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महाकवि: 'रे रोक युधिष्ठिर को न यहां'

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नई दिल्ली: कहीं पढ़ा था मैंने कि कविता शब्दों और शब्दों के संयोग से नहीं बनती है, बल्कि शब्दों का जाल जो यथार्थ पर फेंका जाता है उससे बनती है. अब शब्द को यदि देखना हो तो पाश की नजर से देखिए. पाश की नजर में ‘शब्द जो राजाओं की घाटियों में नाचते हैं, जो मेजों पर टेनिस बॉल की तरह दौड़ते हैं और जो मैचों की ऊसर जमीन पर उगते हैं, कविता नहीं होते.’ खैर आज यह सब चर्चा इसलिए कि 5 नवंबर को एबीपी न्यूज 'महाकवि' शो ला रहा है. जब हिन्दी कविता सिर्फ पत्रिकाओं में और खास वर्गों तक ही सिमटने लगी थी उस वक्त कुमार विश्वास युवाओं को 'दिवाना' बनाने लगे थे. कुमार विश्वास ने कविता को युवाओं तक पहुंचाया तो एबीपी न्यूज अपने शो 'महाकवि' के जरिए उन महाकवियों के बारे में जो सिर्फ पाठ्य पुस्तक तक सिमट रहे हैं उन्हें नई 'पौध' तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है. प्रश्न: एबीपी न्यूज के शो महाकवि में ऐसा क्या खास है जो दर्शकों का मनमोह लेगा? 'महाकवि' जैसे शो की जरूरत क्यों है? जवाब: मैं लगभग तीन दशकों से हिन्दी कविता की वाचिक परम्परा से जुड़ा हुआ हूं. लगभग दो दशकों तक विश्वविद्यालय के हिन्दी शिक्षण से जुड़े रहने के कारण मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ, कि मैं अपनी मातृभाषा हिन्दी के सान्निध्य में रहा हूं. लेकिन एक बहुत बड़ा वर्ग है, जो प्रारम्भिक पढाई या 10वीं-12वीं के बाद हिन्दी कविता से दूर चला जाता है. जीवन की तमाम वांछित-अवांछित व्यस्तताओं में घिर कर कविता-कहानियां कहीं पीछे छूट जाती हैं. दिनकर, निराला, प्रेमचंद - ये सब सिर्फ नाम रह जाते हैं. मैं देश-दुनिया के अपने तमाम लाइव कार्यक्रमों में अपनी कविताओं के अलावा उन बड़े कवियों को तर्पण स्वरुप उनकी कविताओं का भी प्रयोग करता हूं. ऐसे में मैंने महसूस किया कि जब भी मैंने दिनकर जी, पन्त जी, बच्चन जी, दुष्यंत जी इत्यादि की कोई कविता उद्धृत की, तो श्रोताओं ने उसे ख़ूब उत्साह से स्वीकार किया. श्रोताओं से सीधे संपर्क का ये फायदा हुआ कि मैंने सोचा कि यदि टेलीविज़न जैसे सशक्त माध्यम से उन महान कवियों की कविताएं और उनके जीवन के तमाम छुए-अनछुए पन्ने दर्शकों तक एक मनोरंजक और संगीतबद्ध रूप में पहुंचाए जाएं, तो लाखों दर्शकों की मांग पूरी करने के साथ-साथ हिन्दी को एक समर्पण भी होगा और उन कवियों को तर्पण भी. इसी सोच को ले कर महाकवि का प्रारूप तैयार किया गया. तो इस शो में हम उन महाकवियों की किस्सागोई करेंगे, जिन्होंने हिन्दी कविता को नए आयाम दिए. इसमें उनकी कहानी तो होगी ही, उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे रोचक पहलुओं को रि-कन्सट्रक्ट किया गया है, जो आम तौर पर हमारे दर्शकों को पता नहीं होंगे. इस कार्यक्रम का सबसे रोमांचक पहलू है इसका संगीत. इन सभी कवियों की प्रमुख कविताओं को मैंने कम्पोज़ कर के अपनी टीम से संगीतबद्ध करवाया है. कुल मिला कर यह एक ऐसा पैकेज है, जो मनोरंजक भी है, जिसमें जानकारी भी है, उत्सुकता भी है और उन महान कवियों को इस पीढ़ी की ओर से तर्पण भी है. बस 5 नवम्बर से श्रृंखला शुरू हो रही है. उम्मीद है कि यह प्रयास हर वर्ग, हर उम्र के दर्शकों को पसंद आएगी. सबसे अहम बात यह है कि इसमें कई ऐसी रोचक जानकारी दी जाएगी जो आम दर्शकों को शायद ही पता हो. kumar 3 प्रश्न: जैसा कि आपने कहा महाकवि में रोमांचक पहलू संगीत है. जब किताबें या यूं कहें प्रिंट नहीं था तो लोग सुनकर याद करते थे. पूरी दुनिया में गाकर कविता कही जाती थी. अपने यहां भी वेदों को गुरू लयवद्ध तरीके से गाकर शिष्यों तक पहुंचाए..