झारखंड के दुमका में एक गांव है, जहां पूरी बस्ती डोगरा कला जैसी अनोखी कला के जरिए बेशकीमती सामान को अपनी रोज़ी रोटी का जरिया बनाया. इनके द्वारा बनाए गए बेशकीमती सामान पश्चिम बंगाल और झारखंड सहित देश-विदेशों में जाते थे. लेकिन पिछले कई सालों से सरकारी उदासीनता की वजह से इन कलाकारों को अपनी पहचान नहीं मिल पा रही है. ये कलाकार अपनी पहचान खोते जा रहे हैं.


झारखंड की उपराजधानी दुमका से करीब 30 किमी दूर शिकारीपाड़ा प्रखंड अंतर्गत जबर्दहा गांव है. इस गांव के लोग डोगराकला को अपनी रोज़ी-रोटी का हिस्सा मान चुके हैं. बेशकीमती सामानों को तैयार कर दलालों के जरीये पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में बेच अपने और अपने परिवार का पेट भरने का काम करते थे. इन कलाकारों ने अपने बाप-दादाओं की तरफ से मिले गुर को अपना कर रोज़ी-रोटी का जरिया बनाया. अपनी कड़ी मेहनत के जरिये पीतल और कांसे को तराश कर एक से बढ़कर एक सामानों का निर्माण किया. इस कलाकारी में महिलाएं भी कम नहीं हैं. घर की महिलाएं भी इस कार्य में मदद कर अपनी मेहनत और लगन से कान की बाली, बाला, एक से बढ़कर एक मूर्ति, कछुआ और मछली आदि बनाती हैं.


यह कलाकृति सिर्फ एक घर में ही नहीं बल्कि पूरा गांव में देखी जा सकती थी और पूरा गांव इसी पर आश्रित था. लेकिन कोरोना काल और सरकार की उदासीनता की वजह से इन कलाकारों की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर हो गयी. ये अब कुछ ही घर शेष रह गए हैं जिन्हें सरकार की मदद की जरूरत है. अगर इन कलाकारों को समय रहते सरकार से मदद नहीं मिली तो शेष बचे कलाकार इसे छोड़ देंगे. मिट्टी और फूस के घर में रहने वाले ये कलाकार आर्थिक तंगी से गुजर रहें हैं. इन्हें अबतक कोई सरकारी मदद नहीं मिल पाई है. बाजार नहीं रहने की वजह से इन सामग्रियों को जैसे-तैसे औने-पौने दामों पर बेच कर गुजर करने के लिए बाध्य हैं. महाजनों और दलालों के चक्कर में फंसे हुए हैं.


इधर उद्योग विभाग ने भी माना कि कलाकारों के लिए वर्तमान में कोई योजना सरकार की ओर से संचालित नहीं है. करीब पांच साल पहले सरकार की तरफ से शिल्पकारों के लिए योजना चलाई जा रही थी लेकिन यह योजना बंद हो चुकी है. हालांकि विभाग के महाप्रबंधक ने कहा कि इन कलाकारों द्वारा उठाई गई समस्याओं को लेकर संबंधित विभाग से  पहल करेंगे. बीडीओ शिकारीपाड़ा ने भी आर्थिक मदद करने का भरोसा जताया है.


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