नई दिल्लीः क्या लोगों की जेब में पैसा नहीं है या सरकार के पास पैसा नहीं है ? क्या बैंकों के पास कैश की कोई कमी है ? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि देश में पैसा कम खर्च हो रहा है और लोगों का रुझान भी खरीदारी की तरफ कम हो रहा है. इस बार दिवाली में भी लोगों ने उस तरह की खरीदारी नहीं की जिस तरह की खरीदारी की उम्मीद जताई जा रही थी.


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पहले आपको ये समझना जरूरी है कि कैश की कमी और कैश फ्लो में क्या अंतर है-


कैश की कमी का मतलब होता है देश में करेंसी की कमी और नोटों की कमी-जैसा नोटबंदी के कुछ महीनों बाद हुआ था. फिलहाल ऐसा बिलकुल नहीं है इसीलिए मौजूदा संकट कैश फ्लो की कमी का है. कैश फ्लो के कम होने का मतलब है कि पैसा बाजार में घूम नहीं रहा है. जिसके पास है उसने उसे अपने पास रोका हुआ है. खर्च नहीं कर रहा है.



जेएनयू के प्रोफेसर अरुण कुमार के मुताबिक जब अनिश्चितता की स्थिति होती है तो लोग पैसे रोक कर रखते हैं और खर्च करना बंद कर देते हैं. सभी पैसा दबाकर रखे तो कैश फ्लो कम हो जाता है. सिर्फ आम लोग ही नहीं बल्कि कारोबारी और व्यापारी भी नया निवेश करने से बच रहे हैं. पैसा डूबने का डर व्यापार की रफ्तार को कम कर रहा है. हालांकि कुछ जानकार का मानना है कि कैश फ्लो की कमी नहीं है, अर्थशास्त्री एस नारायण का कहना है कि हाल ही में कई रिटेल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जिस तरह की खरीददारी देखी गई है वह कैश फ्लो में आयी कमी के दावे को खारिज़ करती है.


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जीडीपी के आंकड़ों में आ रही है गिरावट
इस साल की पहली तिमाही में जीडीपी के जो आंकड़े आए वो 6 साल में सबसे कम था. देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार 7 फीसदी से गिरकर 5 प्रतिशत पर आ गयी. देश की जीडीपी का गिरना हर नागरिक पर असर डालता है क्योंकि इससे प्रति व्यक्ति आय का औसत भी कम होता है. अगर जीडीपी 8 फीसदी हो तो प्रति व्यक्ति आय में हर महीने 843 रुपये का इजाफा होगा और अभी जीडीपी 5 फीसदी है तो प्रति व्यक्ति आय में मासिक बढ़त घटकर 526 रुपये रह गयी है. मान लीजिए कि जीडीपी 4 फीसदी हो जाती है तो ये सिर्फ 421 रुपये रह जाएगी. यानी जीडीपी गिरते ही लोगों की जेब में आने वाला पैसा भी कम हो जाता है. लोगों के पास पैसा कम आता है तो वो खर्चों में कटौती शुरू कर देते हैं और इसी का असर कैश फ्लो के तौर पर दिख रहा है. प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि लोग खर्च नहीं कर रहे हैं जैसे फुटवियर, कार टेक्सटाइल की बिक्री कम हो रहा है तो लोग घबराहट में पैसा होल्ड कर रहे हैं.


अब सवाल ये उठता है कि क्या बैंकों के पास कैश की कमी है ?
बैंकों से मिलने वाला कर्ज बाजार में कैश का एक बड़ा स्रोत होता है. पिछले कुछ समय में इस कर्ज में कमी आयी है. मतलब बैंक लोन देने में हिचक रहे हैं. इसके दो बड़े कारण हैं. पहला- लगातार बढ़ता एनपीए और दूसरा बैंकों का विलय. वहीं आरबीआई का कहना है कि मौजूदा हालात में कैश संकट नहीं है और 21 लाख 30 हजार करोड़ रुपये कैश सर्कुलेशन में है. ऐसे में दिक़्क़त कैश की नहीं बल्कि कैश फ्लो की है.