लेकिन किताबें आने के बाद कविता का पाठ होने लगा. कविता के अपने आंतरिक लय होते हैं. क्या इस संगीत से शब्द के अपने मर्म पर असर नहीं पड़ेगा? जवाब: 'लय' के बारे में एक रोचक तथ्य यह है कि निराला जी ने मुक्त छन्द कविता की शुरुआत की और बाद में अज्ञेय जैसे कवियों ने इसे खूब निभाया. लेकिन उनकी मुक्त छन्द कविता में भी एक लय प्रवाह था. अंतर इतना था कि पारम्परिक कविता में शब्दात्मक विधान चलता था और मुक्त छन्द में भावात्मक विधान. देखिए, लय से मुक्त तो कुछ भी नहीं हो सकता. जीवन की सबसे मूलभूत प्रकृति है हृदय की धड़कन. वो एक लय में चलती है. यदि हृदय की धड़कन या नब्ज़ की लय टूटती है, तो आदमी को अस्पताल का मुंह देखना पड़ता है. हमने इस लयात्मकता को भी संगीत के साथ ढाला है और इससे यह हुआ कि जो कविता आम तौर पर सुनने में जटिल लगती थी, वह संगीत के साथ ज़्यादा कर्णप्रिय लगने लगी. प्रश्न: 'इंदुजी, इंदुजी, क्या हुआ आप को, सत्ता की मस्ती में भूल गईं बाप को' ऐसी तीखी कविताएं वर्तमान परिदृश्य में क्यों नहीं दिखती हैं? क्या अब हिन्दी कवि सत्ता सुविधाभोगी हो गये हैं? जवाब: कविता के लेखन में निश्चित रूप से बदलाव आया है. जैसे जीवन दर्शन की कुछ कविताएं कबीर ने कुछ प्रतीकों के माध्यम से उस समय कही थी लेकिन यदि आज कोई कवि वही बात लिखता है तो पता नहीं क्या हो जाता. या दिनकर जी ने जिस तरह से सदन के अंदर अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को लगभग फटकारते हुए एक कविता सुनाई थी- 'रे रोक युधिष्ठिर को न यहां'. आज के माहौल में ऐसा सम्भव नहीं है, दोनों ही पक्ष से नहीं है. न तो कहने वाला इतनी हिम्मत से यह कह सकता है और न तो सुनने वाले में इतना धैर्य होता है. बाबा नागार्जुन की कई कविताओं के साथ भी ऐसा ही था. इसलिए, यह तो मानना पड़ेगा कि समय के हिसाब से कविता के स्वरुप में बदलाव आया है. प्रश्न: बाजारवाद का मुकाबला साहित्य कैसे करेगा? दूसरी बात कि क्या बाजारवाद से कविता को आंख से आंख मिलाकर चलना चाहिए या हाथ से हाथ मिलाकर? जवाब: निजी रूप से मेरी कविता पर बाज़ारवाद कभी हावी नहीं हुआ. मैंने कविता के लिए बाज़ार ज़रूर तैयार किया है लेकिन कभी बाजार के हिसाब से कविता नहीं लिखी. साहित्य और बाज़ार हालांकि अलग-अलग चीज़ें हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि यदि साहित्य का बाज़ार बनता है तो इसमें कोई ख़राबी है. क्या यह अच्छी बात है कि हमने निराला, नागार्जुन और अदम जैसे कवि गरीब में रीत जाने के लिए छोड़ दिए थे? बाबा नागार्जुन ने निराला के लिए कहा भी था "उसे मरने दिया हमने, रह गया घुटकर पवन, अब भले ही याद में करते रहें सौ-सौ हवन". तो ऐसा क्यों होना चाहिए कि साहित्यकार गरीबी में मर जाए, तभी उसे उत्कृष्ट माना जाए? अब जैसे एबीपी न्यूज़ हिन्दी कवियों पर इतना बड़ा कार्यक्रम करने की कल्पना कर सकता है तो क्या यह बिना बाज़ार के सम्भव था? तो सौंदर्य तभी है जब साहित्य और उसका बाज़ार एक-दूसरे के पूरक बन कर सकारात्मकता की तरफ चलें. प्रश्न: किन कवियों के बारे में महाकवि शो में बताया जाएगा? जवाब: इस श्रृंखला के लिए दस कवियों का चयन सबसे कठिन काम था. मां हिन्दी का आंचल इतना विस्तृत और वृहद है कि उसमें अनगिनत सितारे हैं. मैं अक्सर कहता भी हूं, भाषाएं और माताएं शामियानों से नहीं, बेटे-बेटियों से बड़ी होती हैं. लेकिन चूंकि दस की सीमा थी, सो कई बार विचार करने के बाद महाकवियों के नाम तय किए गए - दिनकर, दुष्यंत, निराला, बाबा नागार्जुन जैसे कई धरोहरों को आप इस शो के जरिए जानेंगे. कोशिश करेंगे कि इस श्रृंखला को और आगे ले जाया जा सके. बहरहाल, दर्शकों के साथ-साथ मुझे भी इंतज़ार है पांच नवम्बर का, जिस दिन यह श्रृंखला शुरू होनी है. मैं उम्मीद करता हूँ कि महाकवि के माध्यम से मैं अपने ऋषि-ऋण का एक भाग चुका पाऊंगा.
Published at : 02 Nov 2016 06:13 PM (IST)
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