कांग्रेस को झटका, बीजेपी के हाथों गंवाई संसदीय समिति की अध्यक्षता
पुनर्गठन के बाद कांग्रेस के पास अब गृह मंत्रालय और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़ी स्थायी समिति की अध्यक्षता रह जाएगी, जबकि बीजेपी के सांसद कार्मिक और क़ानून मंत्रालय के अलावा मानव संसाधन मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समितियों की अध्यक्षता रहेगी.

नई दिल्ली: संसद की स्थायी समितियों का पुनर्गठन कर दिया गया है. पुनर्गठन में कांग्रेस को झटका लगा है. पार्टी से कार्मिक और न्याय मंत्रालय से जुड़ी अहम संसदीय स्थायी समिति की अध्यक्षता छीन गई है. अभी तक इस समिति की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कांग्रेस नेता आनंद शर्मा की जगह बीजेपी के भूपेंद्र यादव को अध्यक्ष बनाया गया है.
आनंद शर्मा अब विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति के अध्यक्ष बनाए गए हैं. इतना ही नहीं, राज्य सभा की अध्यक्षता वाली आठ स्थायी समितियों में से कांग्रेस के खाते में अब तीन की जगह केवल दो समिति की अध्यक्षता रह जाएगी.
क्यों अहम है ये बदलाव ?
कार्मिक और न्याय मंत्रालय से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष पद को लेकर बीजेपी और कांग्रेस में ज़बर्दस्त तनातनी चल रही थी. बीजेपी का कहना था कि अब चूंकि राज्य सभा में कांग्रेस और बीजेपी की सदस्य संख्या बराबर है लिहाज़ा दोनों पार्टी 2-2 स्थायी समितियों की ही अध्यक्षता कर सकती है, लेकिन तनातनी की असली वजह कुछ और बतायी जा रही है.
दरअसल आनंद शर्मा की अध्यक्षता वाली समिति चुनाव सुधारों को लेकर एक रिपोर्ट तैयार कर रही है जिसमें वर्तमान चुनावी व्यवस्था को बदलने के प्रस्तावों पर भी विचार हो रहा है. इनमें सबसे अहम है वर्तमान में जारी व्यवस्था First Past the Post System की जगह Proportional Representation यानि आनुपातिक प्रतिनिधित्व लाने का मामला. समिति ने सभी पार्टियों के पास पांच पन्नों की एक प्रश्नावली भेजकर उनकी राय भी मांगी है. माना जा रहा है कि बीजेपी समिति की इस पहल से नाराज़ थी और इसलिए इस समिति की अध्यक्षता को लेकर दावा ठोंक रही थी.
फ़िलहाल राज्य सभा की अध्यक्षता वाली आठ समितियों में से तीन की अध्यक्षता कांग्रेस के पास जबकि दो की बीजेपी के पास थी. बाक़ी तीन में से 1-1 की अध्यक्षता सपा, जेडीयू और टीएमसी के पास थी. गृह मंत्रालय, कार्मिक और क़ानून मंत्रालय के अलावा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की अध्यक्षता अभी कांग्रेस के पास है. गृह मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति के अध्यक्ष पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम तो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़ी समिति की अध्यक्ष वरिष्ठ पार्टी नेता रेणुका चौधरी थीं.
अब क्या है स्थिति ?
पुनर्गठन के बाद कांग्रेस के पास अब गृह मंत्रालय और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़ी स्थायी समिति की अध्यक्षता रह जाएगी, जबकि बीजेपी के सांसद कार्मिक और क़ानून मंत्रालय के अलावा मानव संसाधन मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समितियों की अध्यक्षता रहेगी.
पुनर्गठन के बाद भी बीजेपी के पास केवल दो समितियों की ही अध्यक्षता रहेगी लेकिन कांग्रेस से छीनी गई समिति का फ़ायदा बीजेपी की सहयोगी अकाली दल को मिल गया है. वाणिज्य मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति के अध्यक्ष अकाली दल के वरिष्ठ नेता नरेश गुजराल बनाए गए हैं. पहले माना जा रहा था कि बीजेपी एआईएडीएमके के लिए एक समिति की अध्यक्षता छोड़ सकती है लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
शरद यादव और मुकुल रॉय की संसदीय समितियों के अध्यक्ष पद से छुट्टी
पुनर्गठन की एक और ख़ास बात ये रही कि अपनी अपनी पार्टी से निकाले जा चुके शरद यादव और मुकुल रॉय की स्थायी समियों के अध्यक्ष पद से छुट्टी. जेडीयू से निकाले जा चुके शरद यादव की उद्योग मंत्रालय तो तृणमूल कांग्रेस से बाहर किए गए मुकुल रॉय की परिवहन, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी समिति के अध्यक्ष पद से छुट्टी कर दी गई है. हालांकि इसे तय माना जा रहा था और इन्हें हटाने के लिए दोनों नेताओं की पार्टियों ने पहले ही राज्य सभा सभापति को सिफ़ारिश भेज दी थी.
जेडीयू की तरफ़ से आरसीपी सिंह को शरद की जगह उद्योग मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति का अध्यक्ष बनाया गया, जबकि डेरेक ओ ब्रायन को मुकुल रॉय की जगह स्थायी समिति का अध्यक्ष बनाया गया
बाक़ी समितियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं
बाक़ी समितियों में कोई अप्रत्याशित बदलाव नहीं किए गए हैं. बदलाव के क़यासों के उलट वरिष्ठ कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली वित्त मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति की अध्यक्षता बनाए रखने में सफ़ल रहे हैं. मोइली की अध्यक्षता वाली समिति नोटबंदी को लेकर अपनी रिपोर्ट तैयार करने के आख़िरी चरण में है.
क्या होती हैं स्थायी समितियां ?
संसद में विभिन्न मंत्रालयों से जुड़ी 24 स्थायी समितियां होती हैं. इनमें 16 समितियों की अध्यक्षता लोकसभा के सांसदों के हाथों में होती है, जबकि आठ की अध्यक्षता राज्य सभा के सांसदों के पास. इन स्थायी समितियों का प्रमुख काम संसद के शोर से अलग अपने अपने संबद्ध मंत्रालयों और विभागों के काम काज की समीक्षा करना और उनपर सुझाव देना होता है. हालांकि इन सुझावों को मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं होती है और इन्हें ख़ारिज़ करने या मानने का अधिकार सरकार के पास होता है. इन समितियों का कार्यकाल एक साल का होता है और हर साल इनका पुनर्गठन होता है.
Source: IOCL























