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Sooryavanshi Review: इस मसाला एंटरटेनर में है सिर्फ सितारों का स्टाइल, अक्षय-अजय-रणवीर के फैन्स को मिलेगा मजा

Sooryavanshi Review: सूर्यवंशी मसाला एंटरटेनर है, जिसे ऊपरी तौर पर बिना दिमाग लगाए देखा जा सकता है. मगर इसमें कुछ ऐसी बातें भी हैं जिनकी गहराई में आप राजनीतिक टोन या एजेंडा देख सकते हैं.

Sooryavanshi Review: सूर्यवंशी बड़े पर्दे का सिनेमा है. कैमरा वर्क, ऐक्शन, लोकेशन और बड़ा दायरा समेटने वाले दृश्य यह एहसास कराते हैं. अच्छा हुआ रोहित शेट्टी ने कोरोना के कारण करीब दो साल बंद पड़े सिनेमाघरों के खुलने तक धैर्य रखा. कोरोना की तीसरी लहर का पता नहीं, लेकिन सिनेमाघरों में रौनक लौटने की उम्मीद फिल्म इंडस्ट्री को है. सूर्यवंशी आशा के दीप जलाती है परंतु जश्न के लिए जरा वक्त लगेगा. मुश्किल यही है कि सूर्यवंशी ऐसी मसाला एंटरटेनर है, जो पुराने सितारों के साथ कुछ नया पेश नहीं करती. 

इसमें रोहित शेट्टी धमाके से कारें उड़ाते हैं. उनका हीरो फिजिक्स-केमिस्ट्री-बायोलॉजी के मूल सिद्धांतों को अंगूठा दिखाते हुए अकेले दसियों दुश्मनों को ठोकता और टपकाता है. हीरोइन की यहां गैर-जरूरी मौजूदगी है. संवादों के नाम पर गुदगुदाने की कोशिश और हल्की-फुल्की कॉमेडी है. अतः जो दर्शक वक्त गुजारने या सिनेमाई मजे के लिए हॉल में जाते हैं, उनके लिए यह फिल्म है.

रोहित की अन्य फिल्मों की तरह इसमें भी आपको कुछ बेचैन नहीं करेगा. न कुछ सोचने को है. 145 मिनिट की फिल्म देखते हुए आप बीच में अपने लिए भी वक्त निकालेंगे तो कुछ मिस नहीं करेंगे क्योंकि कहानी के रिकॉर्ड की सुई एक जगह पर अटकी है. 1993 के मुंबई बम धमाके. धमाकों में पुलिस अफसर वीर सूर्यवंशी (अक्षय कुमार) के माता-पिता मारे गए थे. आतंक का निर्यात करने वाले पड़ोसी देश ने इसके बाद और कांड किए मगर सबसे खतरनाक यह कि उसने हमारे यहां स्लीपर सेल भेजे. 

ऐसे आतंकी जो जनता के बीच आम आदमी बन कर रहते हुए, कभी भी हादसे को अंजाम देने को तैयार हैं. कहानी कहती है कि मुंबई में विस्फोट के लिए हजार किलो आरडीएक्स आया था. 400 किलो इस्तेमाल हुआ. 600 किलो अब भी कहीं छुपा है. इसकी तलाश एक थ्रिलर का खाका हो सकती थी मगर रोहित थ्रिलर नहीं बना रहे थे.

सूर्यवंशी की पटकथा भटकती है. पाकिस्तान से आतंकियों को भारत भेजने वाला कथानक दर्जनों फिल्मों, वेबसीरीजों में आ चुका है. उसका दोहराव यहां है. अक्षय के किरदार में न सिंघम वाली बात है और न सिंबा वाली. संभवतः इसलिए रोहित ने बाजीराव (अजय देवगन) और भालेराव (रणवीर सिंह) की एंट्री कराई. दोनों आखिरी के करीब आधे घंटे में आते हैं. लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं घट रहा होता कि अक्षय अकेले न संभाल पाते. बाजीराव और भालेराव की यहां मौजूदगी पुराने ब्रांड को भुनाने की कोशिश भर है. इसे गंभीरता से न लें.

रणवीर कॉमिक होकर थोड़ा एंटरटेन करते हैं मगर अजय देवगन का हिस्सा मुंह दिखाई की रस्म जैसा है. सबसे खराब स्थिति कैटरीना कैफ की है. वीर सूर्यवंशी के जीवन के साथ वह कहानी में भी हाशिये पर हैं. उनके हिस्से 1990 के दशक के हिट, टिप टिप बरसा पानी... गाने पर डांस आया मगर वह निराश करती हैं. अग्निपथ की चिकनी चमेली और धूम-3 की कमली कहीं नहीं दिखती. कैटरीना में एनर्जी और स्टाइल गायब हैं.

सूर्यवंशी का रोचक और रचनात्मक हिस्सा वह फेंटेसी है, जिसमें मुंबई ब्लास्ट करके पाकिस्तान भागा अंडरवर्ल्ड डॉन और आतंकी सरगना वापस अपने वतन लौट कर मां की कब्र पर फातिहा पढ़ता है. कहते हैं, इस डॉन की इच्छा मां की कब्र के बगल में दफन होने की है. फिल्म में उसकी इच्छा पूरी होते दिखाई गई है. इस प्रसंग को तेजी समेट दिया गया. जबकि इसमें जान थी. रोहित की फिल्म हल्की-फुल्की होते हुए भी हिंदुस्तानी मुस्लिम और विदेशी इशारों पर आतंक फैलाने वालों में फर्क करती चलती है. लेकिन कहीं-कहीं उसकी बातों में उभरा फर्क एजेंडे जैसा मालूम पड़ता है. 

फिल्म में खुद को भारत की बेटी बताने वाली एक युवती से अक्षय जब कहते हैं, ‘बेटी ही रहना, मां बनने की कोशिश मत करना’ तो इसमें राजनीतिक टोन उभरता है. शेट्टी बार-बार 1993 मुंबई धमाके के फुटेज दिखाते हैं. क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य हैं? इसे देख कर ही आप समझ सकते हैं. कुल जमा अगर आप रोहित शेट्टी के सिनेमा और अक्षय-अजय-रणवीर के फैन हैं, तभी फिल्म का आनंद ले सकते हैं. सभी कलाकारों का काम औसत हैं. निर्देशन और गीत-संगीत भी इसी श्रेणी का है.

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