किसी भी राज्य में सरकार की योजनाओं और शासन व्यवस्था को दुरुस्त रखने में अफसरशाही का अहम किरदार होता है और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में तो सरकारी योजनाओं को जमीन पर उतारने से लेकर... हर विभाग के कामकाज को दुरुस्त रखने का पूरा दारोमदार ही अफसरों पर होता है... लेकिन शासन व्यवस्था के लिये तालमेल बैठाने की योगी सरकार की कोशिशें हर जिले और हर विभाग में... बरसों से कुंडली मारकर बैठे अफसरों की लापरवाही और हीलाहवाली की वजह से नाकाम हो रही है...  अफसरशाही का यही रवैया उत्तर प्रदेश में हमेशा की तरह आज भी सुर्खियों में है...


प्रदूषण के मामले पर सुप्रीम कोर्ट से खरी-खोटी सुनने के बाद 10 दिन पहले.. यानी 30 नवंबर को यूपी सरकार ने प्रदेश में प्रदूषण फैलाने के मामले में 26 जिलों के जिलाधिकारियों से जवाब तलब किया था... जिसके लिए चीफ सेक्रेटरी ने सभी 26 जिलों के डीएम को नोटिस भेजा था... और सभी अफसरों से पराली जलाने को लेकर हुई कार्रवाई की जानकारी मांगी गई थी.. नोटिस में जिलाधिकारियों से पराली जलाने वालों पर की गई कार्रवाई की जानकारी मांगी गई थी... लेकिन 25 जिलों के डीएम ने मुख्य सचिव के नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया... इनमे सिर्फ बस्ती जिले के डीएम ने ही नोटिस का जवाब दिया है। अफसरशाही की मनमानी का ये हाल तब है जब खुद मुख्य सचिव उनसे जवाब तलब कर रहे हैं... हालांकि मुख्य सचिव ने इस मामले मे कृषि निदेशक को भी सटीक जानकारी नहीं मिल पाने के लिए जिम्मेदार ठहराया है... और अब उनसे भी जवाब मांगते हुए.... एक और निर्देश कर दिया गया है कि जो अफसर पराली जलाने की जानकारी नहीं दे रहे उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए... लेकिन उससे होगा क्या... क्योंकि प्रदेश के अधिकारी जब मुख्य सचिव के निर्देशों की अनदेखी करने में नहीं हिचक रहे तो कृषि निदेशक को समय रहते जवाब देंगे इसकी कोई गारंटी नहीं.. और जब मुख्य सचिव को पराली के मामले में कार्रवाई की जानकारी नहीं मिल पा रही... तो उन्हे महिला सुरक्षा से जुड़े मामलों में हो रही कार्रवाई की पुख्ता जानकारी कैसे मिल पाएगी ये अब सरकार सोचे...आप लोग भी सोचिए।


मंत्री जी, गिलास आधा खाली..आधा भरा की दलील दे रहे हैं...बात नाफरमानी करने वाले 25 जिलों की हो रही है...और वो दूसरे जिलों का हवाला दे रहे हैं...किसानों को जागरूक करने की दलील दे रहे हैं...खैर जो सवाल अब आपके मन में उठ रहे हैं उनका जवाब हम सीधे मंत्री जी से ही लेंगे...जो हमारी इस चर्चा में भी खासतौर पर जुड़ रहे हैं...लेकिन लापरवाही का आलम तो लगता है कि हर विभाग की अफसरशाही पर छाया है। सबको आवास उपलब्ध कराने के पीएम मोदी और सीएम योगी के सपने को साकार करने की अहम जिम्मेदारी निभाने वाला आवास विकास परिषद खुद इनकम टैक्स के राडार पर है...पूरे ढाई अरब का नोटिस आईटी विभाग ने आवास विकास परिषद को थमा दिया है...और तो और..परिषद का खाता तक सीज कर दिया गया है। विभाग के अफसरों की दलील है कि भई देरी हो गई और कोई खास बात नहीं है...


भ्रष्टाचार के साथ ही अफसराशाही की इसी सुस्ती को तोड़ने के लिए सीएम योगी लगातार एक्शन में हैं...बावजूद इसके बरसों पुरानी जंग साफ होने का नाम नहीं ले रही...ऐसे में विपक्ष को भी सरकार पर हमला करने का मौका मिलता रहता है...  राजनीति में इसी मुद्दे से जुड़े आज के सवाल हैं कि क्या प्रदेश के जिलाधिकारी मुख्य सचिव के निर्देशों को भी गंभीरता से  नहीं लेते ?.... क्या जवाबदेही तय नहीं होने की वजह से यूपी की अफसरशाही बेलगाम हो रही है?... और पराली हो या खजाने की रखवाली का मामला... इस लापरवाही के आखिर कितने कसूरवार हैं


जनता के नुमाइंदे जनता के सेवक और सरकारी कर्मचारी जनता के नौकर माने जाते हैं, लेकिन पद के साथ ही उनके किरदार बदल जाते हैं। अक्सर मंत्री, सांसद और विधायक अपने पद की हनक में आ जाते हैं तो कर्मचारी, अधिकारी बनकर रुतबा दिखाने लगते हैं। किरदार बदलते ही उनके कामकाज के तरीके बदल जाते हैं और लोकतंत्र की सिरमौर जनता हाशिये पर पहुंच जाती है। मुख्यमंत्री योगी को भ्रष्टाचार और सुस्त अफसरशाही को दुरुस्त करने के साथ ही उनकी सोच भी बदलनी होगी। ताकि सही मायने में अफसरों को जिम्मेदारी का अहसास हो और वो अपने काम को सही ढंग से अंजाम दें।