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बिहार: किसी बड़े दलित चेहरे को साथ रखना चाहती हैं पार्टियां, जानें राज्य के किन नेताओं की बढ़ी अहमियत

बिहार विधान सभा चुनाव से पहले हर गठबंधन एक बड़े दलित चेहरे को साथ लाकर खुद को दलितों का हितैशी दिखाने की कोशिश कर रहा है.

पटना: बिहार में दलित नेताओं को अपने पाले में लाने के लिए ज़बरदस्त राजनीति शुरू हो गई है. बिहार विधान सभा चुनाव से पहले हर गठबंधन एक बड़े दलित चेहरे को साथ लाकर खुद को दलितों का हितैषी दिखाने की कोशिश कर रहा है.

सबसे पहले बात उन दलित चेहरों की जो हमेशा चर्चा में रहते हैं. हम पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी शुरुआती दौर में कांग्रेस में रहे पर बाद में लालू यादव के साथ आ गए. इसके बाद मांझी नीतीश के साथ आ गए.

नीतीश ने 2005 के अपने पहले मंत्रीमंडल में उन्हें मंत्री बनाया लेकिन जैसे ही मांझी के ऊपर एक भ्रष्टाचार के मामले का पता चला तो मुख्यमंत्री ने उनसे इस्तीफा ले लिया. मांझी जब लालू की सरकार में मंत्री थे तभी शिक्षा में हुए घोटाले में इनका नाम आया था तब उस मामले में वह बरी हो गए थे और फिर उन्हें मंत्री बनाया गया था.

नीतीश कुमार ने 2014 में लोकसभा में मिली करारी शिकस्त के बाद इस्तीफा देकर मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया था. हालांकि बाद में उनके नीतीश से रिश्ते बिगड़ते गए और रास्ते भी अलग हो गए.

दूसरा नाम पूर्व विधान सभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी का है. उदय नारायण चौधरी भी पहले लालू के साथ रहे और जब नीतीश के साथ आए तो उन्हें नीतीश कुमार ने लगातार दस साल तक विधानसभा का स्पीकर बनाए रखा. 2015 में उदय नारायण चौधरी जीतन राम मांझी से चुनाव हार गए. चौधरी नीतीश कैबिनेट में मंत्री बनना चाहते थे लेकिन नीतीश ने उन्हें मंत्रीपद नहीं दिया और फिर इनके भी रास्ते अलग हो गए.

तीसरा नाम श्याम रजक का है. श्याम रजक लालू राबड़ी के नव रत्नों में शामिल थे. सांसद रामकृपाल यादव के साथ इनकी जोड़ी थी जिसे राम-श्याम की जोड़ी कहते थे पर यह जोड़ी टूट गई थी और लालू को छोड़ श्याम रजक 2009 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ आ गए. तब से लगातार साथ रहे लेकिन कहा जा रहा है कि लालू के कहने पर नीतीश कुमार ने श्याम रजक को 2015 में महगागठबंध की सरकार में मंत्री नहीं बनाया. इस बात से कई दिनों तक श्याम रजक काफी दुखी रहे.

2019 में श्याम रजक को लोकसभा चुनाव के बाद मंत्री बनाया गया लेकिन पार्टी में पूछ और एक अधिकारी की नियुक्ति को लेकर श्याम रजक नाराज़ हो गए और फिर उन्होंने इस्तीफा सौंप दिया.

चौथे दलित नेता हैं चिराग पासवान. पिता रामविलास पासवान से विरासत में पाई राजनीति को मजबूत करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं. लोकसभा चुनाव के बाद से ही चिराग औऱ नीतीश के बीच बातचीत बंद है.

चिराग ने नीतीश से बात करने की पहले काफी कोशिश की लेकिन जब सफलता नहीं मिली तब से चिराग ने नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. पार्टी की पूरी कमान चिराग के हाथ है. वह जमुई से दूसरी बार सांसद चुने गए हैं.युवा हैं आगे की लड़ाई लड़ने के लिए कमर कस रहे हैं.

चिराग बीजेपी के साथ दिख रहे और इस चुनाव में वह 43 सीटों की मांग कर रहे हैं. चिराग एनडीए में हैं पर लगातार मुख्यमंत्री पर निशाना साध रहे हैं. ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि आखिर चिराग करेंगे क्या? चिराग को उम्मीद है कि बीजेपी उनके लिए कोई न कोई सम्मानजनक रास्ता निकाल लेगी और वह एनडीए में ही रहेंगे.

पांचवे दलित नेता हैं मुकेश सहनी. मछुआरों को अपने साथ रखने का दावा करने वाले मुकेश सहनी ने पहली बार लोकसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई पर सफलता हाथ नहीं लगी. फिलहाल महागठबंधन में तेजस्वी के साथ रहने का दावा कर रहे हैं लेकिन बीच-बीच में मांझी के साथ कई बैठक कर अपनी शर्त मनवाने में लगे रहते हैं.

महागठबंधन के नेता भी चाहते हैं कि चिराग उनके पाले में आ जाएं पर चिराग इसमें दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. वहीं मांझी बीस अगस्त के बाद फैसला लेने की बात कह रहे हैं.

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