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Gangaur Festival: खंडवा में खास अंदाज में मनाया जाता है गणगौर, भंडारे में लगाई जाती है जूठी पत्तल उठाने के लिए बोली!
खंडवा में गणगौर पर एक आयोजन ऐसा होता है जहां जूठी पत्तल उठाने के लिए बोली लगाई जाती है. इसके अनुसार जो व्यक्ति सबसे ज्यादा रुपए की बोली लगाता है उसी का परिवार शुरू से अंत तक जूठी पत्तलें उठाता है.

धनियर राजा और रणु बाई का विवाह समारोह
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इन दिनों निमाड़ और मालवा का प्रसिद्ध गणगौर पर्व चल रहा है. गणगौर पर्व पर धनियर राजा और रणु बाई की पूजा की जाती है. रणु और धनियर राजा को शिव और पार्वती का रूप माना जाता है. यह आयोजन किसी विवाह समारोह की तरह ही सम्पन्न होता है. जिसमें मेहंदी की रस्म के साथ साथ झालरिया गीत गाए जाते हैं. रणु बाई को बेटी की तरह मानकर यहां खूब मान मनुहार की जाती है. नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व होली के बाद से ही शुरू हो जाता है.
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गणगौर पर्व निमाड़ क्षेत्र में लगभग सभी लोग मिलकर मनाते हैं. खासकर गुरुवा और कहार समाज के लोग इस आयोजन में होने वाले भंडारे के बाद जूठी पत्तल उठाने के लिए बोली लगाते हैं. उनका मानना है कि यह एक पुण्य का कार्य है. समाज के सोमनाथ काले ने बताया की जूठी पत्तल उठाने की परम्परा लगभग 80 वर्ष पुरानी है जिसे उनके बुजुर्गों ने शुरू किया था.
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जूठी पत्तल उठाने की यह परम्परा समाज में सामाजिक समरसता लाती है. इससे समाज का एक धनि व्यक्ति भी जूठी पत्तल उठाने की बोली लगाकर समाज के गरीब व्यक्ति की जूठी पत्तल भी सहर्ष उठाता है. अब हर पंगत पर बोली लगती है. इस बार से आने वाले वर्ष के लिए होने वाले माता के भंडारे के लिए अनाज और अन्य वस्तुओं के लिए भी बोली लगाई गई है.
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बोली की राशि का उपयोग आगामी वर्ष में होने वाले भंडारे में किया जाता है. उन्होंने कहा कि ऐसी मान्यता है कि माताजी के पूजा में जो लोग भोजन करने आते हैं उनकी जूठी पत्तलें उठाने पर उन्हें माता का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है. इस पर्व में होली की राख और गेंहू मिलकर माता की मूठ यानि घट स्थापना की जाती है. इसके बाद बांस की टोकरी में मिटटी डालकर गेंहू बोए जाते हैं. इस कार्य को बाड़ी कहते हैं जिसे आठ दिनों तक सींचा जाता है.
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आठवें दिन दर्शन के लिए इस स्थान को खोला जाता है. जिसके बाद लोग इन्हे लेकर अपने घर जाते हैं और नैवैद्ध लगाने और भंडारा करने के बाद माता को पानी पिलाने और झालरिये देने बाग-बगीचे में ले जाया जाता है. इस तरह से पुरे गणगौर पर्व को मनाया जाता है. मानो जैसे किसी के घर में शादी का उत्साह चल रहा हो.
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इस वर्ष गुरुवा और कहार समाज ने गणगौर माता को बंगाली संस्कृति के रंग में रंगा है. जिस तरह से एक बंगाली दूल्हा और दुल्हन वेशभूषा धारण करते हैं वैसी ही वेश भूषा गणगौर माता को पहनाई जाती है. गणगौर माता विराजने वाली एक महिला साधना सोमनाथ ने बताया कि हम प्रतिवर्ष भारतीय संस्कृति के अनुसार अलग-अलग जगहों की वेशभूषा में माता का शृंगार करते हैं. इस बार हमने बंगाली वेशभूषा में माता का शृंगार किया है.
Published at : 27 Mar 2023 11:28 AM (IST)
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