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ताबूत: ये मरना भी कोई मरना है यारों

अमेरिकी क़ानून पर बात करते हुए उसने कहा, “क़ानून कड़े हैं लेकिन अमेरिकी डाकू उससे भी कड़े हैं.” मैंने पूछा, “उधर कभी लुटने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ.” बोला, “मुझे किसी ने नहीं लूटा, बल्कि उनके हाथों लाभ हुआ.

ये मरना भी कोई मरना है यारों – मरें तो जैसे अमरीका में, एक चमचमाते ताबूत में

ताबूत

अली अकबर नातिक

Taboot

मुझे देखते ही आफ़ताब बोला, “यार अली दो मिनट पहले आ जाता तो क्या अच्छा था. इस कमीने ने आज मुझे तीसरी बार मात दी. ये इतना बड़ा सुअर है”...अगला वाक्य डॉक्टर ने उचक लिया, “कि एक कुत्ते से क़ाबू में नहीं आ सकता.”

इसमें कोई शक नहीं कि डॉक्टर मुनव्वर बेग हम दोनों के मुक़ाबले बड़ा शातिर था. फिर भी मैं और आफ़ताब मिलकर उसपर हावी हो जाते थे. मुनव्वर बेग का क्लीनिक गांव के उस चौक पर था जिसके एक ओर जामा मस्जिद थी और सामने पक्की साफ़-सुथरी सड़क गुज़रती थी जिसपर ट्रैफ़िक बिल्कुल न था, लेकिन सारा दिन एक्का दुक्का लोग ज़रूर गुज़रते रहते. सड़क की दूसरी ओर पार्क था जिसमें खजूर के छह-सात ऊंचे पेड़ थे जो देखने वालों के भले लगते थे.

सड़क और पार्क दोनों वीरान थे. शायद गांव वालों का ऐसी चीज़ों पर ध्यान नहीं रहता. मेरा और आफ़ताब के दिन का बड़ा भाग क्लीनिक पर ही गुज़रता. डॉक्टर अच्छा शातिर होने के साथ-साथ हाज़िर जवाब और हंसी-मज़ाक़ करने वाला व्यक्ति था. उससे बात करके आसानी से निकल जाना मुश्किल था. हरफ़न-मौला ऐसा कि घर का चूल्हा बनाने से लेकर मरीज़ों की दवाइयां भी ख़ुद ही बना लेता.

आफ़ताब के पास अमेरिका का ग्रीन कार्ड था. गर्मियों में चला जाता, छह-सात महीने मज़दूरी करता और नवंबर चढ़े लौट आता. गत बीस वर्ष से उसका यही मामूल था. कैंसर का मरीज़ था इसलिए डॉक्टरों ने उसे सिगरेट मना कर रखा था. घर से बाहर आता तो पत्नी छोटा बेटा साथ कर देती कि अब्बा का ख़्याल रखे और सिगरेट पीने पर उसे बताए. उधर उसने बच्चे को रिश्वत पर अपनी ओर कर लिया कि हर सिगरेट के पांच रुपए ले ले लेकिन अम्मी को न बताए.

हम आफ़ताब से हमेशा अमेरिकी समाज के बारे में बातें करते, जिसपर वह मज़े ले-ले कर सुनाता कि एक बार किसी से प्रेम किया तो यह हुआ और दूसरे से प्रेम हुआ तो यह बीती. हमें बताता कि अमेरिकियों का दिल इतना खुला है कि एक लड़का जो मेरे साथ काम करता था उसे मैंने कहा कि तुम्हारी बहिन क्या ग़ज़ब की सुंदर है. बोला आपकी उससे बात कराऊं? मैंने कहा नेकी और पूछ पूछ कर, भलाई करने में देर कैसी? भाई जल्दी करो. लेकिन पता चला कि पहले ही उसका एक ब्यॉय फ़्रेंड है. जिसका हम दोनों को बहुत अफ़सोस हुआ.

