Maharashtra Political Crisis: महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट के बीच महाविकास अघाड़ी की सरकार जाने के आसार दिख रहे हैं. इतना ही नहीं शिवेसना नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत (Sanjay Raut) ने विधानसभा भंग करने तक के संकेत दे दिए हैं. उन्होंने इस बाबत ट्वीट किया. संजय राउत ने कहा "महाराष्ट्र विधानसभा भंग होने की दिशा में जा रही है." संजय राउत के इस ट्वीट के बाद महाराष्ट्र में राजनीतिक हलचल और तेज हो गई है हालांकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं. उसने कहा है कि वह अभी स्थिति का आंकलन करेगी. इन सब राजनीतिक उतार, चढ़ाव और दावों के बीच आइए हम आपको बताते हैं विधानसभा चुनाव भंग होने की दशा में क्या क्या हो सकता है


1. विधानसभा भंग होने का क्या मतलब है?
विधानसभा भंग होने का मतलब है कि राज्य में नए सिरे से चुनाव होंगे. इसे मध्यावधि चुनाव भी कहा जाता है. संविधान के अनुच्छेद 174 (2) (बी) के तहत राज्यपाल विधानसभा को भंग कर सकते हैं हालांकि इसके लिए उन्हें मुख्यमंत्री के सलाह की जरूरत होगी. विधानसभा भंग होने की स्थिति में मध्यावधि चुनाव ही रास्ता बचता है.   


2. क्या विधानसभा भंग करने के सीएम के अनुरोध को राज्यपाल ठुकरा सकते हैं?
अगर मुख्यमंत्री, राज्यपाल को विधानसभा भंग करने की सिफारिश की चिट्ठी दें तो राज्यपाल उसे ठुकरा भी सकते हैं. राज्यपाल मौजूदा स्थिति को देखते हुए फैसला लेंगे. अगर विपक्षी बहुमत का दावा करेंगे तो राज्यपाल उन्हें फ्लोर टेस्ट के लिए आमंत्रित कर सकते हैं.


3. अभी खेल खत्म नहीं हुआ है?
महाराष्ट्र के संदर्भ में बात करें तो अभी खेल खत्म होता हुआ नहीं दिख रहा है. नंबर गेम की बात करें तो शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस का गठबंधन इस मामले में कमजोर पड़ रहा है और विपक्षी बीजेपी और उसके साथ शिवसेना के बागी नेता बाजी मार सकते हैं.


287 विधायकों वाले सदन में बीजेपी के 106, शिवसेना के 55, एनसीपी के 53, कांग्रेस के 44 और अन्य 29 विधायक हैं. विधानसभा में फ्लोर टेस्ट की स्थिति में विश्वास मत हासिल करने के लिए 144 विधायकों की जरूरत है. गठबंधन सरकार की बात करें तो यहां फिलहाल सरकार के साथ कुल 152 विधायक हैं. इसमें 53 विधायक एनसीपी, शिवसेना के 55 और कांग्रेस के 44 विधायक हैं. हालांकि अगर कथित 42 बागी विधायकों को 152 विधायकों में से हटा दें तब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार को बहुमत साबित करने के लिए 34 विधायक कम पड़ेंगे.


वहीं बीजेपी के पास फिलहाल 106 विधायक हैं. बहुमत साबित करने के लिए उन्हें 38 और विधायकों की जरूरत है.  इसमें अगर शिवसेना के कथित बागी 42 विधायकों की संख्या जोड़ दें तो बीजेपी की कुल संख्या 148 तक पहुंच जाएगी. इसके अलावा 13 निर्दलीयों को जोड़ दें तो बीजेपी का आंकड़ा 161 तक पहुंच जाएगा जो बहुमत से 17 विधायक ज्यादा है. ऐसे में अगर विपक्षी दल राज्यपाल के समक्ष जाकर बहुमत का दावा करें तो विधानसभा भंग करने से पहले वह फ्लोर टेस्ट का मौका दे सकते हैं.


4. अगर चुनाव हुए तो 6 महीने के अंदर कराने होंगे
भारत निर्वाचन आयोग के मुताबिक अगर विधानसभा अपने कार्यकाल से 6 महीने पहले भंग होती है तो मध्यावधि चुनाव नहीं कराए जाते. आयोग के पास किसी राज्य की विधानसभा में चुनाव कराने के लिए एक निश्चित समय होता है, हालांकि विषम परिस्थितियों में संवैधानिक अधिकार के तहत आयोग तय समय के बाद भी चुनाव करा सकता है. महाराष्ट्र के संदर्भ में बात करें तो अभी यहां विधानसभा का कार्यकाल 2 साल बचे हुए हैं. ऐसे में निर्वाचन आयोग के लिए चुनाव कराना अनिवार्य हो जाएगा. संविधान के अंतर्गत निर्वाचन की प्रक्रिया को देखें तो हम पाएंगे कि यदि कोई विधानसभा, सामान्य परिस्थितियों के तहत भंग होती है तो 6 महीने के भीतर चुनाव कराना होता है और फिर विधानसभा की बैठक आहूत की जाती है.


5. अब गेंद राज्यपाल के पाले में है?
महाराष्ट्र में मौजूदा राजनीतिक संकट में अभी तक राज्यपाल के पाले में गेंद नहीं है. जब तक सीएम, विधानसभा भंग करने की सिफारिश ना करें या उसके बाद विपक्ष, विश्वास मत की मांग ना करे, तब तक राज्यपाल मौजूदा स्थिति से बाहर हैं. हालांकि एक बार सीएम द्वारा विधानसभा भंग करने की सिफारिश करने या कैबिनेट का इस्तीफा होने के बाद गेंद राज्यपाल के पाले में चली जाएगी और फिर वही आखिरी निर्णय करेंगे. जानकार बताते हैं कि अगर विपक्ष, राज्यपाल से सरकार के विश्वास मत परीक्षण की मांग करे तो अपने विवेक पर फैसला करते हुए वह सदन की विशेष बैठक आहूत कर सकते हैं. वहीं सरकार द्वारा इस्तीफा देने की स्थिति में राज्यपाल विपक्ष के दावे पर उन्हें सरकार बनाने का न्योता दे सकते हैं.


6. सीएम-राज्यपाल के झगड़े की कहानी पुरानी है
देश में राज्यपाल और मुख्यमंत्रियों के झगड़े की कहानी कोई नई नहीं है. पश्चिम बंगाल इसका ताजा उदाहरण है. बीते दिनों जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने महाराष्ट्र गए तो डिप्टी सीएम अजीत पवार ने मंच से ही राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर निशाना साधा. राज्य में महाविकास अघाड़ी की सरकार बनने के बाद कई ऐसे मौके आए जब सरकार और राजभवन, एक दूसरे के आमने-सामने थे. महाराष्ट्र विधान परिषद में उद्धव ठाकरे को मनोनीत करने के मुद्दे पर भी शिवसेना, सरकार और राजभवन के बीच तनातनी का माहौल था.


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