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ज्यादा बच्चे पैदा करवाना क्यों चाहते हैं स्टालिन, आबादी बढ़ा बचाएंगे सांसद?

साल 2002 में जब परिसीमन हुआ तो वो साल 2001 की जनगणना के आधार पर हुआ और तब सीटों की संख्या में कोई बदलाव न करके सीटों के क्षेत्र में ही बदलाव किया गया.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन चाहते हैं कि तमिल लोग शादी के तुरंत बाद ही बच्चे पैदा करें ताकि तमिलनाडु की आबादी को जल्दी से जल्दी बढ़ाया जा सके. पूरा देश चाहता है कि फैमिली प्लानिंग को और मजबूती के साथ लागू किया जाए ताकि आबादी पर जल्दी से जल्दी नियंत्रण हासिल किया जा सके. अब शादी कब करनी है, बच्चे कब पैदा करने हैं, कितने करने हैं ये एक परिवार का अधिकार होना चाहिए था, लेकिन इस देश की बदली हुई राजनीति ने बिल्कुल ही व्यक्तिगत चीजों को भी राजनीति का ऐसा हथियार बना दिया है, जिसमें पिसना सिर्फ आम आदमी को है.

तो आखिर ये पूरा मसला क्या है. आखिर क्यों तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन तुरंत ही बच्चे पैदा करवा के तमिलनाडु की आबादी बढ़ाना चाहते हैं, आखिर स्टालिन पूरे देश की नीति के खिलाफ जाकर अपनी राजनीति क्यों कर रहे हैं और आखिर स्टालिन के इस फैसले का दिल्ली की राजनीति से क्या लेना-देना है और आखिर वो कौन सा डर है, जिसने स्टालिन को इस बयान के लिए मजबूर किया है.

सियासत में थोड़ी भी दिलचस्पी रखने वाला इस बात को बखूबी जानता है कि इस देश में लोकसभा की कुल सीटों की संख्या है 543. हर राज्य की आबादी के हिसाब से इन सीटों का बंटवारा किया गया है. संविधान का आर्टिकल 82 और आर्टिकल 170 कहता है कि हर जनगणना के बाद बढ़ी हुई आबादी को प्रतिनिधित्व देने के लिहाज से एक परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा जो केंद्र में लोकसभा और राज्यों में विधानसभा की सीटों का पुनर्गठन करेगा.

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने संविधान में 42वां संशोधन करके साल 2001 तक के लिए परिसीमन को रोक दिया था. इसकी वजह ये थी कि दक्षिण भारत के राज्यों ने परिवार नियोजन को सख्ती से लागू किया और आबादी को नियंत्रित किया, जबकि उत्तर भारत में ऐसा नहीं हो पाया. तो जब परिसीमन होता तो उत्तर भारत में लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ जाती और दक्षिण भारत में घट जाती. ऐसे में इंदिरा गांधी ने संविधान में 42वां संशोधन करके परिसीमन की प्रक्रिया को ही साल 2001 तक के लिए रोक दिया.

साल 2002 में जब परिसीमन हुआ तो वो साल 2001 की जनगणना के आधार पर हुआ और तब सीटों की संख्या में कोई बदलाव न करके सीटों के क्षेत्र में ही बदलाव किया गया. उसी दौरान ये भी तय कर दिया गया कि साल 2026 तक कोई परिसीमन नहीं होगा. 2026 की डेडलाइन इसलिए रखी गई कि तब तक उत्तर और दक्षिण से लेकर पूरब और पश्चिम तक के राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर एक बराबर हो जाएगी और तब कोई राज्य इस बात की शिकायत नहीं कर पाएगा कि जनसंख्या नियंत्रण की वजह से उसके राज्य के साथ कोई भेदभाव हुआ है.

तो अब उस बात को 23 साल बीत गए हैं. संविधान में संशोधन की वजह से कोई परिसीमन नहीं हुआ है, जबकि साल 2011 के बाद साल 2021 में होने वाली जनगणना भी नहीं हो पाई है, क्योंकि जनगणना वाले साल में कोरोना का प्रभाव था. तो अब जनगणना भी होनी है और जनगणना के बाद परिसीमन भी होगा. जाहिर है कि आबादी तो बढ़ी ही है और इस लिहाज से लोकसभा की सीटें भी बढ़नी हैं, लेकिन जिन राज्यों की आबादी उस अनुपात में नहीं बढ़ी है, वहां सीटों की संख्या कम होने की भी आशंका है. इसी आशंका ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन की राजनीति को इस कदर प्रभावित किया है कि वो डरे हुए हैं.

