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जहां पहुंचे आजाद, वहां पार्टी साफ; 30 साल तक महासचिव रहे गुलाम नबी ने कांग्रेस को कितनी मजबूती दी?

गुलाम नबी आजाद राजीव गांधी, सीताराम केसरी और सोनिया गांधी के कार्यकाल में संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन उन्हें जिन राज्यों की कमान मिली, वहां कांग्रेस बुरी तरह हारी.

कांग्रेस छोड़ने के 8 महीने बाद जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और कद्दावर कांग्रेसी रहे गुलाम नबी आजाद फिर चर्चा में है. वजह है- उनकी हाल ही में प्रकाशित आत्मकथा आजाद. गुलाम नबी ने आत्मकथा के विमोचन पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी पर जमकर हमला बोला, जो मीडिया की सुर्खियां भी बनी.

पुस्तक विमोचन के बाद गुलाम नबी लगातार न्यूज़ चैनलों को इंटरव्यू दे रहे हैं और कांग्रेस को लेकर कई खुलासे कर रहे हैं. एक इंटरव्यू में गुलाम नबी आजाद ने कहा है कि मुसलमान होने की वजह से मैं कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं बन पाया. आजाद ने कांग्रेस के भीतर अपने किए कामों का भी खूब बखान किया. उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी के लिए मैं 1978 में जेल गया था. 

गुलाम नबी ने कहा कि मैंने राहुल गांधी की वजह से कांग्रेस छोड़ी है, वहां लोकतांत्रिक तरीके से फैसला अब नहीं होता है. कांग्रेस में फैसला लेने में सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे का कोई रोल नहीं है. आजाद के बयान पर कांग्रेस ने जोरदार पलटवार किया है. राहुल गांधी ने इसे अडानी मुद्दा से भटकाने की साजिश करार दिया है.

आजाद का 3 बयान, जिसने सनसनी मचा दी है...

1. आजादी के बाद कांग्रेस में कोई भी मुसलमान अध्यक्ष नहीं बन पाया है. मुसलमानों को राष्ट्रीय महासचिव से आगे नहीं बढ़ने दिया जाता है.

2. राहुल गांधी ने 2019 में कांग्रेस अध्यक्ष का पद क्यों छोड़ा, ये अगर मैं दुनिया को बता दूंगा तो भूचाल आ जाएगा. मैं यह बताना नहीं चाहूंगा.

3. ट्विटर पर जो कांग्रेसी काम कर रहे हैं, उससे 2000 ज्यादा गुना मैं कांग्रेसी रहा हूं. कांग्रेस को मैंने बहुत कुछ दिया है, लेकिन मुझे मिला कुछ नहीं.

आजाद के कांग्रेस से कुछ नहीं मिलने पर पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने कहा है कि वे सबसे बड़े लाभभोगी रहे हैं. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भी ऐसा ही आरोप लगाया है.

गांधी परिवार से कैसे तल्ख हुए रिश्ते?

2019 में हार के बाद गुलाम नबी आजाद ने 23 नेताओं के साथ मिलकर सोनिया गांधी को एक चिट्ठी लिखी. चिट्ठी में कांग्रेस के भीतर लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कराए जाने की मांग की गई थी. पत्र जिस वक्त लिखा गया था, उस वक्त सोनिया गांधी बीमार थीं और अस्पताल में भर्ती थीं. राहुस ने इसकी आलोचना की.

साल 2021 के फरवरी में गुलाम नबी आजाद राज्यसभा से रिटायर हो गए. सांसदी के साथ ही नेता प्रतिपक्ष का भी पद चला गया. इसी बीच कांग्रेस ने उन्हें कश्मीर में काम करने के लिए कहा.

शिवसेना नेता संजय राउत से बात करते हुए राहुल ने कहा था कि कांग्रेस के पास देने के लिए कुछ भी नहीं है. हमने गुलाम नबी जी को कश्मीर की कमान संभालने के लिए कहा तो उन्होंने इनकार कर दिया. 

