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मुस्लिम बहुल सीटों पर मौलानाओं की नहीं चली, जमकर दौड़ी बीजेपी एक्‍सप्रेस! समझें पूरा गणित

Muslims Voters Impact In Maharashtra: महाराष्ट्र में मुस्लिम बहुल इलाकों में भी एमवीए की हार हुई है, जबकि बीजेपी ने बढ़त हासिल की. कई इलाकों में मुस्लिम वोट विभाजित हुआ.

Maharashtra Election Results: महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन की जीत का श्रेय व्यापक रूप से सरकार की कल्याणकारी योजनाओ को दिया जा रहा है लेकिन एक महत्वपूर्ण कारक मुस्लिम वोटों का विभाजन रहा है, जिसने राज्य की 38 सीटों में से एक बड़ा हिस्सा सत्तारूढ़ गठबंधन को दिलाया है. इन 38 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत से अधिक है, जो चुनाव के नतीजों में महत्वपूर्ण अंतर पैदा करती है.

कुल मिलाकर, सत्तारूढ़ गठबंधन ने इन 38 सीटों में से 22 सीटें जीती हैं, जो विपक्षी महा विकास अघाड़ी की जीती गई 13 सीटों से काफी आगे है. वोटों के बंटवारे से कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ है. पार्टी का स्कोर 11 से गिरकर पांच पर आ गया. शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट को छह सीटें और शरद पवार के एनसीपी गुट को दो सीटें मिली हैं.

वहीं, 38 सीटों में से बीजेपी ने 2019 में मिलीं अपनी 11 सीटों से बढ़ाकर 14 कर ली है. एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने छह सीटें और अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने दो सीटें जीती हैं. बाकी बची तीन सीटों में से समाजवादी पार्टी को दो और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम को सिर्फ एक सीट मिली.

महाराष्ट्र में मौलवियों की नहीं चली?

महाराष्ट्र के नतीजे यह संकेत देते हैं कि मौलवी मुस्लिम समुदाय के सामूहिक निर्णय पर अपना प्रभाव डालने में असफल रहे. ऐसी स्थिति ने बीजेपी को महायुति के खिलाफ "वोट जिहाद" या मुस्लिम वोटों को एकजुट करने के अपने आरोपों को मजबूत करने में मदद की.

विपक्ष के ध्रुवीकरण के आरोपों को नकारते हुए वरिष्ठ बीजेपी नेता विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि "एक हैं तो सेफ हैं" नारे में सभी समुदाय शामिल हैं. उन्होंने कहा, "लोग एमवीए की तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण की राजनीति के बहकावे में नहीं आए और विकास के लिए वोट देने के लिए एकजुट हुए. हमारे 'एक हैं तो सेफ हैं' मंत्र में सभी समुदाय शामिल हैं."

नवाब मलिक और जीशान सिद्दीकी भी हारे चुनाव

मुस्लिम वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष सलीम सारंग ने कहा, "तुष्टिकरण के लिए कोई जगह नहीं थी, यहां के लोग विकास और लाभ को देखते हैं." हारने वाले बड़े मुस्लिम नामों में एनसीपी के नवाब मलिक और जीशान सिद्दीकी के साथ-साथ कांग्रेस के आरिफ नसीम खान भी शामिल थे.

डेटा से पता चलता है कि मुस्लिम समुदाय के समर्थन ने मई में हुए लोकसभा चुनाव में एमवीए को बड़ी जीत दिलाने में मदद की, लेकिन विधानसभा चुनावों में उनके खिलाफ जो चीजें हुईं, वे थीं कम उत्साह, विभाजित वोट और कुछ सीटों पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण. कुछ सीटों पर, कई मुस्लिम उम्मीदवारों की मौजूदगी ने वोटों को विभाजित कर दिया.

मुस्लिम वोट हुए विभाजित

उदाहरण के लिए औरंगाबाद पूर्व में एआईएमआईएम के राज्य प्रमुख और पूर्व सांसद इम्तियाज जलील बीजेपी के अतुल सावे से 2,161 वोटों से हार गए. वीबीए के अफसर खान (6,507 वोट) और सपा के अब्दुल गफ्फार सैयद (5,943 वोट) ने सीट पर मुस्लिम वोटों को विभाजित कर दिया, जिससे जलील की हार सुनिश्चित हो गई.

एआईएमआईएम ने एकमात्र सीट मुस्लिम बहुल मालेगांव सेंट्रल में जीती, जहां उसके उम्मीदवार मुफ्ती इस्माइल केवल 162 वोटों से जीते. ये पूरे राज्य में सबसे कम अंतर की जीत है. इस बीच, भिवंडी पश्चिम में बीजेपी के महेश चौगुले ने सपा के रियाज आजमी को 31,293 वोटों से हराया क्योंकि मुसलमानों ने भी अपने वोट एआईएमआईएम के वारिस पठान (15,800 वोट) और निर्दलीय विलास पाटिल (31,579 वोट) के बीच बांट लिए.

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