अमेरिकी क़ानून पर बात करते हुए उसने कहा, “क़ानून कड़े हैं लेकिन अमेरिकी डाकू उससे भी कड़े हैं.” मैंने पूछा, “उधर कभी लुटने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ.” बोला, “मुझे किसी ने नहीं लूटा, बल्कि उनके हाथों लाभ हुआ. क़िस्सा यह है कि मैं एक पेट्रोल पंप पर नौकरी करता था. मेरे पास पेट्रोल के लगभग चार हज़ार डॉलर जमा हो गए थे कि इतने में डाकू आ गए. उन्होंने सारे लोगों को लूट लिया, भाग्य से मैं पैसे समेत टॉयलेट में घुस गया था. डाकू चले गए तो बाहर निकल आया और लुटने वाले लोगों में खड़ा हो गया. भाग-दौड़ में किसी को पता नहीं चला. इस तरह मैं उस पैसे का मालिक बन गया. उस दिन ख़ुदा की क़सम मुझे पाकिस्तानी होने पर गर्व हुआ.”

एक दिन हम रोज़ की तरह शतरंज और चाय में व्यस्त थे कि एक महिला रोगी को उसके परिवार वाले तांगे पर लाद कर ले आए. महिला बेहोश थी और परिवार वाले घबराए हुए थे. डॉक्टर ने शतरंज जल्दी से मेज़ के नीचे छुपा दिया और महिला को देखने लगा. मैं और आफ़ताब उठ कर बाहर आ गए और पार्क में आकर खजूरों के नीचे खड़े हो गए. हम आपस में बातें करने लगे कि रोगी महिला ने काम ख़राब कर दिया वरना इस गेम में डॉक्टर फंस गया था.

डॉक्टर मुनव्वर बेग कुछ देर मरीज़ को देखता रहा लेकिन उसकी समझ में शायद कुछ नहीं आ रहा था. आख़िर परेशान हो कर उसने महिला के परिजनों को जवाब दे दिया. उनसे कहा कि महिला को दिल का दौरा पड़ा है उसे जल्दी से शहर ले जाओ. डॉक्टर के जवाब देने पर परिवार वाले घबरा गए. वह इस असमंजस में थे कि क्या किया जाए. महिला को दोबारा तांगे पर रखा गया, तांगा चलने ही वाला था कि आफ़ताब ने दौड़ कर महिला की नब्ज़ (नाड़ी) पकड़ ली, फिर डॉक्टर को इशारा किया, डॉक्टर ने पास आकर महिला को दोबारा देखा और सिर झुका लिया. इस स्थिति में मैं दूर ही खड़ा रहा. शायद यह मेरी मानसिक कमज़ोरी है कि मैं किसी की तकलीफ़ को क़रीब से नहीं देख सकता.

ख़ैर डॉक्टर और आफ़ताब को परेशान देख कर परिजन समझ गए और दहाड़ें मार कर रोने लगे. बात यह थी कि महिला मर चुकी थी. कुछ रास्ता चलते भी खड़े हो गए और सांत्वना देने लगे. बहरहाल पांच छह मिनट में तांगा चला गया और दस मिनट में लोग भी बिखर गए, यहां तक कि सिर्फ़ हम तीनों रह गए और गंभीर हो गए.

कुछ देर बाद डॉक्टर ने मुझे देखा और कहा, “क्यों अली साहब, बंदा किस सफ़ाई से मरता है?” मैं चुप रहा मगर आफ़ताब ने सामने सड़क के उस पार पार्क में बारिश के पानी में तैरती बतख़ों को देखते हुए कहा, “कम से कम मुझे इस प्रकार मरना पसंद नहीं. यह क्या कि मरीज़ को पता भी न चले और वह मर जाए, वह भी सड़क के बीचो-बीच. अमरीका में इंसान और जानवर दोनों अस्पतालों में मरते हैं और इस सफ़ाई और आराम से कि तकलीफ़ का एहसास नहीं रहता. यूं तांगों में ज़लील नहीं होते.”

इस बात पर मुनव्वर बेग ने ठंडी सांस खींची और मैंने सिर हिला दिया.

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(अली अकबर नातिक की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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