अगस्त 2022 में कांग्रेस ने आजाद को कश्मीर में कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बना दिया. आजाद इससे नाराज हो गए और कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. आजाद ने कांग्रेस हाईकमान के इस फैसले को अपमान से जोड़ दिया.

कांग्रेस के शिखर पर कैसे पहुंचे गुलाम नबी?
1973 में राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले गुलाम नबी आजाद 1980 में युवा कांग्रेस के अध्यक्ष बने. आजाद को कांग्रेस में संजय गांधी का करीबी माना जाता था. 1980 में महाराष्ट्र के वाशिम से लोकसभा चुने गए. 

सांसद बनने के बाद आजाद को 1982 में इंदिरा कैबिनेट में शामिल किया गया. आजाद उस वक्त 32 साल के थे. संजय और इंदिरा की मौत के बाद आजाद कुछ दिनों तक अलग-थलग रहे, लेकिन बोफोर्स कांड के बाद राजीव के करीब आ गए. 

दरअसल, राजीव गांधी पर जब उनके करीबी रहे वीपी सिंह ने बोफोर्स में उनकी भूमिका पर सवाल उठाया तो कांग्रेसी पलटवार नहीं कर पाए. गुलाम ने इसकी आलोचना की और सभी राज्य प्रमुखों से जोरदार पलटवार करने के लिए कहा.

राजीव गांधी की हत्या के बाद आजाद नरसिम्हा सरकार में मंत्री तो रहे, लेकिन पावरफुल नहीं थे. राव के बाद कांग्रेस की कमान सीताराम केसरी को मिली. केसरी के समय आजाद की तूती बोलती थी. 10 जनपथ में तीन मियां (गुलाम नबी, तारिक अनवर और अहमद पटेल) एक मीर (मीरा कुमार) का मुहावरा पढ़ा जाता था. 

सोनिया गांधी के पावरफुल होने के बाद आजाद की हैसियत भी कांग्रेस में बढ़ी. आजाद को कई राज्यों का प्रभार मिला. कई मौकों पर सोनिया ने उन्हें संकटमोचक की भूमिका दी. 2005 में जब समझौते के तहत कश्मीर में कांग्रेस का मुख्यमंत्री बना तो आजाद दिल्ली से भेजे गए. 

2014 में कांग्रेस की सरकार जाने के बाद आजाद को राज्यसभा भेजा गया और उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. आजाद कांग्रेस में करीब 30 साल तक महासचिव और सीडब्ल्यूसी के सदस्य रहे.

जहां मिली कमान, वहां कांग्रेस साफ
30 साल तक कांग्रेस में महासचिव, केंद्र में मंत्री और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे गुलाम नबी आजाद का चुनावी परफॉर्मेंस अच्छा नहीं रहा है. कांग्रेस में रहते आजाद ने जिन राज्यों के लिए काम किया, वहां कांग्रेस साफ हो गई. इसे उदाहरण और तथ्यों से समझते हैं...

1. 1987 में इलाहाबाद के उपचुनाव में गुलाम नबी आजाद को पहली बार प्रभारी बनाया गया. एनडी तिवारी की सत्ता होने के बावजूद कांग्रेस यहां बुरी तरह हारी. यह हार कांग्रेस के लिए बाद में बहुत ही बुरा साबित हुआ. 1989 के चुनाव में कांग्रेस यूपी में हार गई. एनडी तिवारी के कई मंत्री विधानसभा नहीं पहुंच पाए. 

राम मंदिर मामले में बुरी तरह घिरी कांग्रेस ने उस वक्त आजाद का प्रमोशन एक मुस्लिम चेहरे के तौर पर की थी, लेकिन आजाद यूपी में मुसलमानों के वोट लाने में असफल रहे. प्रभारी होने के बावजूद कांग्रेस को ठोस समीकरण के सहारे जीत नहीं दिला पाए.

