नई दिल्लीः नोटबंदी के बाद आर्थिक विकास में आ रही कमी की खबरों के बीच चालू कैलेंडर साल के दौरान तनख्वाह में औसत बढ़ोतरी 10 फीसदी से भी कम रह सकती है. ये बीते साल के मुकाबले कुछ कम है.
जानी मानी रिसर्च एजेंसी एऑन हयूट का सालाना सर्वे बताता है कि 2017 के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में तनख्वाह में औसतन बढ़ोतरी 9.5 फीसदी रह सकती है. ध्यान रहे कि बीते कुछ सालों से तनख्वाह में बढ़ोतरी की दर लगातार घट रही है. 2007 में ये दर 15 फीसदी थी जो 2009 (वैश्विक मंदी के बाद का साल) में घटकर 6 फीसदी पर आ गयी. हालांकि 2011 में इसमें सुधार हुआ और लोगों की तनख्वाह औसतन 12 फीसदी की दर से बढ़ी. लेकिन उसके बाद तो लगता है कि सुईं 10 से साढ़े 10 के बीच अटक गयी है. 2016 में बढ़ोतरी का अनुमान 10.3 फीसदी था जो अब और भी कम होने का अनुमान लगाया गया है.
एजेंसी का कहना है कि भले ही बढ़ोतरी की दर कम हो गयी है, फिर भी ये वैश्विक और घरेलू स्तर की घटनाओं और राजनीतिक घटनाक्रम के बीच भारतीय उद्योग जगत की परिपक्वता को दर्शाता है. वैश्विक स्तर की घटनाओं में जहां ब्रेक्सिट और अमेरिका में सत्ता परिवर्तन को शामिल किया गया है, वहीं घरेलू घटनाओं में नोटबंदी प्रमुख है. एजेंसी कहती है कि ऐसी तमाम घटनाओं का उद्योग जगत ने काफी अच्छे तरीके से सामना किया और उचित निर्णय लिए. एजेंसी के पार्टनर आनंदोरुप घोष कहते हैं कि राजनीतिक फेरबदल और आर्थिक बाधाओं से कारोबारी कामकाज पर असर पड़ता रहा है. लेकिन इस साल हाल ये है कि वेतन बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है और इसकी जगह उत्पादकता और प्रदर्शन पर ज्यादा जोर है.
आम तौर पर कंपनियां वेतन के मामले में महंगाई दर को ज्यादा आधार नहीं बनाती. लेकिन बीते कुछ समय से खुदरा महंगाई दर में हो रही लगातार कमी की आड़ में कंपनियों को अपनी तनख्वाह बजट में कमी करने के मौका मिल गया. चूंकि तनख्वाह का बजट तंग होता जा रहा है तो अब अब पूरा जोर टॉप टेलेंट की पहचान कर उसे उसी हिसाब से पुरस्कार देने पर है. शोध में ये पता चला है कि कामगारों में बेहतर काम करने वालों की हिस्सेदारी घटकर 7.5 फीसदी रह गयी है, जो पिछले 21 सालो में सबसे कम है.
वैसे अनिश्चितता के इस दौर में नौकरी छोड़ने का रफ्तार पांच सालों में सबसे निचले स्तर पर आ गयी है. 2016 में ये दर 16.4 फीसदी रही जो 2015 के ही समान है, लेकिन बेहद मेधावी लोगों के नौकरी छोड़ने की दर 7.3 फीसदी से बढ़कर 12.3 फीसदी पर पहुंच गयी. इस बढ़ोतरी की बड़ी वजह आगे बढ़ने के सीमित मौके और जिम्मेदारियों में कोई बढ़ोतरी नहीं होना है.