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चीन की शह पर भारत से आखिर क्यों पंगा लेना चाहता है नेपाल?

नेपाल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है और भारतीय क्षेत्र में लगातार पथराव करके वह भारत को उकसावे की कार्रवाई के लिए मजबूर कर रहा है. पिछले 50 दिनों में एक दर्जन बार भारतीय सीमा में पत्थरबाजी की घटनाएं बताती हैं कि उसे ऐसा करने के लिए जरूर ही कोई उकसा रहा है, वरना नेपाल की इतनी हैसियत नहीं कि वह चेतावनी के बावजूद इन हरकतों को दोहराता रहे. सवाल उठता है कि नेपाल क्या चीन की शह पर ऐसा कर रहा है?

विदेश नीति के जानकार मानते हैं कि काफी हद तक इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह चीन के इशारे पर ही ऐसा कर रहा हो, क्योंकि चीन ने नेपाल के कई क्षेत्रों में ख़ासा निवेश कर रखा है और चीन नहीं चाहता कि भारत से उसकी दोस्ती बरकरार रहे. दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट लाने के मकसद से ही चीन ने ये रास्ता निकाला है कि बॉर्डर पर भारतीय इलाके में जो भी निर्माण कार्य हो रहा हो, उसमें अड़ंगा डालने के लिए पथराव से शुरुआत करके ये देखा जाए कि भारत उस पर कैसी प्रतिक्रिया देता है.

दरअसल, उत्तराखंड का धारचूला नेपाल और चीन से लगने वाला सरहदी इलाका है. धारचूला से चीन सीमा की दूरी 80 किलोमीटर है, जहां पर धारचूला लिपुलेख राजमार्ग का निर्माण हुआ है, लेकिन नेपाल की सीमा धारचूला से ही शुरू हो जाती है. धारचूला में काली नदी के आर पार भारत और नेपाल की सीमा है. काली नदी के एक तरफ भारत है तो दूसरी तरफ नेपाल. भारत अपने एरिया में तटबंध का निर्माण कर रहा है, लेकिन नेपाल की ओर से लगातार विरोध जताते हुए भारतीय मजदूरों पर लगातार पथराव किया जा रहा है. नेपाल के लोगों की दलील है कि भारत की ओर तटबंध बनने से उनकी ओर काली नदी से कटाव हो जाएगा. काली नदी के आसपास सैकड़ों गांव बसे हुए हैं. इन गांवों में आवाजाही के लिए कई झूला पुल बने हुए हैं.

हालांकि पिछले महीने दोनों देशों के बीच हुई बैठक में सहमति बनी थी और नेपाल ने आश्वस्त किया था कि अराजक तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी और इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति नहीं होने दी जाएगी. लेकिन इसके बावजूद नेपाल के कुछ राजनीतिक दलों की तरफ से नेपाल के छात्र संगठनों को उकसाकर भारतीय क्षेत्र में पत्थरबाजी की घटनाएं थम नहीं रही हैं. बताया गया है कि ताजी घटना में नेपाल विप्लव कम्युनिस्ट माओवादी पार्टी के छात्र नेताओं ने पहले नेपाल में जुलूस निकाला और उसके बाद धारचूला जिले में भारतीय क्षेत्र में कार्य कर रही कंपनी के मजदूरों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी.

हालांकि भारत-नेपाल सीमा पर एसएसबी की तैनाती है, उसके बावजूद पथराव की लगातार होती घटनाएं चिंताजनक हैं. बता दें कि इससे पहले साल 2020 में भी भारत और नेपाल के दोस्ताना रिश्तों में उस समय खटास आ गई थी, जब नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था. इस नक्शे में नेपाल ने कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख के उन इलाकों को अपने क्षेत्र में दर्शाया था, जिन्हें भारत उत्तराखंड राज्य का हिस्सा मानता है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसके बाद 8 मई 2020 को एक विशेष कार्यक्रम में उत्तराखंड के धारचूला से चीन सीमा पर लिपुलेख तक एक सड़क संपर्क मार्ग का उद्घाटन किया था. नेपाल ने इसका विरोध करते हुए लिपुलेख पर फिर से अपना दावा किया था. इसको लेकर दोनों देशों में कई दिनों तक तनातनी बनी रही थी.

अब पथराव के जरिये नेपाल फिर वही कहानी दोहरा रहा है. लेकिन लगता है कि इस बार उसे चीन का पूरा वरदहस्त मिला हुआ है. पिछले साल एक खबर आई थी कि नेपाल के 7 जिलों में चीन की तरफ से जमीन हड़प ली गई लेकिन उसने चूं तक नहीं की. खबर तो ये भी है कि चीन ने नेपाल में अपने प्रभाव को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर अपनी गतिविधियों को तेज कर दिया है और चीन अब नेपाल के शैक्षणिक संस्थानों, मीडिया, सोशल सेक्टर के साथ-साथ पर्यटन के क्षेत्र में भी अपना प्रभाव बढ़ाने में लगा हुआ है. नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि नेपाल के कई स्कूलों के पाठ्यक्रम में चीनी भाषा (Mandarin) के कोर्स को अनिवार्य कर दिया गया है.

यहां तक कि नेपाली मीडिया में भी चीन ने अपना प्रभाव बढ़ा लिया है. नेपाल के कई अखबारों और रेडियो स्टेशन में चीन की तारीफ वाले कार्यक्रम प्रकाशित और प्रसारित किये जाते हैं. कई बार अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर नेपाली मीडिया के जरिये भारत के खिलाफ दुष्प्रचार भी किया जाता है जिसका उद्देश्य नेपाल में भारत के प्रभाव को कम करना होता है. चीन की तरफ से नेपाल के बॉर्डर इलाकों की जमीन हड़पने की रिपोर्ट के बाद से नेपाल के इन्हीं इलाकों में नये नये रेडियो स्टेशन खोले गए हैं. नेपाल के लोगों में चीन के खिलाफ बढ़ती नाराजगी को दूर करने के लिए इन रेडियो स्टेशन के जरिये चीन की तारीफ वाले कई कार्यक्रम प्रसारित किये जा रहे हैं.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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