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रावण के चरित्र में है ये नकारात्मक तत्व! राम जैसा आदर्श जब हमारे पास है तो क्या रावण को पूजना चाहिए?

आज भी कई लोग रावण की पूजा यह कहकर करते हैं कि रावण शिवजी का परम भक्त था. लेकिन शिवभक्त घोषित करने से रावण ने दुष्कर्म मिट जाएंगे. जब हमारे पास राम जैसे आदर्श देवता हैं तो रावण को पूजना क्या सही है?

रावण के चरित्र में नकारात्मक तत्व! क्या रावण को पूजना चाहिए?

सम्पूर्ण देश 22 जनवरी को रामलला के प्राण प्रतिष्ठा को लेकर राममय है. देश का प्रत्येक व्यक्ति प्रतीक्षारत है इस मंगल अवसर के लिए. लेकिन विडम्बना यह है कि आज भी कुछ लोग रावण जैसे पतित राजा को महान शिवभक्त मानकर पूज रहे हैं.

आजकल कलयुग का प्रभाव अपने चरम सीमा पर है. लोग भगवान राम को न पूज कर रावण, दुर्योधन, महिषासुर, कर्ण, आदि की पूजा करते हैं, जोकि अशास्त्रीय है. श्रीमद्भगवत गीता 17.4 के अनुसार, जो व्यक्ति राक्षसों को पूजते हैं उन्हे रजो-गुणी वाला बताया गया है और जो देवताओं की मन से पूजा करता है वह व्यक्ति सत्व गुण से संपन्न व्यक्ति है. भगवान राम को अपना आदर्श न मानकर वह रावण को अपना आदर्श मान रहे हैं. ऐसे लोगों का तर्क एक ही होता है कि हम रावण को इसलिए पूजते हैं क्योंकि वह शिव भक्त था. क्या शिव भक्त घोषित करने से रावण के सारे दुष्कर्म मिट जायेंगे?

  • रावण के अनुयायी कहते हैं कि ”रावण सबसे बड़ा शिव भक्त था ऐसा महादेव ने घोषित किया था”. लेकिन महादेव जी का ऐसा वाक्य किसी शास्त्र (श्रुति, स्मृति इतिहास और पुराण) में नही मिलता, हां नंदी जी के बारे में ऐसा प्रमाण आवश्य मिलता है. लिंग पुराण 1.43.27 के अनुसार, भगवान शिव ने नंदी से कहा "तुम हमेशा मेरे पसंदीदा रहोगे और हमेशा मेरे निकट रहोगे!"
  • वामन पुराण 213.17 के अनुसार, महादेव नंदी से कहते हैं "हे नंदी!  तुमसे बढ़कर मेरे लिए कोई प्रिय नहीं है!" इससे स्पष्ट हो जाता हैं कि नंदी ही भगवान महादेव का सबसे बड़ा भक्त है. रावण को कृपया कर के महादेव से ना जोड़े. इसका कारण अपको इस लेख में प्रमाण सहित मिलेगा. चालिए दृष्टि डालते हैं रावण के चरित्र पर-
  • वाल्मिकी रामायण उत्तर काण्ड 13.7 के अनुसार, विवाह के बाद रावण का चरित्र नकारात्मक हो गया था. वह देवताओं, ऋषियों, यक्षों आदि को मारने और पीड़ा पहुंचाने लगा. नन्दनवन के पेड़ उखाड़ आता, पर्वतों को छिन्न भिन्न कर देता.
    वाल्मिकी रामायण उत्तर काण्ड 13.22–36 के अनुसार, कुबेर ने भाई (रावण) को धर्म के मार्ग पर समझाने के लिए दूत भेजा तब उसने दूत को भी मार दिया और कुबेर पर आक्रमण करने के लिए निकल पड़ा. अर्थात उसका किसी पर प्रेम नही था.
  • वाल्मिकी रामायण उत्तर काण्ड 15.36–37 के अनुसार, रावण ने कुबेर को हराकर उसका पुष्पक विमान छीन लिया. महादेव को भी चुनौती दे डाली इसलिए नन्दी से शापित हुए कि मेरे वानर समान मुख पर हंसे अवश्य पर राक्षस कुल को वानर ही नष्ट कराएगा. क्रोधी रावण कैलाश के टुकड़े करने के लिए भागा क्योंकि कैलाश उसके मार्ग में आगे बढ़ने के लिए रुकावट था तब शिव ने पैरों की उंगलियों से खेल खेल में दबा डाला तब ब्रह्मांड हिल गया. रावण को उस दबाव के फलस्वरूप घोर पीड़ा का अनुभव हुआ और वह रो पड़ा. जब उसने महादेव को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना की तब जाकर शिवजी ने उन्हें मार्ग दिया और भयंकर रुदन के कारण उसका नाम रावण रखा. रावण ने विश्व पर विजय पाने के लिए न जाने कितने लोगों को पीड़ा पहुंचाई.
  • वाल्मिकी रामायण उत्तर काण्ड 17.30–40 क अनुसार, रावण ने हिमालय के वन में तपस्या कर रही वेदवती को गंदी निगाह से देखने के बाद वेदवती के साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया. वेदवती ने रावण के अगले जन्म में अयोनिजा (सीता) पैदा होकर उसकी मृत्यु का कारण बनने का शाप दिया. यही वेदवती अगले जन्म में जनकनन्दिनी सीता बनी.
  • वाल्मिकी रामायण उत्तर काण्ड 26.19 के अनुसार, रावण ने अप्सरा रंभा (पुत्री तुल्य) के साथ दुष्कर्म किया था. हालांकि रंभा ने उनको पितातुल्य कहकर स्वयं को बचाने का प्रयास किया था कि वह रावण की पुत्रवधू है क्योंकि उसका कुबेर पर प्रेम है. आप स्वयं सोचिए की रावण को हम महादेव के नाम से कैसे जोड़ सकते हैं?