अभी तमिलनाडु में लोकसभा की सीटों की संख्या 39 है. स्टालिन को लगता है कि अगर जनगणना होती है और उसके बाद परिसीमन होता है तो तमिलनाडु की लोकसभा सीटों की संख्या 39 से घटकर 31 हो जाएगी, जबकि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कर दिया है कि परिसीमन के बाद भी किसी राज्य की लोकसभा की सीटों की संख्या कम नहीं की जाएगी. 

 गृहमंत्री के इस बयान से भी स्टालिन को डर है. वो डर है तमिलनाडु का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कम होने का डर. ये एक तथ्य है कि दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर भारत के राज्यों की आबादी में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. अब जनगणना नहीं हुई है तो हम कोई आंकड़ा भी नहीं दे सकते कि जनसंख्या कितनी बढ़ी है, लेकिन इतना तो तय है कि जनगणना होने के बाद जब परिसीमन होगा तो उत्तर भारत के राज्यों में बढ़ी हुई आबादी के लिहाज से लोकसभा की सीटों की संख्या भी बढ़ानी पड़ेगी और तब तमिलनाडु के सांसदों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम हो जाएगी.

ऐसे में हो सकता है कि तमिलनाडु के सांसदों की संख्या अगर कम न हो तो भी वो 39 की 39 ही रह जाएगी या बहुत होगी तो बढ़कर 40 या 41 हो जाएगी. इससे ज्यादा तमिलनाडु के सांसदों की संख्या नहीं होगी. कर्नाटक में सीटों की संख्या बढ़कर 28 से 36 हो सकती है. तेलंगाना में 17 से बढ़कर 20 हो सकती है. आंध्रप्रदेश में 25 से 28 हो सकती है, जबकि केरल में जनसंख्या बढ़ोतरी की दर कम है तो वहां सीटों की संख्या घट सकती है, जो 20 से 19 हो सकती है, जबकि यूपी के सांसदों की संख्या 80 से बढ़कर 128 तक हो सकती है. वहीं बिहार  के सांसदों की  संख्या 40 से बढ़कर 70 तक पहुंच सकती है.

सबसे ज्यादा चिंता तो केरल को होनी चाहिए कि उसके सांसदों की संख्या घटने वाली है, लेकिन पिनराई विजयन इस मामले में चुप्पी साधे हैं, जबकि सबसे ज्यादा मुखर आवाज स्टालिन ही बने हैं. लिहाजा वो चाहते हैं कि जिसने भी शादी कर ली हो या कर रहा हो, वो शादी के तुरंत बाद बच्चे पैदा कर ले. ताकि जब जनगणना हो तो तमिलनाडु की आबादी बढ़ी हुई दिखे और बढ़ी आबादी के जरिए उनके राज्य को और ज्यादा सांसद मिल सकें ताकि दिल्ली में उत्तर-दक्षिण का बैलेंस बना रहे. बाकी तो नई संसद भी बढ़े हुए सांसदों के लिए तैयार ही है, क्योंकि नई संसद में लोकसभा की सीटों की संख्या 888 है, जबकि राज्यसभा में भी सीटों की संख्या बढ़ाकर 384 रखी गई है ताकि जब परिसीमन हो और सांसदों की संख्या बढ़े तो सत्र के दौरान सांसदों को बैठने के लिए जगह की कोई कमी न हो.

रही बात उत्तर बनाम दक्षिण की तो अनुमान तो यही है कि  दक्षिण भारत में अभी जो कुल लोकसभा सीटों की संख्या 129 की है, जिसमें आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना हैं, परिसीमन के बाद उनकी कुल संख्या 184 तक हो सकती है, जो पुराने से 55 ज्यादा है. वहीं उत्तर में अभी जो लोकसभा सीटों की कुल संख्या 216 की है और जिसमें उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और दिल्ली शामिल हैं, परिसीमन के बाद उनकी कुल संख्या 398 तक हो सकती है जो पुराने से 182 ज्यादा है. तो शायद अब आपको स्टालिन का डर और जल्दी बच्चे पैदा करने वाले बयान की पूरी तस्वीर साफ हो गई होगी. बाकी तमिलनाडु के उत्तर भारत से विरोध की और भी दो बड़ी कहानियां हैं. एक कहानी भाषा की है और दूसरी धर्म की.

 

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