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रायपुर अधिवेशन के बाद किस दिशा की तरफ आगे बढ़ेगी कांग्रेस?

आपसी कलह व गुटबाजी के साये में घिरे होने के बावजूद अगले साल केंद्र की सत्ता में आने की ताल ठोक रही कांग्रेस का तीन दिनी अधिवेशन आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शुरू हो गया. पहले दिन ही ये तय हो गया कि कांग्रेस कार्यसमिति यानी CWC के सदस्यों का चुनाव नहीं होगा और इनकी नियुक्ति का अधिकार पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को दे दिया गया है. इसका सीधा-सा संदेश यही निकलता है कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र अभी भी आधा-अधूरा ही है. अगर चुनाव होता तो उससे पता चलता कि पार्टी की इस ताकतवर इकाई का सदस्य बनने के लिए कितने वरिष्ठ नेता मैदान में कूदते हैं और किस हद तक गुटबाजी होती है.

हालांकि  26 साल पहले 1997 में कोलकाता अधिवेशन में ही CWC का आखिरी चुनाव हुआ था. उसके बाद से ही ये परंपरा बन गई कि पार्टी की इस सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई के सदस्यों की टीम खुद अध्यक्ष ही अपने हिसाब से तय करते आ रहे हैं, लेकिन इस बार प्रबल संभावना थी कि रायपुर अधिवेशन में CWC का चुनाव होगा क्योंकि पार्टी नेताओं का एक धड़ा इसके पक्ष में था, लेकिन शुक्रवार को हुई संचालन समिति की बैठक में सर्वसम्मति से खरगे को ही CWC सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार देने से साफ है कि पार्टी नेताओं की अंदरुनी कलह की नुमाइश करने के पक्ष में नहीं है. वैसे CWC में कुल 25 सदस्य होते हैं, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष और कांग्रेस संसदीय दल के नेता की जगह तय है.  संसदीय दल की नेता होने के नाते इस लिहाज से सोनिया गांधी को तो खुद-ब-खुद  इसमें जगह मिलेगी. बचे हुए 23 सदस्यों में से 12 का फैसला चुनाव से होना था, जबकि  11 का मनोनयन अध्यक्ष को करना था, लेकिन अब सभी 23 सदस्यों को अध्यक्ष ही अपनी पसंद के मुताबिक चुनेंगे.

इसमें राहुल गांधी का शामिल होना तय है, लेकिन सवाल है कि क्या प्रियंका गांधी को भी इसमें जगह मिलेगी? अगर खरगे ने उन्हें भी मनोनीत किया तो फिर CWC में भी गांधी परिवार का ही वर्चस्व होगा. बहरहाल पांच साल बाद हो रहे इस अधिवेशन में देशभर से करीब 15 हजार प्रतिनिधि शामिल हुए हैं. यही वे लोग हैं, जो पार्टी की आवाज को आम आदमी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं. लिहाज़ा, चुनावी राजनीति के लिहाज से बड़े नेताओं के मुकाबले इनकी अहमियत ज्यादा इसलिये मानी जानी चाहिये कि जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने का काम यही प्रतिनिधि करते हैं. वैसे इस अधिवेशन में छह विषयों पर सब-ग्रुप बनाए गए हैं, जिन पर आपस में चर्चा कर पार्टी अपनी आगामी रणनीति को अंतिम रूप देगी. इनमें राजनीतिक, अंतराष्ट्रीय मामले, आर्थिक, सामाजिक न्याय, किसान, युवा, शिक्षा और रोजगार जैसे विषय शामिल हैं. इनके साथ ही पार्टी संविधान को लेकर भी मंथन होगा कि उसमें कहाँ व कितना बदलाव करने की जरुरत है. इस अधिवेशन की टाइमिंग इसलिये भी अहम है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के अलावा अगले कुछ महीने में छह राज्यों में भी चुनाव होने हैं. इनमें राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना जैसे राज्य कांग्रेस के लिहाज से बेहद अहम हैं. तेलंगाना को छोड़ बाकी सभी राज्यों में कांग्रेस की सीधी बीजेपी से टक्कर है.इसलिये बड़ा सवाल ये है कि इस अधिवेशन के जरिये कांग्रेस किस दिशा की तरफ आगे बढ़ती है और अपने कार्यकर्ताओं में कितनी नई जान फूंक पाती है.

बता दें कि साल 2003 में पचमढ़ी में हुए अधिवेशन में कांग्रेस ने समान विचारधारा वाले दलों से गठबंधन का प्रस्ताव पारित किया था. तब पार्टी ने चुनाव पूर्व चेहरा घोषित नहीं करने का भी फैसला किया था. कांग्रेस को इसका जबरदस्त फायदा मिला और 2004 में वाजपेयी सरकार चली गई. मनमोहन सिंह कांग्रेस गठबंधन की ओर से ही प्रधानमंत्री बने थे.लेकिन उसके बाद हुए लगातार दो आम चुनाव में मात खाने के बाद कांग्रेस को फिर से अपनी पुरानी स्ट्रैटजी की तरफ लौटने पर मजबूर होना पड़ा है. पार्टी कई राज्यों में नए सिरे से चुनाव पूर्व गठबंधन कर सकती है. इनमें बिहार, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, झारखंड, हरियाणा, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर शामिल हैं. इसलिए पूरी संभावना है कि कांग्रेस अन्य विपक्षी दलों तक पहुंचने के लिए एक गठबंधन समिति का गठन कर सकती है क्योंकि लोकसभा चुनावों से पहले वह एक राष्ट्रीय गठबंधन बनाना चाहती है. 

हालांकि समान विचारधारा वाले कई दल ऐसे हैं, जिन्हें कांग्रेस के गठबंधन में अग्रणी पार्टी होने से कोई समस्या नहीं है, लेकिन तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के साथ ही तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव जैसे  नेता अलग-अलग रास्ते अपना रहे हैं.जबकि तृणमूल और टीआरएस (अब बीआरएस) केंद्र की यूपीए सरकार के हिस्सा थे.लिहाज़ा, कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती ये भी है कि इन नेताओं को चुनाव पूर्व ही गठबंधन में शामिल होने के लिए कैसे मनाया जाये. हालांकि एक चर्चा ये भी है कि कांग्रेस चेहरा पॉलिटिक्स को लेकर बड़ा दांव खेल सकती है. राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा हो सकते हैं,लेकिन पीएम पद का संयुक्त उम्मीदवार कौन होगा, इसका फैसला 2024 चुनाव के बाद ही लिया जायेगा. 

पार्टी नेताओं के एक खेमे की मानें, तो कांग्रेस आने वाले वक्त में गठबंधन दलों को एकजुट करने के लिए खरगे का मास्टर कार्ड खेल सकती है. दरअसल, खरगे दलित चेहरा हैं और सबसे अनुभवी भी हैं. ऐसे में अन्य विपक्षी दल शायद ही उनके नाम का विरोध कर पाए.इसलिये कि राहुल गांधी को लेकर जो नेता अभी सहमत नहीं हैं,उनमें से कई नेता खरगे के नाम पर हामी भर सकते हैं. हालांकि अपनी यात्रा के दौरान राहुल भी कई दफा कह चुके हैं कि सरकार बदलने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वे एक विचारधारा के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं. यानी राहुल की दिलचस्पी भी सरकार से ज्यादा संगठन में है.ऐसे में विपक्षी दलों को चित करने के लिए कांग्रेस खरगे का दांव चल सकती है.वैसे भी खरगे को संगठन और सरकार चलाने का पर्याप्त अनुभव भी है.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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