क्या कोरोना के वेरिएन्ट्स कम करते हैं कोविड के खिलाफ सुरक्षा? जानिए रिसर्च की अहम बात
रिसर्च के मुताबिक नतीजे का मतलब है भविष्य में बूस्टर डोज की भी जरूरत पड़ सकती है, बिल्कुल सालाना फ्लू वैक्सीन की तरह. टीकाकरण के बाद भी वायरस से बचाव की कोशिश के तौर पर उपाय करने को कहा गया है.

कोरोना वायरस के वेरिएन्ट्स वैक्सीन या प्राकृतिक संक्रमण से सुरक्षा को 'काफी हद तक' कम कर देते हैं. ये कहना है ओरेगन हेल्थ एंड साइंस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का. शोधकर्ताओं ने टीकाकरण करानेवाले या कोविड को हरानेवालों के ब्लड सैंपल पर कोरोना वायरस की दो नई किस्में B.1.1.7 और B.1.351 की जांच पड़ताल की. कोरोना वायरस के B.1.1.7 वेरिएन्ट की पहचान ब्रिटेन में की गई थी, जबकि B.1.351 वेरिएन्ट का पता दक्षिण अफ्रीका में चला था और दोनों को वेरिएन्ट्स ऑफ कन्सर्न कहा गया.
कोरोना के वेरिएन्ट्स एंटीबॉडी लेवल में करते हैं कमी
शोधकर्ताओं का कहना है कि कोरोना वायरस लगातार खुद को बदल रहा है ताकि अपने फैलाव को विस्तार दे सके. लैब रिसर्च से पता चला कि कोरोना की नई किस्म डेल्टा ने फाइजर की वैक्सीन लगवा चुके या पहले संक्रमित रह चुके 100 लोगों के ब्लड सीरम में वायरस को निष्क्रिय करनेवाली एंटीबॉडी कम कर दी. बीटा वेरिएन्ट के मामले में शोधकर्ताओं ने एंटीबॉडी लेवल में मूल कोरोना वायरस के मुकाबले 9 गुना कमी पाया. उन्होंने ये भी बताया कि टीकाकरण और पूर्व के संक्रमण से कोरोना की दो नई किस्मों के खिलाफ शरीर को काफी हद तक सुरक्षा मिलता है.
भविष्य में बूस्टर डोज की भी बताई गई जरूरत-रिसर्च
रिसर्च के लिए उन्होंने कोरोना की नई किस्मों को मरीजों से हासिल किया और हर वेरिएन्ट सैंपल को वॉलेंटियर के ब्लड सैंपल में मिलाकर मूल कोरोना वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी के असर को जांचा. नतीजे से पता चला कि वेरिएन्ट्स के खिलाफ वायरस से मिलनेवाली सुरक्षा का लेवल कम होता है खास तौर पर 50 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों में एंटीबॉडी घट जाती है. उन्होंने बताया कि बुजुर्गों में खतरे का बढ़ना चिंताजनक है और जरूरत है कि टीकाकरण के बाद भी वायरस से बचाव की कोशिश की जाए.
उन्होंने कहा कि नतीजे से संकेत मिलता है कि फाइजर की वैक्सीन से वेरिएन्ट्स के खिलाफ किसी हद तक सुरक्षा बरकरार रहती है, चाहे वायरस को निष्क्रिय करनेवाली एंटीबॉडी के लेवल में कमी क्यों न आ जाए. रिसर्च के नतीजे हालिया की रिपोर्ट से आम तौर पर मेल खाते हैं. रिसर्च के मुताबिक नतीजे का मतलब है भविष्य में बूस्टर डोज की भी जरूरत पड़ सकती है, बिल्कुल सालाना फ्लू वैक्सीन की तरह. रिसर्च के नतीजे पत्रिका नेचर कम्यूनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं. शोधकर्ताओं ने बताया कि नतीजे टीकाकरण के साथ-साथ फेस मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग के महत्व को भी जाहिर करते हैं.
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Source: IOCL
