राम से पहले किसके और कितनी बार हारा रावण

चालिए अब रावण की वीरता पर भी दृष्टि डालते हैं. रावण के अनुयायी कहते हैं कि रावण को सिर्फ भगवान राम ही हरा सकते थे, लेकिन वास्तविकता में रावण कई बार पराजित हो चुका था. एक बार कार्तवीर्य अर्जुन से फिर बाद में वानर राज बली से.वाल्मिकी रामायण उत्तर काण्ड 23.66 के अनुसार, महिष्मती पुर के राजा अर्जुन ने रावण को युद्ध में हराया था जब अर्जुन ने नर्मदा का बहाव अपनी भुजा से रोक दिया था. उस समय रावण द्वारा आराधना के लिए लाए पुष्प बह गए थे. युद्ध हुआ और रावण को अर्जुन ने बन्दी बना लिया. वाल्मिकी रामायण उत्तर काण्ड 36.34 के अनुसार, रावण को वानर राज बाली ने भी हराया था जब रावण ने जाना की बाली को हराना मुश्किल है. वह गया तो था चुनौती देने पर बन्दी बनकर बाली की कांख में लटकता रहा, जब तक चारों समुद्र तट पर बाली की संध्योपासना पुरी नहीं हुई. तो आप ही सोचिए जब हमारे पास राम जैसा आदर्श है तो हमें रावण को आर्दश बनार पूजने की क्या जरूरत है?

ये भी पढ़ें: महर्षि वाल्मीकि जी के नाम पर ही क्यों रखा गया अयोध्या एयरपोर्ट का नाम?

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

मुंबई के रहने वाले अंशुल पांडेय धार्मिक और अध्यात्मिक विषयों के जानकार हैं. 'द ऑथेंटिक कॉंसेप्ट ऑफ शिवा' के लेखक अंशुल के सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म और समाचार पत्रों में लिखते रहते हैं. सनातन धर्म पर इनका विशेष अध्ययन है. पौराणिक ग्रंथ, वेद, शास्त्रों में इनकी विशेष रूचि है, अपने लेखन के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का कार्य कर रहें.
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