नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने विचाराधीन कैदी के स्वास्थ्य से जुड़ी ‘‘अस्पष्ट’’ रिपोर्ट देने के लिए तिहाड़ जेल अधिकारियों को फटकार लगाई है. अदालत ने अधीक्षक और चिकित्सा अधिकारी से पूछा कि इस चूक के लिए उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई क्यों शुरू नहीं की जानी चाहिए. तिहाड़ जेल ‘डिस्पेंसरी’ के प्रभारी चिकित्सक अधिकारी की तरफ से एक ‘‘अस्पष्ट’’ चिकित्सा रिपोर्ट दी गई जिसे जेल अधीक्षक ने जस का तस आगे बढ़ा दिया. इसे लेकर अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अनुज अग्रवाल ने अधिकारियों को फटकार लगाई.


कैदी ने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए जमानत का अनुरोध किया था


न्यायाधीश ने विचाराधीन कैदी सत्य नारायण की मेडिकल रिपोर्ट मांगी थी, जिसे एक अक्टूबर को दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल में भर्ती कराया गया था. आठ अक्टूबर को उसे अंतरिम जमानत पर रिहा कर दिया गया था, नारायण ने तब खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए जमानत का अनुरोध किया था.


चिकित्सकीय रिपोर्ट में जेल अधिकारियों ने अदालत से कहा था कि नारायण की रिहाई के मद्देनजर उनके स्वास्थ्य से जुड़ी कोई जानकारी नहीं दी जा सकती. न्यायाधीश ने इस बात पर नाराजगी जताई कि जेल अधिकारियों ने नारायण के अंतरिम जमानत पर रिहा होने से पहले उसकी चिकित्सकीय स्थिति का पता लगाने के कोई प्रयास किए बिना मेडिकल रिपोर्ट सौंप दी.


अदालत के निर्देश का पालन न करना दंडनीय अपराध- जज


एसीजे अग्रवाल ने 12 अक्टूबर के एक आदेश में कहा, ‘‘किसी भी अदालत के निर्देश का पालन न करना, न केवल जेल अधिकारियों की ओर से एक गंभीर कदाचार है, बल्कि भारतीय दंड संहिता के तहत एक दंडनीय अपराध भी है.’’ उन्होंने अधीक्षक और चिकित्सा अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि चूक के लिए उनके खिलाफ उचित दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की जानी चाहिए. अदालत ने 18 अक्टूबर को नारायण की अनिश्चित स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उसे जमानत प्रदान की.


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