्षा शोषण के खिलाफ एक ढाल है. जो लड़कियां स्कूल में पढ़ती हैं, उनके बाल विवाह के लिए मजबूर होने के बजाय सम्मानजनक जीवन जीने की अधिक संभावना रहती है.
लेकिन राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा किए गए राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण का निष्कर्ष चौंकाने वाला है. इसके अनुसार देश में अभी करीब 11 लाख से अधिक छात्र हैं जो या तो एक महीने तक अनुपस्थित रहे या पढ़ाई छोड़ चुके हैं. इनमें से प्रत्येक बच्चा बाल विवाह के प्रति संवेदनशील है और उसे वापस स्कूल लाने की आवश्यकता है. जैसा कि जाने-माने बाल अधिकार कार्यकर्ता और लेखक भुवन ऋभु ने अपनी पुस्तक, "व्हेन चिल्ड्रन हैव चिल्ड्रेन: टिपिंग पॉइंट टू एंड चाइल्ड मैरिज" में लिखा है, “बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रौद्योगिकी का बेहतर उपयोग किया जा सकता है. डिजिटल प्लेटफॉर्म और उपकरणों की क्षमता का उपयोग बाल विवाह के जोखिम में या इससे प्रभावित लड़कियों को सूचना, शिक्षा, सेवाएं और सहायता प्रदान करने के लिए किया जा सकता है."
गौरतलब है कि 95.4 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोक्ताओं वाले भारत में बाल विवाह के खतरे के प्रति संवेदनशील बच्चों की पहचान करने और उन्हें बचाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग एक गेम चेंजर हो सकता है. बस हमें उन्हें यह बताने की जरूरत है कि उनके अधिकार क्या हैं, बाकी सब अपने आप हो जाएगा. स्कूलों, सामुदायिक केंद्रों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को विवाह की कानूनी उम्र, बाल विवाह के दुष्परिणामों और जबरन बाल विवाह की स्थिति में किससे संपर्क करना है, इस बारे में जागरूक करने की जरूरत है. इसके बाद बालिकाओं का सशक्तीकरण अपने आप होता चला जाएगा क्योंकि उन्हें पता होगा कि सरकार, कानून और व्यवस्था दोनों उनके साथ हैं और तब हर सशक्त लड़की अपनी भाग्यविधाता होगी.
प्रोत्साहन एक रणनीतिक उपकरण
बाल विवाह के सबसे गंभीर कारणों में से एक गरीबी है. माता-पिता अक्सर आर्थिक तंगी और जागरूकता की कमी के चलते कम उम्र में अपनी बेटियों की शादी कर देते हैं. इस संदर्भ में आर्थिक सहायता के जरिए शिक्षा को प्रोत्साहित कर बाल विवाह से निपटने में प्रोत्साहन एक शक्तिशाली उपकरण साबित हुआ है. हालांकि केंद्र और कई राज्य सरकारों ने इस तरह की योजनाओं को लागू भी किया है. जैसे बालिका समृद्धि योजना, सीबीएसई उड़ान योजना, मध्य प्रदेश की लाड़ली लक्ष्मी योजना, पश्चिम बंगाल सरकार की कन्याश्री प्रकल्प योजना, उत्तर प्रदेश की कन्या सुमंगला योजना आदि. इन योजनाओं के तहत लड़कियों को अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है जिससे स्कूल छोड़ने की दर में उल्लेखनीय कमी आती है और बाल विवाह की दर भी घटती है.
बाल विवाह मुक्त भारत के लिए आगे की राह
राष्ट्रीय बालिका दिवस केवल कैलेंडर पर एक तारीख बनकर न रह जाए इसलिए इस दिन पर कार्रवाई का स्पष्ट आह्वान हो. क्योंकि लड़कियों को सशक्त बनाना सिर्फ नैतिकता का तकाजा ही नहीं बल्कि सामाजिक अनिवार्यता है. हमें बाल विवाह की बेड़ियों को तोड़कर समानता की संस्कृति को बढ़ावा देकर एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना है, जहां हर लड़की आजादी से सपने देखे और उसे साकार करे. आइए साथ मिलकर हम एक ऐसी दुनिया बनाएं जहां बेटियां अपनी नियति के पन्ने खुद लिखें और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करें.
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]
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