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एनपीए ने बैंकों को नर्वस बनाया है और इसकी वजह से बैंकों ने लोन देना बंद कर दिया है. इतने लाख करोड़ रुपये का एनपीए हो गया है कि बैंकों को भी अब लोन देने में डर लगता है. हालांकि लोन ही बैंक की आय का जरिया भी होते हैं. इसलिए बैंक की तरफ से आम लोगों को लोन देने में कोई कमी नहीं आयी है लेकिन इंडस्ट्री की शिकायत है कि उन्हें बैंक कर्ज नहीं दे रहे हैं. वहीं सरकारी बैंकों के विलय के फैसले का असर ये हुआ है कि बैंको का सारा ध्यान अपनी बैलेंस शीट सही करने पर लगा हुआ है. ऐसे में माना जा रहा है कि जिन बैंकों का विलय हो रहा है उन्होंने पिछले कुछ समय से कर्ज देने की रफ्तार कम कर दी है.


क्या सरकार के पास पैसा नहीं है ?
सरकार जितना ज्यादा खर्च करेगी, बाजार में उतना कैश बढ़ेगा लेकिन सरकार खर्च तभी करेगी जब सरकार की आय बढ़ेगी. इसके लिए पहले ये जानना होगा कि सरकार कैसे कमाती है? सरकार के पास आने वाले हर 100 रुपये में 21 रुपये कॉरपोरेट टैक्स, 16 रुपये इनकम टैक्स, 19 रुपये जीएसटी और दूसरे टैक्स, 8 रुपये एक्साइज, 4 रुपये कस्टम और करीब 32 रुपये उधार और आयात-निर्यात से आते हैं. यानी सरकार की कमाई का सबसे बड़ा स्रोत टैक्स और आयात निर्यात है. पिछले कुछ समय में इन दोनों में कमी आयी है.



इनकम टैक्स और जीएसटी से आने वाली आय घटी
पिछले साल इनकम टैक्स से होने वाली आय में 11.3 फीसदी की बढ़त थी जो इस बार घटकर 6 फीसदी रह गयी. इसी तरह सितंबर महीने में जीएसटी कलेक्शन पिछले 19 महीने में सबसे कम हुआ और 91,916 करोड़ रुपये पर रहा.


अरुण कुमार के मुताबिक जो रेवेन्यू कलेक्शन है उसमें भारी गिरावट है और जब वो कम होगा तो इसका मतलब घाटा बढ़ने लगेगा. जब घाटा बढ़ेगा तो आप कटौती करेंगे, कटौती करेंगे तो इकॉनमी और स्लोडाउन हो जाएगी. इसलिए ये नहीं कह सकते कि सरकार के पास कैश की कमी है ये कह सकते हैं कि सरकार के पास रेवेन्यू कम आ रहा है इसलिए खर्च कम कर रही है. यानी आम लोगों की तरह सरकार ने भी अपने खर्च में कटौती की है.


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2017-18 में सरकार का खर्च जीडीपी का 14.7 फीसदी था और इस साल (2018-19) ये 13.04 फीसदी रह गया है वहीं फ्रांस की सरकार अपनी जीडीपी का 57 फीसदी खर्च करती है. सरकारी खर्च अमूमन जन कल्याण की योजनाओं और आधारभूत ढांचा बनाने के लिए होता है. इसके जरिए पैसा आम लोगों से लेकर इंडस्ट्री तक पहुंचता है वो अब नहीं हो रहा है.



कैश फ्लो बनाने के लिए क्या करना होगा ?
कैश फ्लो तभी बढ़ सकता है जब लोगों के पास पैसे की कमी न हो और उसके लिए जरूरी है नौकरी और अच्छी आय. यानी सरकार को बेरोजगारी पर लगाम लगानी होगी और एक्सपोर्ट बढ़ाना होगा. इसके साथ ही गरीब लोगों तक पैसा पहुंचाना होगा.