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14 से 20 साल में कैसे रिहा हो जाते हैं उम्रकैद की सजा पाए कैदी, फिर इसे क्यों कहते हैं आजीवन कारावास?

आपने बॉलीवुड की फिल्मों में देखा होगा कि अदालत एक दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाती है. सजा के 14 साल बाद ही कैदी की रिहाई हो जाती है. अगर यह सच है तो फिर 14 साल की सजा का क्या ही मतलब?

उत्तर प्रदेश के कासगंज में 2018 में निकाली गई तिरंगा यात्रा के दौरान मारे गए चंदन गुप्ता मामले में अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है. अदालत ने सभी 28 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है. अब सवाल यह है कि क्या उम्रकैद की सजा सिर्फ 14 से 20 साल की ही होती है? अगर हां, तो इसे उम्रकैद या आजीवन कारावास क्यों कहते हैं? उम्रकैद की सजा में दोषी 14 से 20 साल में कैसे छूट जाते हैं? चलिए सबकुछ जानते हैं... 

आपने बॉलीवुड की फिल्मों में देखा होगा कि अदालत एक दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाती है. सजा के 14 साल बाद ही कैदी की रिहाई हो जाती है. अगर यह सच है तो फिर 14 साल की सजा का क्या ही  मतलब? आमतौर पर लोगों में यह धारणा है कि उम्रकैद की सजा पाए दोषी 14 साल में छूट जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है. 

सीधे प्वाइंट पर आते हैं...

यह जानकारी दुरुस्त कर लीजिए कि भारतीय कानून में 14 साल या फिर 20 साल वाला कोई नियम है ही नहीं. कानून में कहीं नहीं लिखा है कि उम्रकैद में 14 साल की सजा होगी. यानी उम्रकैद का सीधा मतलब उम्रकैद ही होता है. दोषी को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने पर उसे आखिरी सांस तक जेल में ही रखा जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी 2012 में एक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया था कि आजीवन कारावास का मतलब जीवनभर के लिए जेल है, इससे ज्यादा कुछ नहीं. कोर्ट ने इस मामले की इससे ज्यादा व्याख्या करने से इनकार कर दिया था. 

तो कहां से आया 14 या 20 साल का नियम

अदालत का काम सजा सुनाना होता है. सजा को एक्जीक्यूट करने का काम राज्य सरकार करती है. सजा के किसी भी मामले में राज्य सरकार के पास यह अधिकार होता है कि वह कैदी की सजा को माफ या कम कर सकती है. उम्रकैद के मामले में राज्य सरकार अपने विवेकानुसार 14 साल बाद कैदी को रिहा कर सकती है. यानी अगर 14 साल बाद राज्य सरकार को लगता है कि कैदी सुधर गया है तो उसे छोड़ा जा सकता है. हालांकि, उसे कम से कम 14 साल तो जेल में रहना ही होगा. अब यह राज्य सरकार पर है कि वह उम्रकैद की सजा पाए दोषी को 14 साल रखे, 20 साल रखे या फिर आखिरी सांस तक. हालांकि, देशद्रोह व जघन्य अपराध जैसे मामलों में सजा कम या माफ नहीं की जाती. 

क्या जेल में दिन और रात अलग-अगल गिने जाते हैं?

जेल को लेकर लोगों के एक और भ्रांति है. आम धारणा यह है कि जेल की सजा में दिन और रात को अलग-अलग गिना जाता है. यानी दिन और रात का मतलब पूरे दो दिन हो गया. ऐसा नहीं है. कानून में यह कहीं नहीं लिखा है कि दिन और रात अलग-अलग गिना जाएगा. जेल में एक दिन का मतलब भी 24 घंटे ही होता है.  

 

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