Holi 2023 In Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के बस्तर (Bastar) जिले में मौजूद दरभा की झीरमघाटी (Jhiram Ghati) को हमेशा से ही घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र के नाम से जाना जाता है. देश के सबसे बड़ी नक्सली घटनाओं में से एक 25 मई 2013 को इसी झीरम घाटी में नक्सलियों ने एक बड़ा हमला कर कांग्रेस नेताओं की हत्या कर दी थी, लेकिन अब जब यह इलाका धीरे-धीरे नक्सल मुक्त हो रहा है.


अब यहां की ग्रामीण महिलाओं को भी जिला प्रशासन की ओर से रोजगार मिल रहा है. इसी झीरम घाटी इलाके में नक्सल पीड़ित महिलाएं पपीते की खेती करने के साथ-साथ अब होली त्यौहार  को देखते हुए पलाश के फूल से प्राकृतिक गुलाल तैयार कर रही हैं. इस गेंदा फूल महिला स्व सहायता समूह में करीब 15 महिलाएं हैं. इनमें कुछ नक्सल पीड़ित महिलाएं भी शामिल हैं.


ग्रामीण महिलाएं बना रहीं गुलाल


इन महिलाओं के द्वारा पलाश के फूल से गुलाल तैयार किया जा रहा है. साथ ही इस गुलाल को जगदलपुर शहर के बाजारों और शासन के सी मार्ट में बेचा जा रहा है. शासन की ओर से रोजगार मिलने से क्षेत्र की ग्रामीण खासकर नक्सल पीड़ित महिलाएं काफी खुश नजर आ रही हैं. दरभा के इस गेंदा फूल स्व सहायता समूह की सदस्य सावित्री मंडावी ने बताया कि उनके समूह में 15 से अधिक महिलाएं हैं. जो पलाश के फूल से हर्बल गुलाल तैयार कर रही हैं. इन महिलाओं में कुछ ऐसी महिलाएं हैं. जिन्होंने  दरभा में अलग अलग जगहों पर हुए नक्सली हिंसा में अपने को खो दिया है.  जिला प्रशासन ने ऐसे लोगों को इकट्ठा कर रोजगार देने का काम किया है. सावित्री मंडावी ने बताया कि जिला प्रशासन की ओर से 1 क्विंटल गुलाल बनाने का ऑर्डर दिया गया है. अब तक 70 किलो से ज्यादा गुलाल तैयार कर इसकी पैकेजिंग की जा चुकी है. 


हो रही 10 से 12 हजार की कमाई


वहीं इस समूह के साथ काम करने वाली महिलाओं ने बताया कि दरभा और झीरम घाटी  इलाके में बहुत ज्यादा संख्या में पलाश के पेड़ मौजूद हैं. ऐसे में उन्होंने होली के दो सप्ताह पहले पलाश फूल को इकट्ठा करना शुरू कर दिया और इससे प्राकृतिक  गुलाल तैयार कर रहे हैं. एक तरफ जहां होली के बाजारो में केमिकल गुलाल बेचा जा रहा है. वहीं  उनका यह गुलाल पूरी तरह से प्राकृतिक गुलाल है. जिससे चेहरे और शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचता हैं. उन्होंने बताया कि  पलाश के फूल से तैयार गुलाल को कलर देने के लिए बकायदा प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया गया है. इसमें लाल रंग देने के लिए लाल भाजी, पीला रंग देने के लिए हल्दी और हरा रंग देने के लिए मेथी भाजी का इस्तेमाल किया गया है. वहीं गुलाल तैयार कर इन महिलाओं को 10 से 12 हजार रुपये की कमाई  हो रही है.


हर्बल गुलालों की बढ़ी है डिमांड


वहीं जिला पंचायत सीईओ प्रकाश सर्वे का कहना है कि इन महिलाओं के द्वारा तैयार किए गए प्राकृतिक गुलाल को शहर के  होली बाजारों और खासकर सी मार्ट में बेचा जा रहा है. प्राकृतिक गुलाल होने की वजह से इसकी डिमांड भी बढ़ी है और बकायदा लोग इसे खरीद रहे हैं. 


उन्होंने बताया कि आने वाले समय में बस्तर में ज्यादा मात्रा में प्राकृतिक गुलाल तैयार किया जाएगा. ताकि बस्तर के साथ-साथ पड़ोसी राज्य उड़ीसा में भी इसकी बिक्री की जा सके.  फिलहाल मार्केट में नक्सल पीड़ित महिलाओं द्वारा तैयार की जाने वाली प्राकृतिक गुलाल की काफी डिमांड है.


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