2. 2001 में सोनिया गांधी ने गुलाम नबी को तमिलनाडु का प्रभार सौंपा. गुलाम नबी ने कांग्रेस का गठबंधन जे जयललिता की पार्टी के साथ करने का फैसला किया. समझौते के तहत कांग्रेस सिर्फ 14 सीटों पर चुनाव लड़ी, जिसमें से 7 जीती. चुनाव के बाद तमिलनाडु में जयललिता की सरकार बनी, लेकिन मंत्रिमंडल में कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया.

कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने गुलाम नबी आजाद का खूब विरोध किया, जिसके बाद पार्टी ने जयललिता से गठबंधन तोड़ने का फैसला लिया.

3. 2002 में गुलाम नबी को फिर से यूपी का महासचिव बनाया गया. आजाद के रणनीति यहां इस बार भी काम नहीं आई और कांग्रेस को काफी नुकसान हुआ. कांग्रेस चौथे नंबर की पार्टी बनकर रह गई. 

2002 के चुनाव में कांग्रेस को 8 सीटों का नुकसान हुआ और सिर्फ 25 सीटें जीत पाई. केंद्र में मजबूती के साथ उभर रही कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका था. 

4. 2008 में कर्नाटक विधानसभा हारने के बाद 2009 में कांग्रेस ने गुलाम नबी को कर्नाटक का प्रभारी महासचिव बनाकर बेंगलुरु भेजा. मकसद- लोकसभा में बेहतरीन परफॉर्मेंस था. आजाद महासचिव बनने के बाद कर्नाटक में कई प्रयोग किए, लेकिन असफल रहे.

2009 में कर्नाटक की 28 सीटों पर हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 6 पर जीत मिली. 2004 में पार्टी को 8 पर जीत हासिल हुई थी. कर्नाटक में सीटों की कमी तब आई, जब 2004 के मुकाबले 2009 में कांग्रेस के सीटों में इजाफा हुआ था. 

5. 2009 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन सीएम वाईएस रेड्डी के निधन के बाद कांग्रेस वहां स्थिति संभालने के लिए गुलाम नबी को तैनात किया. शुरू हाईकमान से रजामंदी लेकर आजाद ने के रोसैया को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन जब वाईएसआर के बेटे जगन मोहन रेड्डी ने बगावत कर दी तो उनका मुकाबला करने के लिए किरण रेड्डी को उतार दिया. 

कांग्रेस के इस फैसले का विरोध करते हुए जगनमोहन ने इस्तीफा दे दिया. कांग्रेस इसके बाद आंध्र प्रदेश में चुनाव नहीं जीत पाई. हाल में किरण रेड्डी ने भी बीजेपी ज्वाइन कर लिया है.

6. 2016 में गुलाम नबी को कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया. कमान मिलते ही नबी अखिलेश यादव की पार्टी सपा से गठबंधन कर चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम करने लगे. गठबंधन के तहत सपा से कांग्रेस को 100 सीटें भी मिली, लेकिन कांग्रेस जीत नहीं पाई.

2012 में कांग्रेस को 28 सीटें मिली थी, लेकिन 2017 में यह 7 पर पहुंच गया. इसके बाद गुलाम नबी को पार्टी हरियाणा भेज दिया. 2019 में कांग्रेस को हरियाणा में भी हार हुई.

7. 2014 में कांग्रेस ने गुलाम नबी को राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया. चूंकि लोकसभा में पार्टी के पास संख्या बल नहीं था, इसलिए राज्यसभा का नेता प्रतिपक्ष महत्वपूर्ण पद था. 2019 में जब अनुच्छेद 370 हटाने का ऐलान हुआ तो गुलाम नबी फ्लोर मैनेज करने में असफल रहे.

कांग्रेस के तत्कालीन चीफ व्हिप भुवनेश्वर कलीता ने पद से इस्तीफा दे दिया, जिस वजह से पार्टी व्हिप नहीं जारी कर पाई. गुलाम नबी के रहते सदन में ऐसे कई मौके आए, जब पार्टी की किरकिरी हुई. 

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