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Mahabharat: देवराज इंद्र ने ऐसे छल से कर्ण से हासिल किया था कवच और कुंडल, बाद में हुई ये आकाशवाणी

Mahabharat Story: व्यक्ति की अच्छाई भी कभी कभी विनाश का कारण बन जाती है. महाभारत के शक्तिशाली पात्रों में से एक कर्ण के साथ भी यही हुआ था. महाभारत के युद्ध में जब कर्ण सब पर भारी पड़ने लगे तो क्या हुआ उनके साथ, आइए जानते हैं.

Mahabharat Katha: कर्ण सूर्य पुत्र थे. शक्तिशाली थे. अच्छे योद्धा होने के साथ साथ वह दानवीर भी थे. इसके अलावा कर्ण में नैतिकता और संयमशीलता भी थी लेकिन उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं था महाभारत के युद्ध में उनकी यही खूबियां विनाश का कारण बन जाएंगी.

इन्द्र के साथ कृष्ण ने बनाई ये योजना कर्ण की शक्ति से भगवान कृष्ण भलिभांत परिचित थे. वह जानते थे कि कर्ण के पास जब तक कवच और कुंडल है, तब तक कोई उसे मार नहीं सकता है. कृष्ण की चिंता वाजिब थी, क्योंकि कौरवों की सबसे शक्तिशाली योद्धाओं में कर्ण का नाम बहुत ऊपर था. ऐसे में उन्हें अर्जुन की चिंता सताने लगी. भगवान कृष्ण के साथ देवराज इन्द्र भी कर्ण की शक्ति को जानते थे. कर्ण की इस शक्ति को क्षीण करने के लिए कृष्ण ने एक योजना बनाई. कृष्ण ने इंद्र को ब्राह्मण के वेश कर्ण के पास जाने के लिए कहा. कृष्ण जानते थे कि कर्ण प्रतिदिन लोगों को दान किया करते थे. कृष्ण ने इंद्र से कहा कि तुम वेश बदलकर उस भीड़ में शामिल हो जाना जिन्हें कर्ण दान देगा. इंद्र ने ऐसा ही किया. कर्ण प्रतिदिन की तरह सभी को कुछ न कुछ दान दे रहे थे. जब बारी इंद्र की आई तो कर्ण ने उनसे पूछा आपको क्या वास्तु चाहिए. अपनी इच्छा प्रकट करो.

ब्राह्मण वेश में इंद्र ने कर्ण से मांगे कवच और कुंडल तब ब्राह्मण वेश में इंद्र ने कहा कि महाराज में आपकी ख्याति की चर्चा सुनकर आया हूं. आपकी दान वीरता की चर्चा पूरे लोक मे हैं. दान मांगने से पहले आपको वचन देना होगा तभी दान स्वीकार करुंगा. इस पर कर्ण ने हाथ में जल लेकर इंद्र को वचन दे दिया. तब इंद्र ने कर्ण से शरीर के कवच और कुंडल दान में मांग लिए. इंद्र की इस बात को सुनकर कर्ण बिना एक पल समय गंवाए स्वयं अपने हाथों से पीड़ा सहते हुए कवच और कुंडल शरीर से अलग कर इंद्र को सौंप दिए.

इन्द्र जब भगाने लगे, तभी हुई ये आकाशवाणी कर्ण के कवच और कुंडल लेकर इंद्र वहां से तुरंत अपने रथ पर सवार होकर भागने लगे क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनकी असलियत का कर्ण को पता चले. लेकिन जैसे ही वे कुछ दूर चले उनका रथ जमीन में धंस गया. रथ के रूकते ही आकाशवाणी हुई 'देवराज इन्द्र, तुमने बहुत बड़ा पाप किया है. अपने पुत्र अर्जुन को बचाने के लिए तुमने छल पूर्वक कर्ण के कवच और कुंडल प्राप्त किए हैं, कर्ण की जान को खतरे में डाला. अब यह रथ यहीं धंसा रहेगा और तुम भी यहीं धंस जाओगे'. आकाशवाणी सुनकर इंद्र कांप गए. विनती करने लगे कि प्रभु इस श्राप से कैसे बचा जा सकता है. तब फिर आकाशवाणी हुई अब तुम्हें दान दी गई वस्तु के बदले में बराबरी की कोई वस्तु देना होगी. इंद्र ने इस बात को स्वीकार कर लिया. तब इंद्र फिर से कर्ण के पास गए. लेकिन इस बार ब्राह्मण के वेश में नहीं. कर्ण ने उन्हें आता देखकर बड़ी विनम्रता से पूछा देवराज आदेश करिए और क्या चाहिए.

इन्द्र को कर्ण के सामने होना पड़ा लज्जित इंद्र अपने आप को लज्जित महसूस करने लगे और बोले कि हे दानवीर अब मै लेने नहीं कुछ देने आया हूं. कवच-कुंडल को छोड़कर जो इच्छा हो मांग लीजिए. इस पर कर्ण ने कहा देवराज मैंने आज तक कभी किसी से कुछ नही मांगा और न ही मुझे कुछ चाहिए. कर्ण सिर्फ दान देना जानता है, लेना नहीं. तब इंद्र ने अपनी व्यथा कर्ण को बताई और कर्ण से कुछ भी मांगने का आग्रह किया. लेकिन कर्ण ने फिर वही उत्तर दिया. आखिरकार इंद्र को कर्ण के आगे लाचार होना पड़ा और इंद्र ने कहा कि वह बिना कुछ दिए तो वापिस नहीं जा सकते हैं इसलिए इंद्र ने वज्ररूपी शक्ति कर्ण को प्रदान की. इंद्र ने कहा कि कर्ण तुम इसको जिसके ऊपर भी चला दोगे, वो बच नहीं पाएगा. भले ही साक्षात काल के ऊपर ही चला देना, लेकिन इसका प्रयोग सिर्फ एक बार ही कर पाओगे. इतना कहकर इंद्र वहां से चले आए. कर्ण ने उन्हें बहुत रोकने की चेष्टा की लेकिन इंद्र नहीं रूके. कर्ण ने इंद्र की दी हुई शक्ति रख ली.

दुर्योधन को हुई चिंता कर्ण के कवच और कुंडल दान में देने की खबर दुर्योधन को हुई तो उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उसे अपनी पराजय दिखाई देने लगी. लेकिन जब उसने सुना कि इंद्र ने कवच और कुंडल के बादले वज्र शक्ति दे गए हैं तो उसे प्रसन्नता हुई. लेकिन इंद्र की दी हुई शक्ति भी कर्ण के काम न आ सकी.

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