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उत्तराखंड में साइबर अपराध से दो साल में 3712 पीड़ित, पुलिस ने पकड़े सिर्फ तीन ठग

UK News: उत्तराखंड में बीते दो सालों में 3712 लोगों को साइबर ठगों ने अपना शिकार बनाया है. साइबर क्राइम पर अंकुश लगा पाने में पुलिस के पास तकनीकि ससांधन पर्याप्त नहीं है.

Uttarakhand Cyber Crime News: उत्तराखंड में साइबर अपराध एक गंभीर समस्या बन चुका है. पिछले दो वर्षों में 3712 लोगों को साइबर ठगों ने अपनी जाल में फंसाकर करोड़ों रुपये का चूना लगाया. लेकिन इन अपराधों के खिलाफ कार्रवाई में पुलिस का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. इन मामलों में पुलिस सिर्फ तीन साइबर ठगों को गिरफ्तार कर पाई, जबकि वर्ष 2024 में एक भी आरोपी को पकड़ने में सफलता नहीं मिली.

नैनीताल जिले के आंकड़े चिंताजनक हैं. पिछले दो वर्षों में साइबर ठगों ने 1.26 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की. पुलिस ने 3470 मामलों का निस्तारण कर 69 केस दर्ज किए. हालांकि, गिरफ्तारी की दर बेहद कम  है. गिरफ्तार हुए तीन आरोपियों में से किसी को भी अभी तक सजा नहीं मिल पाई है. इस नाकामी का मुख्य कारण पुलिस की तकनीकी दक्षता की कमी और संगठित साइबर अपराध नेटवर्क है. साइबर ठग देशव्यापी स्तर पर सक्रिय हैं और स्थानीय बैंक अधिकारियों, मोबाइल सेवा प्रदाताओं और अन्य सहयोगियों से जुड़कर अपराध करते हैं. पुलिस के पास ऐसे संगठित नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त तकनीकी और प्रशासनिक संसाधन नहीं हैं.

 अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस के पास पर्याप्त संसाधन की कमी
साइबर अपराध के बाद पुलिस का प्राथमिक फोकस ठगी की गई रकम को ब्लॉक कराने तक सीमित रहता है. अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस के पास न तो पर्याप्त उपकरण हैं और न ही विशेषज्ञता. कई बार तो पुलिस ठगों के कंप्यूटर सिस्टम जब्त कर लेती है, लेकिन डेटा निकालने और आरोप सिद्ध करने में सफल नहीं हो पाती. साइबर ठगों की गिरफ्तारी के लिए बाहरी राज्यों की पुलिस के साथ समन्वय स्थापित करना बेहद जरूरी है. ज्यादातर मामले उन अपराधियों से जुड़े होते हैं, जो बाहरी राज्यों में बैठकर संगठित रूप से ठगी करते हैं. पुलिस का मानना है कि साइबर अपराधियों को सजा न मिल पाना भी ठगी के मामलों में वृद्धि का एक बड़ा कारण है.

पुलिस ने साइबर अपराध रोकने के लिए कुछ कदम उठाए हैं. पिछले दो वर्षों में नैनीताल जिले में 1600 से अधिक मोबाइल सिम ब्लॉक किए गए. इन सिम कार्डों का इस्तेमाल साइबर ठगी के लिए किया गया था. इसके अलावा, 360 वेबसाइट और 500 से अधिक मोबाइल ऐप्स को बंद कराया गया है, जिनका इस्तेमाल ठगी के लिए किया जा रहा था. हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद साइबर अपराधियों को पकड़ने और उन्हें सजा दिलाने में सफलता नहीं मिली है.

पुलिस को तकनीकी रूप से सशक्त होना होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर अपराधों को रोकने के लिए पुलिस को तकनीकी रूप से अधिक सशक्त होना होगा. सिपाही से लेकर अधिकारियों तक, सभी को आधुनिक साइबर सुरक्षा तकनीकों में प्रशिक्षित करना होगा. इसके साथ ही, बैंक और मोबाइल सेवा प्रदाताओं के साथ बेहतर तालमेल बनाना आवश्यक है. पुलिस को एक राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर साइबर सुरक्षा नेटवर्क विकसित करना होगा, ताकि साइबर अपराधियों को ट्रैक करना और गिरफ्तार करना आसान हो सके. इसके अलावा, ठगों को सजा दिलाने की प्रक्रिया को तेज करना भी जरूरी है, ताकि अपराधियों के मन में कानून का भय पैदा हो.

साइबर क्राइम को लेकर लोगों को जागरूक करने की जरुरत
नैनीताल जिले में जिन तीन साइबर ठगों को गिरफ्तार किया गया, उनमें से किसी को भी अब तक सजा नहीं मिली है. कुमाऊं क्षेत्र में भी यही स्थिति है. यह सजा प्रक्रिया में देरी ठगी के मामलों में वृद्धि का एक बड़ा कारण है. अगर अपराधियों को जल्द से जल्द सजा दी जाए, तो साइबर ठगी पर लगाम लगाई जा सकती है. साइबर ठगों का नेटवर्क पुलिस से दो कदम आगे चल रहा है. इसे तोड़ने के लिए पुलिस को न केवल तकनीकी रूप से सशक्त होना होगा, बल्कि समाज को भी जागरूक करना होगा. साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाना और लोगों को साइबर अपराध से बचने के उपाय बताना बेहद जरूरी है.

उत्तराखंड में साइबर अपराध के मामलों में वृद्धि पुलिस और प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है. जब तक तकनीकी संसाधनों, प्रशिक्षित कर्मियों और अंतरराज्यीय समन्वय पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक साइबर अपराधियों को पकड़ना और उन्हें सजा दिलाना मुश्किल रहेगा. पुलिस को ठगों के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी, ताकि भविष्य में ऐसे अपराधों पर रोक लगाई जा सके.

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