Reasons To Watch Deva: शाहिद कपूर की 'देवा' देखने की 7 वजहें, ये खास एलीमेंट बनाता है फिल्म को मस्ट वॉच
Deva: शाहिद कपूर की देवा अगर आपने नहीं देखी तो मान लीजिएग कि आपने साल की शुरुआत में ही कुछ बड़ा मिस कर दिया है. अगर आपके मन में वो 'क्यों' वाला सवाल उठा है, तो वजहें यहां पढ़ लीजिए
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7 Reasons To Watch Deva: शाहिद कपूर देवा 31 जनवरी को रिलीज हो चुकी है. फिल्म के ट्रेलर से 'भसड़' मच चुकी थी. वो भसड़ ऑडियंस को सिनेमाहॉल में भी दिखने को मिलने वाली है. ये ऐसी भसड़ है जो लंबे समय से किसी फिल्म में देखने को नहीं मिली. अब मौका आया है नए साल में बॉलीवुड के पास एकदम नई फिल्म आ चुकी है, जो है तो करीब 12 साल पुरानी साउथ फिल्म से इंस्पायर्ड लेकिन पुरानी बिल्कुल भी नहीं है.
शाहिद कपूर की ये फिल्म क्यों देखनी चाहिए, यहां 5 पॉइंट्स में समझ लीजिए. इससे आपका ज्यादा समय भी बर्बाद नहीं होगा और फिल्म देखने से पहले माइंडसेट पॉजिटिव भी हो जाएगा जिससे शाहिद के कॉप अवतार के लिए एक्साइटमेंट और बढ़ जाएगा.
क्यों देखें देवा? 7 वजहें यहां हैं
1- वैसी नहीं है फिल्म जैसा आपने समझा था
हां, ट्रेलर आने के बाद दर्शकों को यही लगा था कि फिल्म मारपीट, एक्शन और एक बैड लेकिन गुड कॉप की कहानी होगी, जो एटिट्यूड से लबरेज होकर गुंडों के हाथ पैर तोड़ेगा. फिल्म में ये सब कुछ है. आपको कुछ गलत नहीं लगा था, लेकिन असल में आपका आकलन ट्रेलर देखकर थोड़ा सा कम जरूर पड़ गया.
असल में फिल्म ऑडियंस को इससे भी आगे ले जाती है. फिल्म में सिर्फ एक्शन नहीं है, फिल्म में सस्पेंस भी है. और वो सस्पेंस कमाल का है. आप देखेंगे तो कभी आपको 2008 वाली रेस याद आएगी, तो कभी शरलॉक होम्स.
असल में ट्रेलर में वो सारी चीजें समाहित नहीं हो पाईं जो फिल्म में हैं. इसे मेकर्स की गलती भी मानी जा सकती है. ऐसा ही कुछ शाहरुख खान की 1999 में रिलीज हुई बादशाह और रितेश देशमुख की 2017 में रिलीज हुई बैंक चोर के साथ भी हुआ था. ये दोनों फिल्में सिर्फ कॉमेडी फिल्मों की तरह पेश की गईं, लेकिन जब फिल्में बड़े पर्दे पर आईं तो उनकी क्वालिटी कहीं बेहतर थी.
इसका उन फिल्मों को नुकसान ये हुआ कि दर्शकों ने इन्हें सिर्फ कॉमेडी फिल्म समझ लिया और ये बॉक्स ऑफिस में कुछ खास नहीं कर पाईं. उम्मीद है कि देवा के साथ ऐसा नहीं होगा.
2- थ्रिलर, एक्शन और सस्पेंस सब कुछ एक साथ
कभी फिल्मों में ये फॉर्मुला हिट माना जाता था कि फिल्म में कॉमेडी, इमोशन और एक्शन सब कुछ होना चाहिए. ऐसा ही कुछ इस फिल्म के साथ भी है. इसमें गोविंदा की लाडला जैसा सस्पेंस, जॉन अब्राहम की फोर्स जैसा थ्रिल और आर राजकुमार-राउडी राठौर जैसे एक्शन एक साथ हैं.
