नई दिल्ली: तालिबान के कब्जे के बाद शुरू हुआ अफगानिस्तान का मानवीय संकट बढ़ता जा रहा है. हजारों की संख्या में अफगानी देश छोड़ रहे हैं, इस वजह से बड़ा शरणार्थी संकट खड़ा हो गया है. कई देशों ने अफगानों को शरण देने का एलान किया है. जबकि कई देशों ने अफगानी शरणार्थियों की एंट्री पर बैन लगा दिया है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल कि आखिर इन शरणार्थियों का भविष्य क्या है? 


वो देश जिन्होंने अपने दरवाजे अफगानियों के लिए बंद कर दिए
सबसे पहले उन देशों की बात जिन्होंने अपने दरवाजे परेशान, हताश अफगानियों के लिए बंद कर दिए हैं. ये वो देश हैं जो खुद को अफगानियों का मित्र बताते हैं लेकिन जरूरत के वक्त इन्होंने अपना मुंह मोड़ लिया है. प्रधान मंत्री इमरान खान ने जून में कहा था कि अगर तालिबान ने नियंत्रण कर लिया तो उनका देश अफगानिस्तान के साथ अपनी सीमा को सील कर देगा. लेकिन सीमा पर सतर्कता की कमी की वजह से बड़ी संख्या में अफगानी भागकर पाकिस्तान में घुस रहे हैं. 


खुद को अफगानियों का हितैषी बताने वाला पाकिस्तान ने मुंह मोड़ा
एक अनुमान के मुताबिक पाकिस्तान में इस समय करीब 30 लाख अफगान शरणार्थी मौजूद हैं. सवाल ये कि खुद को अफगानियों का हितैषी बताने वाला पाकिस्तान आखिर क्यों इस मुश्किल वक्त में अफगानियों से मुंह मोड़ रहा है तो इसकी बड़ी वजह तालिबान है.  तालिबान की सत्ता में वापसी पाकिस्तान के शह पर ही हुई है. 


काबुल में तालिबान का सत्ता में लौटने का मतलब है कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान भी सत्ता में लौट आया है. इस्लामाबाद ने ही तालिबान को हथियार, गोला बारूद, ट्रेनिंग और फंडिंग दी है. इसके अलावा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और तालिबान की दोस्ती किसी से नहीं छिपी.


इन देशों ने भी अफगानियों शरणार्थियों पर लगाई पाबंदी
इसके अलावा इस्लामिक देशों का मुखिया बनने की चाहत रखने वाले तुर्की ने भी आम अफगानियों से दूरी बना ली है. और अफगानी शरणार्थियों को रोकने के लिए ईरान बॉर्डर पर तुर्की दीवार खड़ी कर रहा है.


ताजिकिस्तान ने भी अपने सैनिकों को अलर्ट पर रखा है. ऑस्ट्रिया ने किसी भी अफगान शरणार्थी को लेने से इनकार किया है. स्विट्जरलैंड ने भी कहा है कि वो अफगानिस्तान से सीधे आने वाले शरणार्थियों के बड़े समूहों को स्वीकार नहीं करेगा. रूस ने अफगानिस्तान भाग रहे लोगों को शरण देने से साफ इनकार कर दिया है. रूस का कहना है कि वो अपने देश में शरणार्थियों की आड़ में आतंकियों की एंट्री नहीं चाहता.


जिन्होंने अपने दरवाजे हताश परेशान अफगानियों के लिए खोले हुए हैं, भारत सबसे आगे
इस लिस्ट में भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ईरान जैसे बड़े देश शामिल हैं. हिंदुस्तान हमेशा से अफगानिस्तान में शान्ति का समर्थक रहा है. भारत आम अफगानियों के साथ भूत, भविष्य और वर्तमान हर वक्त में खड़ा रहा है. इस मुश्किल घड़ी में लगभग हर दिन अफगानिस्तान से अफगान नागरिकों को एयरलिफ्ट करके भारत लाया जा रहा है.


भारत ने ई-वीजा की एक नई श्रेणी शुरू की है, जो अभी छह महीने के लिए वैध होगी. वीजा के आवेदनों को ट्रैक करने के लिए ई-वीजा की एक नई श्रेणी भी शुरू की है. इसके जरिए जारी हुआ वीजा छह महीनों तक वैध होता है. जिसके लिए बड़ी संख्या में अफगान नागरिकों ने अपना रजिस्ट्रेशन भी करवाया है.


बता दें कि भारत ने शरणार्थियों पर 1951 के कन्वेंशन या शरणार्थियों की स्थिति से संबंधित 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किया है. फिर भी मानवीय आधार पर नई दिल्ली से फैसले लिए जा रहे हैं, इनमें अफगानिस्तान के बड़े नेता भी शामिल हैं. 


हिंदुस्तान की मदद अफगानियों के लिए मरहम का काम कर रही है. मशहूर अफगानी पॉप सिंगर अरयाना सईद का बयान इसकी बानगी पेश करता है. अरयाना सईद ने कहा, ''पूरे अफगानिस्तान की ओर से मैं भारत के प्रति आभार व्यक्त करती हूं और शुक्रिया कहना चाहूंगी. इस मुसीबत की घड़ी में हमें यह पता लग गया है कि पड़ोसी देशों में सिर्फ भारत ही हमारा अच्छा दोस्त है. भारत हमेशा हमारे साथ अच्छा रहा.''


अमेरिका के अलावा यह देश भी अफगानियों को दे रहे पनाह
20 साल बाद अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला रहा अमेरिका भी इस मुश्किल घड़ी में अफगानियों के साथ दिखना चाहता है. व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के मुताबिक 14 अगस्त से अब तक 30 हजार से अधिक लोगों को काबुल से बाहर निकाला है. लेकिन इसमें कितने अफगानी नागरिक है, इसका आधिकारिक खुलासा अब तक यूएस ने नहीं किया है.


हालांकि राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इसके लिए 3 हजार 709 करोड़ रुपए का फंड भी जारी किया है. इसके अलावा ब्रिटेन और कनाडा 20-20 हजार, जर्मनी 10 हजार,  युगांडा 2 हजार अफगानियों को अपने देश में एंट्री देने के लिए तैयार हैं. 


ऑस्ट्रेलिया का भी मानवीय वीजा कार्यक्रम के तहत अफगानियों के लिए 3000 जगह सुनिश्चित करने का प्लान हैं. ईरान ने भी अफगानिस्तान की सीमा से लगे अपने तीन प्रांतों में शरणार्थियों के लिए आपातकालीन तंबू स्थापित किए हैं. लगभग 1,500 अफगानों ने अफगानिस्तान-उज्बेकिस्तान सीमा पार कर शिविर स्थापित करने की खबर है.


अफगानिस्तान से रोजाना डराने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं, दुनिया भर के नेता रणनीति बनाने के लिए मीटिंग कर रहे हैं. कूटनीति के जरिए इस समस्या के समाधान की कोशिशें हो रही हैं लेकिन आम अफगानी डरा हुआ है और किसी तरह जान बचाने के लिए दूसरे देश जाने को मजबूर है.


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