नई दिल्ली: हाल ही में अंटार्कटिका पैनेन्सुला से 5800 वर्ग किलोमीटर का हिमखण्ड टूट कर समुद्र में गिर गया है. इसका आकार दिल्ली के आकार से चार गुना बड़ा है. इस टूटे हिमखंड से भारत के पूर्वी तटों पर खतरा पैदा हो सकता है.


जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय में ग्लेशीयोलॉजी और पर्यावरण भू विज्ञान के प्रोफेसर ए.एल.रामनाथन अपनी टीम के साथ अंटार्कटिका के पर्यावरण पर शोध कर रहे हैं. प्रो. रामनाथन के मुताबिक, ‘’टूटे हुए हिमखण्ड के बारे में कोई स्पष्ट भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. इसके खराब नतीजे साल भर में भी आ सकते है और बाद में भी.’’


अंटार्कटिका में पर्यावरण पर शोध के लिए मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंसेज और दिल्ली के  जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का पर्यावरण संस्थान हर साल अपनी शोध टीम अंटार्कटिका भेजता है. इसी टीम का हिस्सा रह चुके और अंटार्कटिका से लौट कर आए नवीन कुमार और थुप्स्थन ने एबीपी न्यूज़ को बताया कि इतने बड़े हिमखंड के टूटने को वैज्ञानिक किस तरीके से देख रहे हैं.


टूटा हुआ हुआ हिमखण्ड कहां स्थित था ?


अंटार्कटिका जिस समुद्र से घिरा है उसे साउदर्न ओशन कहते हैं. अंटार्कटिका पैनेन्सुला के जिस इलाके सॆ हिमखण्ड अलग हुआ है उस इलाके को लार्सन ‘सी’  कहते हैं. जो हिस्सा अलग हुआ है वो लार्सन ‘सी’ का एक आइस शेल्फ़ था. (बर्फ के जिस हिस्से के नीचे समुद्र का पानी होता है उसे आइस सेल्फ़ कहते हैं. और जिस हिस्से के नीचे ज़मीन होती है उसे आईस शीट कहते हैं.) अब यह टूटा हुआ हिस्सा एक स्वतंत्र आइसबर्ग के रूप में मौजूद है.


क्यों टूटा हिमखंड ?


ग्लोबल वार्मिंग की वजह से साउदर्न ओशन का तापमान बढ़ रहा है, जिसकी वजह से लार्सन ‘सी’  के आइस शेल्फ़ के नीचे का पानी अपेक्षाकृत गर्म हो रहा था. इसकी वजह से वहां की बर्फ में लगातार कटाव हो रहा था. पैरेंट बॉडी के साथ इस आइस शेल्फ़ के भार का तालमेल बिगड़ने के कारण ये आइस सेल्फ़ टूट गया.


क्या होगा इसका प्रभाव ?


हिमखंड पहले पानी के ऊपर था इसलिए अपेक्षाकृत गर्म होते पानी के नाममात्र सम्पर्क में था. लेकिन अब जबकि वो टूट कर पानी में आ गिरा है उसका पिघलना अपेक्षाकृत तेज होगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाली मौसम सम्बन्धी परिस्थियों में ये हिमखंड तेजी से भी पिघल सकता है और बहुत धीरे-धीरे भी.


ऐसा भी हो सकता है कि साल भर में ही इसका प्रभाव दिखाई देने लगे और ये भी हो सकता है कि इसका कुछ हिस्सा तेजी से पिघले और बाकी के पिघलने में दशकों का समय लग जाए. अगर ये जल्द पिघलता है तो भारी तादात में इसका शुद्ध जल खारे पानी वाले साउदर्न ओशन का ईको सिस्टम बिगाड़ देगा, जिससे कई चीजों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा-


समुद्र का जल स्तर बढेगा. ऐसे में अन्य समुद्र तटीय देशों की तरह भारत के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर समुद्र का जल स्तर भी बढेगा. भारत के गुजरात, महाराष्ट्र और केरल जैसे पश्चिमी तट वाले इलाके समुद्र तट से ऊंचे हैं इसलिए इधर कम खतरा है. लेकिन ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे के पूर्वी तट वाले समुद्र से लगे इलाकों में भारी तबाही हो सकती है. बाढ़ और कटाव के कारण इन इलाकों में ज़मीन का काफी हिस्सा समुद्र के हिस्से जा सकता है. लेकिन सबसे ज्यादा खतरा लक्ष्यद्वीप में हो सकता है.


ऐसा ही खतरा बंगलादेश को भी है. उधर जापान और मलेशिया जैसे देशों को भी खतरा होगा. हिमखंड के पिघलने से अंटार्कटिका में समुद्र जल के पैरामीटर्स बदल जाएंगे. यानी समुद्री जल के मूलभूत गुणों में परिवर्तन आ जाएगा.




  • खारेपन का स्तर बदलेगा

  • तापमान बदलेगा

  • ऑक्सीजन स्तर बदल जाएगा

  • मिनरल और न्यूट्रिएन्टस् का स्तर बदल जाएगा

  • मिनरल न्यूत्रियन्त को सर्कुलेट करता है. थर्मल हलाइन सरकुलेशन टूट सकता है


ईकोलॉजिकल स्टेबिलिटी बिगड़ जाने से वहां की जैविक प्रजातियों के जीवन पर संकट आ जाएगा. वहां क्रील, पेंगुइन और वेह्ल जैसे जीवों के लिए ये परिवर्तन नुकसानदायक होगा. इससे कन्वेयर बेल्ट सिस्टम को खतरा हो सकता है.


क्या है कन्वेयर बेल्ट सिस्टम ?


समुद्र में ठंडे पानी और गर्म पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने और ले आने की एक प्राक्रतिक प्रक्रिया होती है, जिसे कन्वेयर बेल्ट सिस्टम कहा जाता है. ये कन्वेयर बेल्ट ही समुद्र की पारिस्थिकी (इकोलोजी) को संतुलित रखने में मुख्य भूमिका निभाती है. समुद्र में मिनरल और न्युटिएन्ट्स के वितरण से लेकर समुद्र के तापमान और घनत्व तक इसी कन्वेयर बेल्ट पर निर्भर करता है. ये कन्वेयर बेल्ट  दरअसल एक वाटर सरकुलेशन पैटर्न है जिसे ओशनिक करेंट के रूप में देखा और समझा जाता है.


दुनिया को सबसे बड़ा खतरा इसी प्राकृतिक कन्वेयर बेल्ट सिस्टम के टूट जाने से होगा. इस खतरे का अंदाजा लगा सकना वैज्ञानिकों के लिए भी असम्भव है. सामान्य खतरे से लेकर प्रलय तक के खतरे इस पारिस्थिकी के टूटने में देखे जाते हैं.


हिमखंड के टूटकर अलग होने की जानकारी नासा के एक्वा मोडिस सैटेलाइट से ज्ञात हुआ है. माना जा रहा है कि हिमखंड के टूटने की प्रक्रिया एक साल पहले शुरू हो गई थी. 25 से 31 मई के बीच ही इसमें 17 किमी लंबी दरार आ गई थी. 24 और 27 जून के बीच बर्फ तेजी से अलग होने लगी थी और इसकी दरार रोजाना 10 मीटर बढ़ रही थी.


5,800 वर्ग किलोमीटर के आकार का ये आइसबर्ग अब तक टूटकर अलग हुए सभी हिमखंडों में सबसे बड़ा है. इससे पहले सबसे बड़ा टूटने वाला हिमखंड बी15 था. 4200 वर्ग किलोमीटर आकार का बी15 साल 2000 में रॉस आइस शेल्फ से अलग हो गया था.