3- मलयालम फिल्मों का असर (फिल्म का बेहद पॉजिटिव हिस्सा)
हिंदी दर्शकों में पिछले कुछ सालों से मलयालम फिल्मों को लेकर 'जागरूकता' फैली है. अब जब हिंदी ऑडियंस साउथ फिल्मों की बात करती है, तो उसे पता होता है कि कंटेंट के लिहाज से मलयालम फिल्मों को उस चर्चा में सबसे ऊपर रखना है. देवा मलयालम फिल्मों जैसा बेहतरीन कंटेंट पेश करती है. फिल्म को मलयालम डायरेक्टर रोशन एंड्र्यूज ने बनाया है और ये उनकी ही फिल्म 'मुंबई पुलिस' से इंस्पायर्ड है.
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4- डायरेक्शन
रोशन एंड्र्यूज को पता था कि फिल्म को किस दिशा में ले जाना है. फिल्म का इंट्रो वाला पार्ट राम गोपाल वर्मा की 90S की फिल्मों की झलक देता है. अगर आपने रामगोपाल वर्मा के 'अच्छे दिनों' वाली फिल्में देखी हैं, तो सिर्फ इंट्रोडक्शन वाला पार्ट देखते ही इंगेज हो जाएंगे. फिल्म सिर्फ सीधी कहानी नहीं कहती, उसमें रिसर्च भी दिखती है.
ये रिसर्च पार्ट बहुत बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है. रोशन एंड्र्यूज को पता था कि उन्हें क्या दिखाना है और कैसे दिखाना है. फिल्म के उस हिस्से में वो तब सबसे ज्यादा कामयाब होते हैं जब ऑडियंस सस्पेंस खुलते ही उछल पड़ती है.
रोशन ने फिल्म में कई ऐसे जरूरी किरदार रखे हैं, जो कहानी का जरूरी हिस्सा न होने के बावजूद जरूरी बन जाते हैं.प्रवेश राणा और गिरीश कुलकर्णी जैसे बढ़िया एक्टर्स से ऐसे रोल कराके उन्होंने फिल्म को और भी ज्यादा इंगेजिंग बना दिया है.
5- रिसर्च
फिल्म का एक डायलॉग है- 'ब्लू कार इन यलो लाइट लुक्स ग्रीन', फिल्म में दो और सीन हैं जो करीब एक घंटे बाद आपस में कनेक्टेड दिखते हैं. उसमें लीड रोल की सोच दिखती है- पहले सीन में शाहिद कुब्रा सैत वाले किरदार को लायबिलिटी बताते हैं और दूसरे सीन में वो उन्हें पुलिस ऑपरेशन में शामिल होने के लिए कहते हैं. इन सीन्स के बारे में हम आपको अभी कुछ नहीं बता सकते क्योंकि पूरा सस्पेंस खराब हो जाएगा. ये बस हिंट है जिसे पढ़ने के बाद आप उन सीन्स का मतलब समझ पाएंगे.
6- बैकग्राउंड म्यूजिक पुष्पा 2 या देवारा जैसा कानफोड़ू नहीं, फिर भी थ्रिलिंग है
फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा होता है बीजीएम. जो इस फिल्म में है, लेकिन ये साउथ की हाल में रिलीज हुई फिल्मों सालार, केजीएफ या पुष्पा 2 जैसा नहीं है. कानों को अच्छा लगता है और थ्रिलिंग भी.
7- एक्टिंग
शाहिद कपूर फिल्म का बेहद मजबूत हिस्सा है. फिल्मों की चॉइस सच में वो किसी समकालीन एक्टर्स की दौड़ में नहीं हैं, बल्कि वो अलग है. अगर अलग नहीं होते तो हैदर, कमीने से लेकर कबीर सिंह जैसी तमाम फिल्में उनके हिस्से नहीं आतीं. पूरी फिल्म में उनके अंदर का एंगर फूट फूटकर निकलता दिखता है.
एंग्री होते हुए भी शाहिद एक सीन में भी लाउड नहीं हुए हैं. एक्शन करते समय लीड कैरेक्टर के अंदर की भड़ास जैसे वो निकालते हैं, वो दिखाता है कि वो जब वी मेट और हैदर से भी आगे निकल चुके हैं.
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