Bastar Dussehra 2023: बस्तर दशहरे में होती है बेल पूजा, विवाह उत्सव से संबंधित है रस्म, जानें- क्या है इसकी मान्यता
Bastar Dussehra Festival: बस्तर दशहरे में सप्तमी के दिन एक और महत्वपूर्ण रस्म अदा की गई. इस रस्म को बेल पूजा विधान कहते हैं. इसमें राजकुमार द्वारा दो फलों की पूजा की जाती है.
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Bastar Dussehra: बस्तर (Bastar) में 75 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे ( Dussehra) के पर्व में शनिवार शाम को एक और महत्वपूर्ण रस्म अदा की गई. इस रस्म को बेल जात्रा या बेल पूजा कहा जाता है. इस रस्म में बेल के पेड़ और उसमें एक साथ लगने वाले दो बेल फलों की पूजा की जाती है. ऐसी इकलौती बेल पूजा रस्म को बस्तर के लोग अनोखे और दुर्लभ तरीके से मनाते हैं. दरअसल, जगदलपुर (Jagdalpur) शहर से करीब पांच किलोमीटर की दूरी पर सरगीपाल गांव में सालों पुराना बेल का पेड़ है, जिसमें एक फल के अलावा दो फल भी एक साथ लगते हैं.
बस्तर रियासत के राजकुमार कमलचंद भंजदेव इसी बेल वृक्ष और जोड़ी बेल फलों की परंपरा अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं, जिसे बेल पूजा प्रथा कहते हैं. दरअसल, दशहरा पर्व में 12 से अधिक अतभूद रस्मों अदा की जाती है, जो केवल बस्तर में ही देखने को मिलती है. नवरात्रि के सप्तमी के रोज यानी शुक्रवार को दशहरा पर्व की एक और महत्वपूर्ण रस्म की अदा की गई. इसे बेल पूजा रस्म कहा जाता है. शहर से लगे सर्गीपाल गांव के एक खेत में एक ही जगह दो बेल के पेड़ हैं, लेकिन इन दोनों पेड़ों पर केवल एक ही फल लगता है. ऐसा यहां के ग्रामीण बताते हैं.
रस्म विवाह उत्सव से संबंधित
आमतौर पर बस्तर दशहरा पर्व के प्रमुख विधानों की जानकारी आम लोगों तक पहुंचती रही है, लेकिन बेल पूजा विधान की वास्तविकता के बारे में पता लगाने पर एक रोचक कहानी सामने आई है. बस्तर राजपरिवार के राजकुमार कमलचंद भंजदेव ने बताया कि यह रस्म विवाह उत्सव से संबंधित है. उन्होंने बताया कि बस्तर के चालुक्य वंश के राजा सर्गीपाल गांव के पास के जंगलो में शिकार करने गए थे. वहां इस बेल पेड़ के नीचे खड़ी दो सुंदर कन्याओं को देख राजा ने उनसे विवाह की इच्छा प्रकट की, जिस पर कन्याओं ने उनसे बारात लेकर आने को कहा.
ये है रस्म के पीछे की कहानी
कमलचंद भंजदेव ने बताया कि अगले दिन जब राजा बारात लेकर वहां पहुंचे तो दोनों कन्याओं ने उन्हें बताया कि वो उनकी इष्ट देवी माणीकेश्वरी और दंतेश्वरी हैं. उन्होंने हंसी ठिठोली में राजा को बारात लाने को कह दिया था. इस वाकये से शर्मिंदा राजा ने दंडवत होकर अज्ञानता वश किए गए अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगते हुए उन्हें दशहरा पर्व में शामिल होने का न्योता दिया और तब से यह विधान संपन्न किया जा रहा है. सैकड़ों साल पुरानी इस परंपरा को आज भी निभाया जा रहा है. राजकुमार ने बताया कि दो जोड़ी बेल फल को दोनों देवियों का प्रतीक माना जाता है.
बेल पूजा के दौरान रहता है उत्सव का माहौल
उन्होंने बताया कि इतना ही नहीं हर साल बेल न्योते में राजा खुद इस गांव में आकर जोड़ी बेल फलों को सम्मान पूर्वक पुजारी से ग्रहण करते हैं और उसे जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी के मंदिर में पूजा अर्चना के साथ रखा जाता है. बता दें बेल पूजा विधान के दौरान सर्गीपाल गांव में उत्सव जैसा माहौल रहता है. राजा का स्वागत और बेटी की विदाई दोनों का अभूतपूर्व नजारा यहां देखने को मिलता है. शनिवार को इस रस्म को धूमधाम से मनाया गया. इस दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के साथ दशहरा पर्व के समिति के सदस्य और राज परिवार के लोग भी मौजूद रहे.
वहीं बस्तर दशहरा पर्व के जानकार संजीव पचोरी बताते हैं की रियासत काल से बस्तर दशहरा मनाया जा रहा है. माई दंतेश्वरी यहां की आराध्य देवी हैं और उनमें लोगों की काफी गहरी आस्था जुड़ी हुई है. बस्तर दशहरा के दौरान जितनी भी रस्म निभाई जाती है वह केवल बस्तर में ही देखने को मिलती है. यही वजह रहती है कि 75 दिनों तक चलने वाले इस बस्तर दशहरे को देखने केवल छत्तीसगढ़ से ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्य तेलंगाना, उड़ीसा और अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं.
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