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एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने कहा- फंगल इन्फेक्शन को उनके नाम से पहचाने, ना कि उसके रंग से

डॉ गुलेरिया का मुताबिक म्यूकोर्मिकोसिस की बात करते समय ब्लैक फंगस शब्द का इस्तेमाल नहीं करना बेहतर है, क्योंकि इससे बहुत से भ्रम पैदा होते हैं.

नई दिल्ली: इन दिनों सामने आ रहे फंगल इन्फेक्शन को उनके नाम से पहचाने ना कि उसके रंग से. फिर चाहे वो काला हो, सफेद हो या पीला. ये कहना है देश के मशहूर डॉक्टर और एम्स के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया का. उनके मुताबिक कोरोना रोगियों में देखा गया फंगल संक्रमण ज्यादातर म्यूकोर्मिकोसिस है, जोकि संक्रमक नहीं है. वहीं उन्होंने साफ किया कि ऑक्सीजन थेरेपी और संक्रमण पकड़ने के बीच कोई निश्चित संबंध नहीं है, बल्कि 90 फीसी - 95 फीसदी म्यूकोर्मिकोसिस के रोगी या तो डायबिटीज के मरीज हैं, या उनके इलाज में स्टेरॉयड इस्तेमाल हुआ है. 

इन दिनों ब्लैक फंगस, वाइट फंगल इन्फेक्शन और येलो फंगल इन्फेक्शन सुन रहे होंगे आप. लेकिन ये सब अलग अलग फंगल इन्फेक्शन हैं और इसके रंग से इसका कोई लेना देना नहीं है ये कहना है दिल्ली एम्स के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया का. रणदीप गुलेरिया कोरोना से जुड़ी कई कमिटी में सदस्य हैं. डॉ गुलेरिया कोरोना की क्लीनिकल मैनेजमेंट बनाने वालों में से एक हैं. 

डॉ गुलेरिया का मुताबिक म्यूकोर्मिकोसिस की बात करते समय ब्लैक फंगस शब्द का इस्तेमाल नहीं करना बेहतर है, क्योंकि इससे बहुत से भ्रम पैदा होते हैं. "ब्लैक फंगस, फंगल इन्फेक्शन का दूसरा इंफेवशन है और काले बिंदुओं या रंग मौजूदगी की वजह से ये शब्द म्यूकोर्मिकोसिस से जुड़ा हुआ है. 

दिल्ली एम्स के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया ने बताया कि सामान्य तौर पर, कैंडिडा, एस्परगिलोसिस, क्रिप्टोकोकस, हिस्टोप्लाज्मोसिस और कोक्सीडायोडोमाइकोसिस जैसे विभिन्न प्रकार के फंगल संक्रमण होते हैं. म्यूकोर्मिकोसिस, कैंडिडा और एस्परगिलोसिस लो इम्युनिटी वाले लोगों में ज्यादा देखे जाते हैं.  म्यूकोर्मिकोसिस एक सामान्य फंगल संक्रमणों में से एक है, जो कोरोना मरीजों में ठीक होने या ठीक होने के बाद देखा जा रहा है. रिपोर्ट किए जा रहे मामलों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन संक्रामक रोग नहीं है, जिसका मतलब है कि ये इन्फेक्शन एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता है, जैसा कि कोरोना.

उन्होंने कहा कि कैंडिडा फंगल संक्रमण मुंह में सफेद धब्बे, ओरल कैविटीज और जीभ जैसे लक्षणों के साथ दिख सकता है. ये खून में भी पाया जा सकता है और ऐसी स्थिति में यह गंभीर हो सकता है. वहीं एस्परगिलोसिस, जो अपेक्षाकृत आम नहीं है, फेफड़ों में कैविटी बनाकर फेफड़ों को प्रभावित करता है और आक्रमण करता है. कोरोना में जो देखा गया है ये ज्यादातर म्यूकोर्मिकोसिस है, एस्परगिलोसिस कभी-कभी देखा जाता है, और कुछ लोगों में कैंडिडा.

म्यूकोर्मिकोसिस से संक्रमित होने वाले लोगों की हाई रिस्क वाली श्रेणी के बारे में डॉ रणदीप गुलेरिया ने बताया कि, "90% - 95% म्यूकोर्मिकोसिस से संक्रमित होने वाले रोगियों को डायबिटीज होता है और या उनके इलाज में स्टेरॉयड का इस्तेमाल हुआ होता है. ये संक्रमण उन लोगों में बहुत कम देखने को मिलता है जो न तो डायबिटिक हैं और न ही स्टेरॉयड ले रहे हैं. म्यूकोर्मिकोसिस के लिए कुछ चेतावनी संकेत जैसे सिरदर्द, नाक से खून बह रहा है, आंख के नीचे सूजन, चेहरे की सनसनी कम हो रही है, अगर हाई रिस्क वाले मरीजों या स्टेरॉयड लेने वालों में देखा जाता है, तो डॉक्टरों को सूचित करने की आवश्यकता होती है ताकि प्रारंभिक निदान और उपचार दिया जा सके."

वहीं ऑक्सीजन थेरपी या इंडस्ट्रियल ऑक्सीजन प्लांट से मेडिकल ऑक्सीजन बनाने और इस्तेमाल की वजह से म्यूकोर्मिकोसिस होने की बात को भी उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया. उन्होंने साफ कहा की घर पर इलाज करा रहे कई मरीज, जो ऑक्सीजन थेरेपी पर नहीं थे, वो भी म्यूकोर्मिकोसिस से संक्रमित पाए गए हैं. इसलिए ऑक्सीजन थेरेपी और संक्रमण को पकड़ने के बीच कोई निश्चित संबंध नहीं है.

एम्स के डायरेक्टर डॉ गुलेरिया ने साफ तौर पर कहा की एंटी-फंगल इलाज कई हफ्तों तक चलता है, इसलिए यह अस्पतालों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है. सर्जरी को भी विवेकपूर्ण तरीके से करने की आवश्यकता है क्योंकि म्यूकोर्मिकोसिस के लिए आक्रामक सर्जरी के कोरोना मरीज पर एडवर्स इफ़ेक्ट हो सकता है. 

डायबिटीज रोगियों के लिए स्वच्छता बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसे रोगियों में अवसरवादी संक्रमण की संभावना बहुत अधिक होती है. ऑक्सीजन कंसंट्रेटर का इस्तेमाल करने वालों को नियमित रूप से ह्यूमिडिफायर की सफाई सुनिश्चित करनी चाहिए.

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